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मुद्दे की बात: सीईसी के खिलाफ लामबंदी से विपक्ष को सियासी लाभ कितना?
सार
विपक्ष तो अब आयोग और उसके द्वारा कराए एसआईआर ( विशेष गहन पुनरीक्षण) को देशव्यापी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। इसमें उसे कितनी सफलता मिलेगी, अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन ज्ञानेश कुमार पद छोड़ेंगे, इसकी संभावना नहीं है। वैसे भी उनके रिटायरमेंट में अभी सवा दो साल हैं।
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सीईसी ज्ञानेश कुमार
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और बाकी दो निर्वाचन आयुक्तों में सीईसी की मनमानी कार्यशैली को लेकर नाराजी और आयोग के भीतर दरार की धमाकेदार खबर, विपक्ष द्वारा इसे बड़ा मुद्दा बनाने तथा सीईसी ज्ञानेश कुमार द्वारा तुरंत इस्तीफा देने एवं उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की धमकी से बने भारी दबाव के बाद लगता है आयोग ‘लाइन पर ‘ आ गया है। इस पूरे बवाल पर अभी तक सार्वजनिक चुप्पी साधे दोनो निर्वाचन आयुक्तों और सीईसी के बीच दिखावे के लिए ही सही, सुलह हो गई है।
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चुनाव आयोग ने शनिवार को यह संकेत देने की कोशिश की कि सारे फैसले सर्वसम्मति लिए जा रहे हैं और एसआईआर प्रक्रिया की खामियों को दुरूस्त किया जा रहा है। आयोग के इस बदले रूख से यह तो साबित हो गया कि वहां सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। हालांकि सत्तारूढ़ भाजपा चुनाव आयोग को संवैधानिक संस्था बताकर उसका हर संभव बचाव कर रही थी, लेकिन एक महिला पत्रकार की खबर ने आयोग के काम काज को लेकर विपक्ष और जनता के बीच शक का जो बीज बो दिया है, वह आसानी से मिटने वाला नहीं है।
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विपक्ष तो अब आयोग और उसके द्वारा कराए एसआईआर ( विशेष गहन पुनरीक्षण) को देशव्यापी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। इसमें उसे कितनी सफलता मिलेगी, अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन ज्ञानेश कुमार पद छोड़ेंगे, इसकी संभावना नहीं है। वैसे भी उनके रिटायरमेंट में अभी सवा दो साल हैं। अलबत्ता 2029 के लोकसभा चुनाव तक वो शायद पद पर नहीं रहेंगे।
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इसमें दो राय नहीं कि महिला पत्रकार रितिका चोपड़ा की एक अंग्रेजी अखबार में छपी खोजी खबर ने पूरे देश और राजनीति को हिलाकर रख दिया। अर्से बाद किसी अखबार में छपी खबर ने मुददों की भीड़ में लीड ली। विपक्ष यहां भी चूक गया।
एक खबर ने हिला दी देश की राजनीति
कायदे से यह खबर उसे ‘ब्रेक’ करनी थी। लेकिन अब वो सीरियस फॉलो अप में लगा है। ऐसा नहीं है कि चुनाव आयुक्तों में मुद्दों पर असहमतियां पहली बार हुई हैं। यह पहले भी होता रहा है, लेकिन ऐसे विवाद कभी सार्वजनिक नहीं हुए। खासकर एसआईआर प्रक्रिया के कारण देशभर में 13 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम कटने पर आयोग से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने और नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए जारी फार्म 6 में दादा-दादी के नाम भी पुरानी मतदाता सूची में होने के जरूरी प्रावधान शंकाओंके घेरे में रहे हैं।
चुनाव आयुक्तों का तर्क था कि ऐसा करना तर्कसंगत नहीं है। आम जनता में इससे यह संदेश गया कि परोक्ष रूप से यह जेन ज़ी को मतदाता सूची से बाहर रखने की कोशिश है। इसी प्रकार एसआईआर में जिनके गलत तरीके से नाम कटे, उन्हें फिर से शामिल करने की प्रक्रिया भी सरल होनी चाहिए, इससे भी शायद ही कोई असहमत हो। कुल मिलाकर आयोग का रवैया मतदाताओं को अपने अधिकार का उपयोग करने देने के मामले में सकारात्मक होना चाहिए न कि नकारात्मक। लेकिन चुनाव आयोग के हाल के कुछ फरमानों से विपरीत संदेश जा रहा था।
