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कोरोना से अब तक की लड़ाई: वैक्सीन तो आ गई है, लेकिन खतरा अब भी टला नहीं है..!

Fri, 12 Mar 2021 11:47 AM IST
Arvind Kumar yadav अरविंद कुमार
Updated Fri, 12 Mar 2021 11:47 AM IST
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How has been the fight against the Corona virus so far
कोरोना वायरस: महामारी से जंग लड़ते हुए भारत ने नई शक्ति हासिल की है। - फोटो : Pixabay

कोरोना से लड़ाई का एक साल पूरा हो गया है। पिछले एक साल में हम सबने अप्रत्याशित सी स्थितियों का सामना किया है। इस अनुभव को बरसों हमारे मन से मिटाया नहीं जा सकता। लगातार एक साल तक घर में बंद रहकर काम करना, जिस लैपटॉप या मोबाइल पर बच्चों का वक्त खराब करने का इल्जाम था, उन्हीं के दम पर बच्चों की पढ़ाई चलना, किसी भी ऑनलाइन ऑर्डर पर नो कांटेक्ट डिलीवरी के ऑप्शन को चुनना, लोगों से दूरी बना कर रखना और चेहरे पर हमेशा मास्क रहना, यह सब कुछ हमारे साथ पहली बार हो रहा है और आगे यही हमारी कहानियों का हिस्सा होंगे।

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कोरोना की शुरुआत और लॉक डाउनस 

वैसे तो भारत में कोरोना की शुरुआत पिछले साल जनवरी में ही हो गई थी जब वुहान से लौटी केरल की रहने वाली एक छात्रा को कोरोना पॉजिटिव पाया गया। धीरे-धीरे कोरोना के केस बढ़ते गए। हम सबने इसकी गंभीरता को मार्च में समझा। इसके बाद जब तक जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन की घोषणा हुई, तब तक दिल्ली, तेलंगाना और राजस्थान सहित कई राज्यों में कुल 536 मामले दर्ज हो चुके थे और 10 लोगों की मौत हो चुकी थी। वैसे तो लॉकडाउन की शुरुआत कोरोना को ध्यान में रख कर की गई थी, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में जहां रोज कमाने और खाने वालों की बड़ी संख्या है, उनके सामने आजीविका का एक संकट खड़ा हो गया। प्रवासी मजदूरों का वह पलायन अब भी सब को याद ही होगा। 
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एक तरफ कोरोना से लड़ाई थी तो दूसरी तरफ एक बड़ी आबादी को खाने-पीने की चीजें भी मुहैया करानी थी। कई चरणों के लॉकडाउन के बाद सरकार ने जब टेस्टिंग क्षमता और अस्पताल में जरूरी व्यवस्था तैयार कर ली, तब गिरती हुई अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी को संभालने के लिए लॉकडाउन को खत्म कर धीरे-धीरे अनलॉक की तरफ कदम बढ़ा दिए। कल-कारखाने खुलने से अर्थव्यवस्था का पहिया धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने लगा। लेकिन साथ ही साथ कोरोना के केस भी बढ़ते गए और एक समय तो रोजाना एक लाख के करीब नये केस आने लगे। कुछ राज्यों में अस्पतालों में कोरोना के मरीजों को बेड भी नहीं मिल पा रहा था।

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How has been the fight against the Corona virus so far
कोरोना का प्रसार जब देश में शुरू हुआ, तब पूरे विश्व की निगाहें हमारी ओर ही थीं। - फोटो : Pixabay

स्वास्थ्य सेवाओं का उत्कर्ष प्रदर्शन और भविष्य
कोरोना का प्रसार जब देश में शुरू हुआ, तब पूरे विश्व की निगाहें हमारी ओर ही थीं। वजह भी साफ है, आबादी के हिसाब से हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में हालात बहुत खराब हैं। मेट्रो और दूसरे शहरी क्षेत्रों में तो डॉक्टर और इलाज की व्यवस्था हो भी जाती है, लेकिन दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों की हालत दयनीय है। अब भी कई गांव ऐसे हैं जहां इलाज झोला छाप डॉक्टर्स और सीधे मेडिकल स्टोर से दवाई लेकर होता है। लेकिन भारत ने कोरोना से अपनी लड़ाई को तीन बिंदुओं पर केंद्रित किया : पहला पूरे देश में लॉकडाउन, दूसरा कन्टेनमैंट ज़ोन बनाना और तीसरा हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर व सप्लाई चेन में सुधार।

