Independence Day 2023: भारतीय स्वतंत्रता के अमेरिकी सहयोगी और अटलांटिक चार्टर
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स्वतंत्रता अभियान के कुछ ही विषयों पर शोधकर्ताओं ने प्रकाश डाला है, मसलन गांधी का संघर्ष, आईएनए की सैन्य कार्रवाई, नौसेना विद्रोह और क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीकों पर हमला।
उपनिवेशवाद के खिलाफ आदिवासियों की लड़ाई पर कम शोध मिलता है। भू-राजनीतिक (geopolitical) उथल-पुथल ने कैसे सहयोग किया भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को, इस विषय पर तो हिन्दी में कंटेंट हैं ही नहीं। स्कूलों में आधा-अधूरा आधुनिक इतिहास पढ़ाया जा रहा है। इसी अधूरेपन को कम करने की दिशा में ये लेख एक छोटा प्रयास है।
दूसरे विश्व युद्ध की घटनाओं पर एक सरसरी निगाह बताती है कि अटलांटिक चार्टर उपनिवेशवाद के पतन में महत्वपूर्ण पड़ाव था। हम ये भी जानते हैं कि 1939 के बाद गांधी के प्रति अमेरिका में आकर्षण तीव्र गति से बढ़ा। इन दोनों प्रसंगों ने कैसे भारत की स्वतंत्रता को गति दी इसको खंगालने की जरूरत है।
भारतीय संस्कृति और गांधी
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान दो अमरीकी पादरियों ने भारत, भारतीय संस्कृति और गांधी से अमेरिका का परिचय करवाया। ये दोनों युनीटेरियन चर्च के पादरी थे- टी.ई संदरलैड और जौन हाईन्स होम्स। दोनों ने मिशनरी प्रौपगेंडा खारिज किया कि भारत जब तक ईसाई मत अपना नहीं लेता वो स्वराज के काबिल नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के उन्नत होने के प्रमाण पेश किए और भारत की दुर्दशा के लिए ब्रिटिश राज को जिम्मेदार ठहराया।
संदरलैड लाला लाजपत राय के मित्र थे और गांधी जी के प्रशंसक। होम्स ने 1921 में अपने चर्च में एक प्रवचन दिया जिसका शीर्षक था दुनिया का सबसे महान व्यक्ति कौन है- गांधी।1927 में युनिटी पत्रिका में उन्होंने गांधी जी की आत्मकथा छापी, 1931 में इंग्लैंड में गांधी जी से मिले, 1947 में भारत आए और अमेरिका में अश्वेत अधिकारों के लिए लड़ने वाली संगठन एन.ए.ए.सी.पी की स्थापना की।
अमेरिका को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की जानकारी सर्वप्रथम लाला लाजपत राय ने अपने अमेरिका प्रवास (1914-1919) के दौरान दी। पादरी संदरलैड के अतिरिक्त अफ्रीकी मूल के डब्ल्यू.ई.बी डुबोएस उनके मित्र बने। जब डुबोएस के माध्यम से अफ्रीकी-अमरीकी लोगों को भारत में ब्रिटिश दमन के बारे में पता चला तो उन्हें भारतीयों के प्रति अपनापन का बोध हुआ।
