कोरोना के सबक: इस त्रासदी ने बताया, पैसा बहुत कुछ लेकिन सबकुछ नहीं..!
कोरोना की दूसरी लहर में तो त्रासदियां भयावह थीं। मनुष्य सबसे ज्यादा लाचार दिखा, उसके सारे संसाधन, उसके सारे पैसे, उसके सारे संपर्क, सारी पॉवर, बेकार साबित हुईं।
देश की राजधानी दिल्ली में भी पैसा, पॉवर और सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग प्राणवायु सिलेंडर की आस में भटकते हुए दिखाई दिए।
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कोरोना महामारी के संकट ने पूरे विश्व को कई तरह की चुनौतियों से भर दिया है। ये चुनौतियां ऐसी रही हैं, जिसके चलते हर वर्ग-विशेष पर एक अलग तरह का संकट सामने आया है। सबसे बड़ा संकट जान बचाने का है। कोरोना ने न केवल मनुष्य के प्राणों को संकट में डाला है, अपितु उसके जनजीवन को भी अस्त-व्यस्त किया है। कोरोना से पहले पूरे विश्व समुदाय का जीवन सरल-सहज और उतना ही सामाजिक था, जितना कि इस समय एकाकी हो गया है।
कोरोना महामारी के इस डेढ़ साल में विश्व समुदाय ने लॉकडाउन के जैसी स्थितियां झेलीं और इसने उसे दिखाया कि मानवीय रिश्तों की तुलना न धन-संपदा, वैभव से की जा सकती है और न अकूत संसाधनों से। संसाधन होने के बाद भी मनुष्य प्राण बचाने के संकट के सामने असहाय है। प्राणों से बड़ी चीज इस संसार में शायद ही कोई हो। चाहे कोई सेठ हो या गरीब से गरीब मनुष्य, प्राणों को लेकर सब एक बराबर ही रहे।
कोरोना संकट में कई ऐसी कहानियां सामने आईं, जिसमें मनुष्य अपने जीवनभर की कमाई को सामने रख कर भी अपने प्राणों को बचा नहीं पाया। गांव-देहातों और दूसरे कस्बों से कई समाचार ऐसे भी सामने आए कि कई लोग झोले में पैसा लेकर निकले और अस्पतालों में डॉक्टर के सामने रख दिए। लेकिन न तो पैसा काम आया और न ही रसूख।
कोरोना की दूसरी लहर में तो त्रासदियां भयावह थीं। मनुष्य सबसे ज्यादा लाचार दिखा, उसके सारे संसाधन, उसके सारे पैसे, उसके सारे संपर्क, सारी पॉवर, बेकार साबित हुईं। देश की राजधानी दिल्ली में भी पैसा, पॉवर और सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग प्राणवायु सिलेंडर की आस में भटकते हुए दिखाई दिए।
कोरोना संकट ने हमें यह तो बता दिया कि पैसा ही सबकुछ नहीं है। पैसा तभी काम आ सकता है, जब मनुष्य अपने प्राणों को बचा सके। बिना प्राण के न पैसा किसी काम का है, न संसाधन किसी काम के हैं।
कोरोना ने मनुष्य सभ्यता को जो दिया
जो दुनिया में पैसे को ही सब कुछ बस मान ही चुके थे, उनको कोरोना ने याद दिला दिया कि ऐसा नहीं है। सवाल यह नहीं है कि हर व्यक्ति जो मर गया उसके पास पैसा नहीं था, वो तो हो सकता है किसी और कमी से मरा या अब उसका समय हो चला हो या ये भी हो सकता है कि उसका मनोबल कमजोर पड़ गया हो और वो कोरोना से लड़ाई हार गया? बल्कि सवाल तो ये है कि जो अमीर था क्या वो नहीं मरा या जो गरीब था, क्या वो जिंदा नहीं बचा? वास्तव में इस बीमारी ने हमें बहुत कुछ महत्वपूर्ण सिखा दिया है जिन सीखों के बदले में किसी के अपने तो किसी के सपने दांव पर लगे हैं।
इस पूरी महामारी में एक अति महत्वपूर्ण सीख है जो उभर कर सामने आई है कि पैसा बहुत कुछ हो सकता है किन्तु सब कुछ नहीं। क्योंकि जरा सोचिए क्या पैसा इच्छा शक्ति या निडरता दे सकता है? क्या पैसा रिश्ते निभवा सकता है? क्या पैसा मानवता खरीद सकता है? क्या पैसा कोरोना काल में आपको निश्चिंत होकर लोगों के बीच बेफिक्र घूमने के लिए काम आ सकता है?
सोनू सूद से सीखना होगा
इन सब सवालों का एक ही जवाब है वो है नहीं, क्योंकि पैसा काम आ सकता है पर काम बना नहीं सकता है जो पैसे को सब कुछ मानते थे वो भी अब तक तो ये समझ ही चुके होंगे कि जब पैसा और पॉवर भी कुछ काम नहीं आ सका तब मानवता ने अपनी गुणवत्ता दिखाई है, उदाहरण सोनू सूद का ही ले लो वो भी पैसे के नाते नहीं बल्कि मानवता के नाते आगे आकर मदद कर रहे हैं पैसे को तो उन्होंने महज जरिया बनाया है, जैसा कि आदर्श रूप में होना चाहिए।
इतनी बड़ी सीख विश्व स्तर पर एक साथ सिखाने की ताकत सिर्फ समय के पास ही हो सकती थी। देखा जाए तो विश्व स्तर पर एक दूसरे की मदद करने में विभिन्न देशों के आपस के संबंध और मानवीयता ही मूलतः काम आई है, वरना अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्था के पास क्या कमी थी जो शुरुवाती दौर में भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया और उसने स्वीकारा भी अब अमेरिका वही भाव भारत के प्रति रखे हुए है।
ये तो हम भारतीयों के खून में मानवता की समझ का नतीजा है जिसको कुछ ने याद रखा और कुछ लोग भूल गए और जो भूल गए थे लगता है अब तक तो वे भी हकीकत समझ ही चुके होंगे और जो अब तक भी नहीं समझे तो निश्चित ही वो लोग इस योग्य हैं ही नहीं, ये भी कहना बिलकुल गलत नहीं होगा।
महामारी के इस समय ने हमें रिश्तों का महत्व अलग ही अंदाज में समझाया है, जिसमें सबसे बड़ा रिश्ता मानवता का साबित हुआ है और उसके अनुसार ये कहना बिलकुल उचित है कि यदि समय बुरा चल रहा है, तो आपके संबंध आपको उससे उभार सकते हैं, यकीनन वो दिखावे के ना होकर वास्तविक हो, क्योंकि इस बीमारी ने दिखावे को तो यूं भी मुंह तोड़ जवाब दिया है और पूरी दुनिया को वास्तविकता के करीब लाकर खड़ा करने का प्रशंसनीय कार्य किया है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।