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आस्था का चरम, पवित्रता की पराकाष्ठा: भारतीय संस्कृति में गंगा जल अमृत तुल्य, हर बूंद में खुशियों की सौगात
Wed, 30 Oct 2024 05:42 AM IST
शुभम कुमार
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: शुभम कुमार
Updated Wed, 30 Oct 2024 05:42 AM IST
सार
अपार खूबियां समेटे गंगा जल कभी दूषित नहीं होता है, इसकी पुष्टि विभिन्न शोधों में हो चुकी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, गंगा के पानी में वातावरण से ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है। साथ ही अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा में गंदगी को नष्ट करने की क्षमता ज्यादा है।
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गंगाजल का महत्व
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारतीय संस्कृति में हर शुभ कार्य पर गंगा जल का उपयोग होता है। मां गंगा की निर्मल धारा से सहेजे गए गंगा जल की हर बूंद हमें अहसास कराती है कि इससे पवित्र जल नहीं होता है। साथ ही इसमें एक समावेशिता का भाव है। इस पवित्र जल में अपने स्पर्श से हर वस्तु को शुद्ध करने की शक्ति होती है। इसलिए दीपावली के पांच दिवसीय पर्व में भी गंगा जल का प्रमुखता से उपयोग होता है। गंगा जल का महत्व आदिकाल से चला आ रहा है। धार्मिक कथाओं में भी इसका जिक्र आता है।
अपार खूबियां समेटे गंगा जल कभी दूषित नहीं होता है, इसकी पुष्टि विभिन्न शोधों में हो चुकी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, गंगा के पानी में वातावरण से ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है। साथ ही अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा में गंदगी को नष्ट करने की क्षमता ज्यादा है। सैकड़ों वर्षों से घर में रखने के बाद भी गंगा जल खराब नहीं होता है। इसमें कीड़े नहीं पड़ते हैं। यह महकता नहीं है और शुद्ध रहता है, जबकि अन्य किसी नदी, कूप का जल कुछ ही दिन में ही खराब हो जाता है।
मान्यता है कि गंगा के उद्गम से नदी के रूप में आने तक यह कई दुर्लभ जड़ी-बूटी वाले मार्गों से होकर गुजरती है। बूटियों के मिश्रण से जल इतना पवित्र हो जाता है कि इसमें बैक्ट्रिया पनपते ही नहीं, बल्कि मर जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के बाद जिन स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं, उनमें से गंगा ही एक ऐसी नदी है, जिसमें दो स्थानों पर अमृत की बूंद गिरी। एक प्रयागराज और दूसरा हरिद्वार।
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अमृत की बूंदें गिरने के कारण गंगा जल को अमृत तुल्य माना जाता है। गंगा स्वर्ग की नदी भी मानी जाती है। स्वर्ग से निकलने के बाद शिव जी ने जटाओं में धारण किया, फिर जटाओं से निकलकर गंगा पृथ्वी लोक पर आईं। इसलिए गंगा स्वर्ग के समान सुखदायिनी हैं। यही कारण है कि गंगा जल से आचमन, गंगा जी में स्नान और उनके दर्शन स्वर्ग की अनुभूति कराते हैं।
गंगा जल को घर में रखने के लिए ध्यान रखें कि इसे प्लास्टिक के किसी बर्तन में सहेजकर कभी न रखें। गंगा जल को पीतल, कांसे, तांबे अथवा चांदी के बर्तन में रखने से इसकी गुणवत्ता और महत्ता पूरी तरह बरकरार रहती है। गंगा जल को हमेशा पूजा स्थान पर रखना ही धार्मिक नियमों के अनुसार सही प्रक्रिया है।
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अपार खूबियां समेटे गंगा जल कभी दूषित नहीं होता है, इसकी पुष्टि विभिन्न शोधों में हो चुकी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, गंगा के पानी में वातावरण से ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है। साथ ही अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा में गंदगी को नष्ट करने की क्षमता ज्यादा है। सैकड़ों वर्षों से घर में रखने के बाद भी गंगा जल खराब नहीं होता है। इसमें कीड़े नहीं पड़ते हैं। यह महकता नहीं है और शुद्ध रहता है, जबकि अन्य किसी नदी, कूप का जल कुछ ही दिन में ही खराब हो जाता है।
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मान्यता है कि गंगा के उद्गम से नदी के रूप में आने तक यह कई दुर्लभ जड़ी-बूटी वाले मार्गों से होकर गुजरती है। बूटियों के मिश्रण से जल इतना पवित्र हो जाता है कि इसमें बैक्ट्रिया पनपते ही नहीं, बल्कि मर जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के बाद जिन स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं, उनमें से गंगा ही एक ऐसी नदी है, जिसमें दो स्थानों पर अमृत की बूंद गिरी। एक प्रयागराज और दूसरा हरिद्वार।
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अमृत की बूंदें गिरने के कारण गंगा जल को अमृत तुल्य माना जाता है। गंगा स्वर्ग की नदी भी मानी जाती है। स्वर्ग से निकलने के बाद शिव जी ने जटाओं में धारण किया, फिर जटाओं से निकलकर गंगा पृथ्वी लोक पर आईं। इसलिए गंगा स्वर्ग के समान सुखदायिनी हैं। यही कारण है कि गंगा जल से आचमन, गंगा जी में स्नान और उनके दर्शन स्वर्ग की अनुभूति कराते हैं।
गंगा जल को घर में रखने के लिए ध्यान रखें कि इसे प्लास्टिक के किसी बर्तन में सहेजकर कभी न रखें। गंगा जल को पीतल, कांसे, तांबे अथवा चांदी के बर्तन में रखने से इसकी गुणवत्ता और महत्ता पूरी तरह बरकरार रहती है। गंगा जल को हमेशा पूजा स्थान पर रखना ही धार्मिक नियमों के अनुसार सही प्रक्रिया है।