आखिर अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोग भी तो श्वेत दमन के शिकार थे! डुबोएस गांधीवादी तरीके को अल्पसंख्यक लोग के संग्राम के लिए अनुपयुक्त मानते थे। लेकिन ए जे मस्ट, जो कि एफ.ओ.आर नाम की ब्रिटिश संघर्ष समाधान संस्था से जुड़े थे, पहले विश्व युद्ध के बाद श्वेत अन्याय के खिलाफ अहिसक आंदोलन की वकालत करने लगे।
गांधी दूत सी.एफ एंड्र्यूस ने 1929 में अपने अमेरिकी यात्रा के दौरान टस्कीजी संस्था में अहिंसा के पक्ष में प्रचार किया। अहिंसक तकनीक पर बहस अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय में इतना सर चढ़ के बोलने लगा कि 1937 में वाशिंगटन स्थित, अश्वेत लोगों के विश्वविद्यालय, हावर्ड से कुछ सदस्य भारत जा पहुंचे। इनमें प्रमुख सदस्य थे बेंजामिन मेस और हाऊवार्ड थरमन।
वो सिर्फ शोधकर्ता नहीं थे, वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को ताकत देने हिंदुस्तान आए थे। भारत के आजादी के आंदोलन का समर्थन और उससे प्रेरणा का अद्भुत संगम अफ्रीकी अमेरिकी मजदूर नेता फिलीप रैनडौल्फ के 1941 के वाशिंगटन मार्च कार्यक्रम में दिखता है। वो कार्यक्रम कितने ही भारतीयों को दांडी मार्च की याद दिलाता है।
अमेरिका के बुद्धिजीवी वर्ग में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उत्सुकता और सम्मान तीन लेखकों ने पैदा किया। रिचर्ड ग्रेग जो कि क्वैकर सम्प्रदाय से थे, हार्वर्ड प्रशिक्षित कारपोरेट वकील थे और 1934 में अमेरिका में ‘द पावर औफ नौन वायलेंस’ नाम से किताब छापी। किताब पर शोध के दौरान वो चार साल हिंदुस्तान में रहे और दो साल गांधी जी के आश्रम में। ग्रैग ने वैज्ञानिक तरीके से अमेरिकियों को अहिंसक प्रतिरोध की अवधारणा समझाया और उसके मनोवैज्ञानिक और मानवीय फायदे गिनाए ।
यहूदी कार्यकर्ता ग्रीनबर्ग ने 1937 में गांधी से पत्राचार के द्वारा नाजी दमन के संदर्भ में अहिंसक प्रतिरोध के उपयोगिता पर प्रश्न उठाया। गांधी संवाद के फलस्वरूप वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि करुणा का राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान है। 1939 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अपने हिंदुस्तानी छात्र श्रीधरनी का पी एच डी थीसिस ‘वार विदाउट वायलेंस' छापा।
इस किताब ने गांधीवादी दर्शन के प्रश्न उच्च शिक्षण संस्थान से निकाल कर अमरीकी जीवन में सार्वजनिक कर दिया। क्या स्वच्छ प्रयास ही सफल परिणाम देते हैं? क्या अहिंसा मार्ग भी है और मंजिल भी? क्या अमेरिका के कुलीन बौद्धिक समुदाय को इन प्रश्नों ने भारतीय स्वतंत्रता अभियान की और आकर्षित किया? उत्तर है नहीं।
1920 के दशक में मुट्ठी भर अमेरिकियों को भारत में रुचि थी- दो एक मिशनरी, एक आध बुद्धिजीवी और कुछ अफ्रीकी अमेरिकी मूल के नेतागण। अमेरिकी समाज का कुलीन और मध्यम वर्ग दोनों ही भारत पर ब्रिटिश प्रचार का कायल था।
क्या था ब्रिटिश प्रचार?