अखबार में छपी खबर के मुताबिक कई मामलों में सीईसी सहयोगी चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को ताक पर रखकर खुद ही सारे फैसले लेते जा रहे थे। जबकि आयोग तीनों आयुक्तों से मिलकर बनता है। लिहाजा आंतरिक असहमतियां अपनी जगह हैं, लेकिन उन पर सम्यक विचार के बाद अंतिम फैसले सामूहिक और एकस्वर से होते दिखने चाहिए।
यहां सवाल यह भी है कि महिला रिपोर्टर तक यह इतनी अंदरूनी गोपनीय जानकारियां कैसे पहुंचीं? रिपोर्टर रितिका चोपड़ा बरसों से चुनाव आयोग कवर करती रही हैं। लिहाजा उनके खबरों के सूत्र आयोग के भीतर तक हैं। लेकिन ताजा मामले में उजागर हुए गोपनीय डिटेल्स तो किसी जिम्मेदार स्रोत द्वारा उपलब्ध कराए लगते हैं। क्योंकि खबर छपने के बाद चुनाव आयोग का जो पहला स्पष्टीकरण आया था, वो सतही ज्यादा था। उल्टे इससे मामला सीधे सीईसी ज्ञानेश कुमार पर फोकस हो गया।
जब बात इस्तीफे और महाभियोग चलाने तक जा पहुंची तो ज्ञानेश कुमार ने अपना घर दुरूस्त करने की कोशिश की। खबर के मुताबिक चुनाव आयुक्तों ने अपनी असहमतियों को लेकर 14 चिट्ठियां कैबिनेट सचिव सोमनाथन को लिखीं। लेकिन उन्होंने किसी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया। सोमनाथन ने ऐसा किसी दबाव में या फिर स्वविवेक से किया, यह स्पष्ट नहीं है।
हालांकि इस बारे में देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी.रावत का कहना है कि अगर चुनाव आयुक्तों को कोई आपत्तियां थीं तो उन्हें सीधे राष्ट्रपति को अवगत कराना चाहिए था। क्योंकि आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है। उसके द्वारा सरकार से चिट्ठी पत्री करने का कोई अर्थ नहीं है। चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को चिट्ठियां शायद इसलिए लिखीं कि उन्हें राष्ट्रपति से किसी कार्रवाई की उम्मीद न रही हो। क्योंकि राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सलाह पर ही काम करना होता है। और ज्ञानेश कुमार ‘ऊपर’ से संरक्षण को लेकर बेफिक्र थे।
बहरहाल रितिका चोपड़ा की खबर प्रिंट मीडिया और छपे शब्द की ताकत को एक बार फिर रेखांकित करने वाली है। दूसरे, इस खबर को जिस तरह अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी जगह मिली, उसने भारत के चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर उंगली उठाने का मौका दे दिया है। भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एसआईआर की तारीफ करते हुए उसे अमेरिका में भी लागू करने की बात कही हो।
विपक्ष को मिला अच्छा मुद्दा
इसमें संदेह नहीं कि देश में मोदी सरकार को हटाने के लिए किसी कारगर मुद्दे की तलाश में जुटे विपक्ष को हमले के लिए एक नया राजनीतिक मुद्दा जरूर हाथ लग गया है। हालांकि इस पर भी समूचा विपक्ष एक नहीं है। कहा जा रहा है कि इस मुद्दे पर इंडिया गठबंधन की बैठक 30 सितंबर को होने वाली है। सत्तारूढ़ एनडीए के दल यूं तो इस मुद्दे पर भाजपा के साथ ही हैं, लेकिन कुछ सहयोगी दलों ने चुनाव आयोग से उस पर लगे आरोपों पर सफाई मांगी है।
