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डिजिटल होता बचपन और समाज: खेल-खेल में अपराध की राह पर बच्चे और बदलती मनोदशा घातक

Mon, 13 Jun 2022 12:54 PM IST
Hari Verma हरि वर्मा
Updated Mon, 13 Jun 2022 12:54 PM IST
सार

लखनऊ में पब्जीगेम के लिए मां की हत्या, झांसी में मोबाइल गेम के लिए मां-पिता को नींद की गोलियां देने की घटना या वर्चुअल के बाद एक्चुअल क्लास में बच्चों की बदली मनोदशा चिंताजनक है। सोशल मीडिया पर बच्चों-किशोरों की सक्रियता ने अभिभावकों की परेशानी बढ़ा दी है।

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How Online Gaming is Changing the Mental Mindset of Children in Wrong Direction
अभिभावकों ने भी मोबाइल इस्तेमाल के लिए बच्चों को प्रोत्साहित किया, लेकिन लखनऊ की पब्जी गेम वाली घटना ने अभिभावकों की आंखें खोल दी है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मासूम फिल्म का एक गाना है- छोटा बच्चा जान के हमको....। जी हां, अब बच्चे, बच्चे नहीं रहें। लखनऊ में पब्जी गेम से रोकने पर मां की हत्या और झांसी में मोबाइल गेम के लिए मां-पिता को नींद की गोलियां देने की घटनाएं मासूम की बदलती मनोदशा के लिहाज से काफी चिंताजनक हैं।

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कोरोना काल के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जहां मोबाइल बच्चों के लिए कारगर औजार और वरदान साबित हुआ, वहीं इंटरनेट, ऑनलाइन गेम, सोशल मीडिया की लत ने बच्चों के व्यवहार को बदल कर रख दिया है। अब एक्चुअल क्लास में वर्चुअल के आदि बच्चों के व्यवहार में आए बदलाव ने शिक्षकों की सिरदर्दी बढ़ा दी है।
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मोबाइल वरदान बनाम अभिशाप

आज मोबाइल हर घर का हिस्सा है। हर परिवार में करीब 90 फीसदी बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल करने लगे हैं। कोरोना काल की आपदा के दौरान तो बच्चों के लिए मोबाइल ही ऑनलाइन पढ़ाई का जरिया बना। बच्चों के लिए स्लेट-पेंसिंल-कलम-कॉपी मोबाइल ही साबित हुए।

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अभिभावकों ने भी मोबाइल इस्तेमाल के लिए बच्चों को प्रोत्साहित किया, लेकिन लखनऊ की पब्जी गेम वाली घटना ने अभिभावकों की आंखें खोल दी है। अब जब कोरोना आपदा के बाद स्कूलों में एक्चुअल क्लास शुरू हुई तो ज्यादातर बच्चे बैग-बस्ते में चोरी-छिपे मोबाइल क्लास ले जाने लगे।

गुरुजी से नजरें बचाकर मोबाइल स्क्रीन पर नजरें दौड़ाने लगे। इस बदले व्यवहार ने कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षकों के सामने बच्चों की पढ़ाई के लिए दिलचस्पी जगाने की चुनौती बढ़ा दी। अधिकांश स्कूल संचालकों और शिक्षक-शिक्षिकाओं का मानना था कि बच्चे चिड़चिड़े हो गए और मोबाइल से रोकने पर वह अवसाद-मनोविकार, गुस्से की गिरफ्त में आ गए। इतना ही नहीं, क्लास में पढ़ाई के बजाय मोबाइल पर ध्यान की वजह से उनकी समझने (ऑब्जर्व) करने की क्षमता भी प्रभावित हुई। एकाग्रता के अभाव में बच्चे भटकाव का शिकार हुए हैं।

How Online Gaming is Changing the Mental Mindset of Children in Wrong Direction
आज ऑनलाइन गेम का कारोबार 200 बिलियन से ज्यादा का हो गया है। करीब 76 फीसदी बच्चे मोबाइल यूजर्स हैं और सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। - फोटो : Istock

200 बिलियन का ऑनलाइन गेम कारोबार

आज ऑनलाइन गेम का कारोबार 200 बिलियन से ज्यादा का हो गया है। करीब 76 फीसदी बच्चे मोबाइल यूजर्स हैं और सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। नाबालिग के फेसबुक पर बढ़ते फ्रेंड्स और उनकी सोशल मीडिया पर देर रात तक लगातार सक्रियता से मनोविकार, अवसाद, नींद न आने, सामाजिक अलगाव, साइबर धमकी, फेसबुक अवसाद, इंटरनेट की लत, आत्म सम्मान की कमी जैसी शिकायतें बढ़ी हैं।


इन विकारों से निपटने के लिए देश में पुनर्वास केंद्र तक संचालित हैं लेकिन वहां इक्के-दुक्के मामले ही पहुंच पाते हैं। ऑनलाइन गेम के लत में बच्चे टॉस्क के दौरान खुदकुशी तक करने लगे हैं। और अब तो लखनऊ में मां की हत्या की घटना ने न केवल मासूम की मासूमियत छीन ली बल्कि उसे अपराध की ओर भी धकेल दिया है।

जाहिर है यह समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है। एम्स में तो हर सप्ताह ऐसे बच्चों के लिए ओपीडी क्लीनिक तक संचालित होने लगा है। एम्स के मनोचिकित्सक यतन पाल सिंह तो अब देश के हर जिले में ऐसे केंद्र और काउंसिलिंग की  जरूरत महसूस कर रहे हैं। यदि समय रहते इस नये संकट से हम अपने बच्चों को नहीं उबार पाए तो लखनऊ जैसी घटनाओं का खतरा और बढ़ता जाएगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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