मनुष्य दुष्ट प्राणी है और हिन्दुस्तानी लोग धर्म के नशे में खून-खराबा के शौकीन। सैन्य बल और कुलीन मजहब आधारित प्रतिनिधित्व के द्वारा ही वे शासित किए जा सकते है। ब्रिटिश साम्राज्य समर्थक कैथरीन मेयो ने टैगोर, गांधी का हवाला देते हुए अमेरिका को बताया की भारतीय बाल विवाह के हिमायती हैं, उनके पास सफाई का कोई मानक नहीं है और पाश्चात्य दवाइयों का विरोध करते हैं। उदार और नारीवादी लेखकों ने गांधी के तपस और त्याग पर जोर को रूढ़िवादी और स्त्री-विरोधी घोषित कर दिया।
कम्युनिस्टों की अवधारणा- मनुष्य मुख्यरूप से भौतिक भोग का मशीन है। भोग के तकनीक में विकास कर वो समाज में निरंतर द्वंद पैदा करता है। द्वंद, मानव सभ्यता को प्रगति के पथ पर सदा कायम रखती है। वहीं गांधी के अधीन स्वतंत्रता संग्राम में भोग पर संयम, द्वंद के बदले अहिंसा का महिमा मंडन और आधुनिक मशीनों के प्रति आलोचनात्मक रुख को बढ़ावा मिल रहा था । कम्युनिस्टों का निष्कर्ष था भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मानव प्रगति के लिए बाधा और ब्रिटिश राज उम्मीद।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ अमेरिका में, सालों साल मेहनत कर के औपनिवेशिक ताकतों ने जो दुष्प्रचार का महल खड़ा किया था वो एक पत्रकार ने कुछ दिनों के अंदर धाराशाई कर दिया। वेब मिलर ने मई 1930 में धरसाना नमक सत्याग्रह का अत्यंत मार्मिक रिपोर्ट सरकारी सेंसर को चकमा देकर अमेरिका भेज दिया। इस रिपोर्ट ने अमेरिकी पत्रकार जगत में तहलका मचा दिया।
अमेरिका की प्रमुख पत्रिका टाइम ने अपने 1931 के अंकों में कवर पर गांधी को चित्रित किया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सामग्री छापी। कितने ही अमरिकियों को गांधी में ईसा-मसीह की और कुछ को उन में बुद्ध की छाया दिखी। जो अमरीकी पहले विश्व युद्ध की विभीषिका और आर्थिक मंदी से आतंकित थे उन्हें भारतीय स्वतंत्रता में विश्व शांति की संभावना दिखाई दी।
विलियम शायरर
अमेरिका में भारत और गांधी पर खबर की मांग बढ़ी तो विलियम शायरर नियमित रूप से भारत और गांधी पर रिपोर्ट अमेरिका भेजने लगे। अगस्त सितम्बर 1931 में जब गांधी यूरोप पहुंचे तो विलयम शायरर ने पाया कि ब्रिटिश सरकार उनके काम में अड़चन डाल रही है। जब अमेरिका में गांधी प्रशंसकों को पता चला कि गांधी यूरोप आए हैं तो वे भी मिलने को बेचैन हो गए।
गांधी ने कोलंबिया ब्रॉडकास्ट सिस्टम के रेडियो से उनको सम्बोधित किया। अपने सम्बोधन में उन्होंने दुनिया के अन्तरात्मा से भारत की आजादी के लिए गुहार लगाई।
1931 के अंत तक ये स्पष्ट हो गया था कि अमेरिकी जनमत भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में है। ठीक दस साल बाद दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस जनमत का प्रभाव अटलांटिक चार्टर में दिखा। ब्रिटेन और अमेरिका ने इस चार्टर द्वारा लिखित आश्वासन दिया कि उपनिवेश के लोगों को युद्ध के बाद स्व-निर्णय और स्व-शासन का अधिकार मिलेगा।
भारतीय स्वतंत्रता में अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर का भी अनमोल योगदान है। जब दूसरे विश्वयुद्ध में जापान ने अमेरिका पर आक्रमण कर दिया तो वो गांधी के पास 1942 में अमेरिकी नीति निर्माताओं का अनुरोध ले कर आए। क्या गांधी ऐलाइस राष्ट्रों के समूह को औपचारिक समर्थन देंगे? गांधी ने मना कर दिया। उनका अमेरिकी राष्ट्रपति को संदेश था कि वो चाहते हैं अमेरिका जापान पर जीत हासिल करें। लेकिन परतंत्र लोगों के नेता होने के नाते वो औपचारिक ऐलान किस हैसियत से करें?
एक उभरते हुए महाशक्ति को ये बात चुभ सकती थी, लेकिन संदेशवाहक लुई फिशर प्रतिभाशाली थे और भारतीय हितों के प्रति संवेदनशील, इसलिए अमेरिका से कोई रूखा जवाब नहीं आया और जुलाई 1947 में अटलांटिक चार्टर के मुताबिक ब्रिटिश संसद में भारत स्वतंत्रता अधिनियम पारित हो गया।
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