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#कबतकनिर्भयाः क्या जीने की आजादी और सुरक्षा दिला पाएंगे प्रधानमंत्री जी? 

Prachi Priyamप्राची प्रियम Updated Sat, 30 Nov 2019 05:56 PM IST
प्रधानमंत्री जी क्या बहुमत की सरकार होना और संसद का सक्षम होना एक देश की बेटी की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं होता?
प्रधानमंत्री जी क्या बहुमत की सरकार होना और संसद का सक्षम होना एक देश की बेटी की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं होता?
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एक और घटना घट गई। देश की एक और बेटी घर नहीं लौटी। वह उसी मानसिकता का शिकार हो गई, जिसे लेकर धरने, प्रदर्शन और आंदोलन का शोर मचता रहा और संसद शोक सभाओं में मौन रही। आदरणीय प्रधानमंत्री जी आप तो सक्षम हैं और आपकी सरकार बहुमत में है।
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प्रधानमंत्री जी क्या बहुमत की सरकार होना और संसद का सक्षम होना एक देश की बेटी की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं होता?  

लोकतंत्र में बहुमत की सरकारें संसद में मौन होने के लिए थोड़े ही होती हैं? हमें शोक का मौन नहीं चाहिए प्रधानमंत्री जी। शोक के मौन तो हमारे अधरों पर हमारी परवरिश ने ही रख दिए थे। और घर से बाहर निकलने और जीने की आजादी पर बेड़ियां इस समाज ने डालकर रखी हैं।

प्रधानमंत्री जी बेड़ियों का बंधन तो हमारे पैरों में जाने कब से पड़ा है। बेड़ियां भी इतनी तरह की हैं आपको कब तक और किस तरह गिनाऊं। लेकिन अब निर्भया नहीं प्रधानमंत्री जी, अब हम बेटियां अपराजिता बनकर आपके सामने हैं। अब न्याय के लिए शोक और उदासी में डूबी मोमबत्ती नहीं बल्कि हम बेटिया न्याय की आस में मार्च करते कदम हुए आपकी ओर बढ़ा रही हैं।

हमें देखिए और हमें आजादी दीजिए।

जरा सोचिए हम बेटियां डरी-सहमी हुई क्यों हैं? हम क्यों अपने घर नहीं लौट पा रहीं ? हमें देखने वाली आंखें पाश्विकता में डूबी और हमारी ओर बढ़ने वाले हाथ इतने घिनौने क्यों हैं?  

हम उस खौफ को अपने पास नहीं रखना चाहतीं प्रधानमंत्री जी जो आखिरी बार दिल्ली में निर्भया की आंखों में सूख गया था और इस देश की हर लड़की के दिलो-दिमाग पर हावी हो गया था। मैं उस डर में नहीं जीना चाहती प्रधानमंत्री जी जो हैदराबाद के उस आखिर फोन के बाद एक बार फिर इस देश की फिजाओं में घुल रहा है।

क्या आप मेरे डर को दूर करेंगे?

क्या आप देश की हर लड़की को बेखौफ किसी महानगर, शहर और गांव में जीने, बाहर जाने की आजादी दिला पाएंगे?
क्या आप दिल्ली की निर्भया और हैदराबाद की अपराजिता को न्याय दिला पाएंगे?

प्रधानमंत्री जी, घर से लौटना अब असामान्य हो गया है? और बाहर निकलना एक पाप।  

हम अपनी सफलता की उड़ान किस ओर ले जाएं प्रधानमंत्री जी?  क्या संसद में बहुमत की ताकत से खड़ी सरकार एक बार चर्चा करेगी?  क्या आप कोई बिल इस पर लेकर आएंगे?

हम आपकी अपराजिता हैं प्रधानमंत्री जी
ये बेटियों की पाती आपके नाम है जो न्याय की उम्मीदों से भरी हुई है।
क्या अबकि बार न्याय मिलेगा "सरकार" 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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