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जीवन धारा: कमी रोशनी में नहीं, खिड़कियों में है; जानें दृष्टिकोण बदलेना से कैसे सबकुछ बदल जाता है
Sat, 07 Feb 2026 07:36 AM IST
हिमांशु चंदेल
आइजैक असिमोव, अमर उजाला
आइजैक असिमोव, अमर उजाला
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Sat, 07 Feb 2026 07:36 AM IST
सार
यदि हम समय-समय पर अपनी मान्यताओं को परखते रहें, उन्हें साफ करते रहें, तो न केवल हमारा दृष्टिकोण बदलता है, बल्कि हमारा पूरा जीवन उज्ज्वल हो जाता है।
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आइजैक असिमोव
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
हमारी मान्यताएं ही संसार को देखने की खिड़कियां होती हैं। इन्हीं खिड़कियों से झांककर हम लोगों, परिस्थितियों और स्वयं को समझने की कोशिश करते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब हम यह मान लेते हैं कि ये खिड़कियां हमेशा साफ ही रहेंगी। समय के साथ उन पर धूल जमती जाती है। अनुभवों की धूल, डर की परतें, असफलताओं की छाया और समाज से मिली अधूरी सीखें धीरे-धीरे हमारी दृष्टि को धुंधला कर देती हैं। तब हमें लगता है कि दुनिया अंधेरी है, जबकि सच यह है कि रोशनी आ ही नहीं पा रही।
हर इन्सान अपने जीवन में कुछ धारणाएं बना लेता है। हमें सिखाया जाता है कि क्या संभव है और क्या असंभव, क्या सही है और क्या गलत। धीरे-धीरे ये बातें हमारे भीतर इतनी गहराई से बैठ जाती हैं कि हम उन्हें सत्य मान लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि ये केवल विचार हैं, स्थायी सच नहीं।
जब हम इन्हें बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेते हैं, तब हमारी सोच सीमित हो जाती है और हम नए रास्तों को देखने से चूक जाते हैं। मान्यताओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे हमें सुरक्षित महसूस कराती हैं। जब हम स्वीकार करते हैं कि हो सकता है हमने अब तक चीजों को अधूरा या गलत समझा हो। यही स्वीकार्यता ही सीख की पहली सीढ़ी है। जब हम अपनी सोच को जकड़ लेते हैं, तब हम दूसरों के बदलने की संभावना को भी नकार देते हैं। इससे न केवल हमारे रिश्ते सीमित हो जाते हैं, बल्कि हमारी समझ भी संकीर्ण हो जाती है।
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अपनी मान्यताओं को साफ करना निरंतर चलने वाला अभ्यास है। जब हम अपनी खिड़कियां साफ करते हैं, तब दुनिया हमें नए रंगों में दिखाई देती है। हमें समझ आता है कि हर विचार में कुछ न कुछ सीख छिपी हो सकती है। हम अधिक सहनशील बनते हैं, अधिक संवेदनशील बनते हैं। तब ज्ञान केवल जानकारी नहीं रह जाता, वह समझ बन जाता है। और समझ हमें केवल सफल नहीं बनाती, बल्कि मानवीय भी बनाती है। रोशनी हमेशा बाहर मौजूद रहती है। कमी रोशनी में नहीं, हमारी खिड़कियों में होती है। यदि हम समय-समय पर अपनी मान्यताओं को परखते रहें, उन्हें साफ करते रहें, तो न केवल हमारा दृष्टिकोण बदलता है, बल्कि हमारा पूरा जीवन उज्ज्वल हो जाता है।
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हर इन्सान अपने जीवन में कुछ धारणाएं बना लेता है। हमें सिखाया जाता है कि क्या संभव है और क्या असंभव, क्या सही है और क्या गलत। धीरे-धीरे ये बातें हमारे भीतर इतनी गहराई से बैठ जाती हैं कि हम उन्हें सत्य मान लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि ये केवल विचार हैं, स्थायी सच नहीं।
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जब हम इन्हें बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेते हैं, तब हमारी सोच सीमित हो जाती है और हम नए रास्तों को देखने से चूक जाते हैं। मान्यताओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे हमें सुरक्षित महसूस कराती हैं। जब हम स्वीकार करते हैं कि हो सकता है हमने अब तक चीजों को अधूरा या गलत समझा हो। यही स्वीकार्यता ही सीख की पहली सीढ़ी है। जब हम अपनी सोच को जकड़ लेते हैं, तब हम दूसरों के बदलने की संभावना को भी नकार देते हैं। इससे न केवल हमारे रिश्ते सीमित हो जाते हैं, बल्कि हमारी समझ भी संकीर्ण हो जाती है।
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अपनी मान्यताओं को साफ करना निरंतर चलने वाला अभ्यास है। जब हम अपनी खिड़कियां साफ करते हैं, तब दुनिया हमें नए रंगों में दिखाई देती है। हमें समझ आता है कि हर विचार में कुछ न कुछ सीख छिपी हो सकती है। हम अधिक सहनशील बनते हैं, अधिक संवेदनशील बनते हैं। तब ज्ञान केवल जानकारी नहीं रह जाता, वह समझ बन जाता है। और समझ हमें केवल सफल नहीं बनाती, बल्कि मानवीय भी बनाती है। रोशनी हमेशा बाहर मौजूद रहती है। कमी रोशनी में नहीं, हमारी खिड़कियों में होती है। यदि हम समय-समय पर अपनी मान्यताओं को परखते रहें, उन्हें साफ करते रहें, तो न केवल हमारा दृष्टिकोण बदलता है, बल्कि हमारा पूरा जीवन उज्ज्वल हो जाता है।