उधर विपक्षी इंडिया गठबंधन इसे विरोध का राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाए, इसके पहले ही कांग्रेस ने इस मामले में लीड लेने की कोशिश की है, जैसे कि उसने यूपीआई पर एमडीआर लगाने के सरकार के निर्णय के खिलाफ की थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी का आरोप है कि भाजपा ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के मार्फत एसआईआर के जरिए बड़ी संख्या वोट कटवाए, जिससे कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में सत्ता में आने से चूक गई। एसआईआर के तहत देश में कुल 13 करोड़ वोटरों (जिनमें दिवंगत, स्थानांतरित भी शामिल हैं), को मतदाता सूची से बाहर करने का अर्थ है लगभग तेरह फीसदी लोगो को मतदान से वंचित करना। ये विपक्षी पार्टियों को मिल जाते तो नतीजा कुछ और होता।
विपक्ष का आरोप है कि इनमें बड़ी संख्या में ऐसे वोटर हैं, जो भाजपा समर्थक नहीं थे। जबकि भाजपा का कहना है कि यह तो केवल चुनावी हार से उपजी खीज का बहाना है। वैसे भी केवल एसआईआर के कारण चुनाव हारने की बात बहुत गले नहीं उतरती, क्योंकि चु्नाव जीतना अब एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमें बहुत से कारक काम करते हैं। जिनमें चुनाव प्रबंधन अव्वल है और इसे साम-दाम-दंड-भेद से अंजाम दिया जाता है।
सदिच्छाओंके भरोसे चुनाव जीतने का वक्त गुजर चुका। लिहाजा मुद्दों को उठाने के साथ साथ उसे वोटो में भुनाने का हुनर और तिकड़म भी चाहिए। विपक्ष जब तक इस फ्रंट पर अपना घर ठीक नहीं करता, तब तक कोई बड़ी और सतत चु्नावी सफलता उसे नहीं मिल सकती। हालांकि कई राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि सत्ता के खिलाफ हवा और धारणा धीरे धीरे ऐसे ही बनती है।
कुछ विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के सीईसी रहते हुए सम्पन्न विधानसभा चुनावों को रद्द कर नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की है। वैधानिक रूप से यह संभव नहीं है और हो भी तो फिर आयोग को केरलम् और तमिलनाडु के विधानसभा भी निरस्त करने होंगे, जहां क्रमश: कांग्रेस और टीवीके चुनाव जीती है। इसलिए कांग्रेस इस मांग को हवा नहीं दे रही है।
विपक्ष की शंका का आधार यह है कि ज्ञानेश कुमार के सीईसी बनने के बाद से देश में कुल 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें से पांच में भाजपा और एनडीए गठबंधन जीते हैं और दो में क्रमश: कांग्रेस और टीवीके।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक प्रश्नवाचक आरोप यह भी लगाया है कि देश में विपक्षी पार्टियां और खासकर कांग्रेस सरकारों के प्रति तो एंटी इनकम्बेंसी होती है, लेकिन मोदी और भाजपा सरकारों के प्रति न केवल वह बेअसर रहती है बल्कि प्रो इनकम्बेंसी में क्यों बदल जाती है? इसका जवाब यह हो सकता है कि देश में आजादी के बाद लगातार बीस वर्षों तक केन्द्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस चु्नाव जीतती रही तो इसकी वजह भी प्रो इनकम्बेंसी और विपक्ष का बेहद कमजोर होना था।
तब विपक्ष के पास कुछ बड़े और मुखर नेता जरूर थे, लेकिन जमीनी संगठन और संसाधन बहुत सीमित थे। आज कांग्रेस की असल कमजोरी संगठन के स्तर पर उसका कमजोर और बंटा होना है। इसमें जब तक कोई ठोस सुधार नहीं होता तब तक मतदाता का विश्वास तक अर्जित करना और उसे लंबेस समय तक कायम रखना बड़ी चुनौती है।
इसमें सीईसी और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोलना कितनी मदद कर पाएगा, कहना मुश्किल है। विपक्ष की परेशानी यही है कि वह मुद्दों की मृग मरीचिका के पीछे भागने लगता है, बजाए इसका गहराई से आकलन किए कि इसमें राजनीतिक और जनता को बड़े पैमाने पर आंदोलित करने की संभावनाएं कितनी हैं तथा उसे कितना लंबा खींचा जा सकता है। केवल उम्मीदों के रिमोट से मुद्दों के चैनल बदलते रहते से तात्कालिक राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन सत्ता परिवर्तन की राह आसान नहीं होती।
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