लॉकडाउन से पहले कोरोना के प्रसार की गति को धीमा किया गया और उस समय का उपयोग कर हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार किया गया। कोविड के लिए अलग से अस्पताल बनाए गए, इमरजेंसी केसेस को छोड़ कर बाकी सब ऑपरेशन रोक दिए गए। पीपीई किट, सैनिटाइज़र और मास्क को देश में ही बनाया जाने लगा। इसका असर यह हुआ कि सीमित स्रोतों के साथ भी हम काफी हद तक इस बीमारी से लड़ने के लिए तैयार हो गए। लेकिन साथ ही साथ लोगों की जागरूकता और उनकी समझदारी ने कोरोना के प्रसार को काफी हद तक धीमा कर दिया।

आज सामुदायिक स्तर पर हम सब इतने जागरूक हैं कि मास्क लगाना, सैनिटाइज़र का उपयोग करना एक आदत सी बन गयी है। जागरूकता का स्तर तो यहां तक पहुंच गया है कि अब तो कई लोग मेडिकल से जुड़े कठिन शब्दों को भी समझने लगे है। एंटीजन और एंटीबाडी टेस्ट के बीच में अंतर भी करने लगे हैं। हम सब के इम्यून सिस्टम ने भी बहुत हद तक इस बीमारी से हमारा बचाव किया। भले ही हमने सीमित साधनों के साथ काफी हद तक कोरोना को मात दे दी हो, लेकिन हम हर बार इतने भाग्यशाली नहीं होंगे। यह एक सबक भी है कि हमें अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार करना होगा और वह भी जल्द से जल्द।

इतनी बड़ी आबादी के होते हुए भी अगर 2017-18 के आकंड़े देखें तो हम अपनी जीडीपी का सिर्फ 1.28% ही स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, जो पड़ोसी देशों श्रीलंका और इंडोनेशिया की तुलना में भी कम है। वहीं अमेरिका हेल्थकेयर पर अपनी जीडीपी का 18% खर्च करता है। कोरोना से सबक लेते हुए अभी हाल ही में पेश किए गए बजट में सरकार ने 64,180 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना की घोषणा की है।

इसके जरिए स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों की क्षमता विकसित करने, नई बीमारियों का पता लगाने और ठीक करने के लिए नए संस्थानों का विकास किया जाएगा। हज़ारों गांवों के वेलनेस सेंटर्स को इससे मदद मिलेगी। कई जिलों में क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल खोले जाने की भी योजना है। इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन पोर्टल खोले जाएंगे ताकि पब्लिक हेल्थ लैब्स को जोड़ा जा सके।

बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कहा था कि स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट को 137 फीसदी तक बढ़ाया गया है। कोरोना वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपये का एलान किया गया है। यह एक सकरात्मक कदम है। इनसे हम भविष्य में ऐसी किसी चुनौती का मजबूती से सामना करने के लिए तैयार हो सकेंगे।

How has been the fight against the Corona virus so far
वैक्सीने कोरोना के खिलाफ जंग को कम किया है, लेकिन खतरा अब भी टला नहीं है। - फोटो : iStock

वैक्सीन के प्रयास और कोरोना से जंग की नई शुरुआत
कोरोना की शुरुआत से ही पूरा विश्व कोरोना की वैक्सीन के लिए प्रयास में लग गया। सभी देशों ने अपने संसाधनों को झोंककर जिस वैक्सीन को सामान्यत: बनने में कई साल का समय लग जाता है, उसे कुछ ही महीनों में बना दिया। भारतीय वैज्ञानिकों ने भी कोरोना के टीके को विकसित करने में सफलता पा ली और आज हमारे देश में कोरोना टीकाकरण अभियान का तीसरा चरण चल रहा है।

जहां पहले दो चरण में हेल्थकेयर वर्कर्स और फ्रंट लाइन वर्कर्स को टीका दिया गया है, तो तीसरे चरण में 60 साल से ज्यादा उम्र के सभी लोगों और 45 साल से ज्यादा के उन लोगों का टीकाकरण किया जा रहा है जो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अनुमान लगाया है कि संक्रमण को रोकने के लिए कम से कम 65-70 प्रतिशत लोगों को वैक्सीन लगानी होगी, जिसमें अभी बहुत वक्त लगेगा। पिछले छह हफ़्तों में लगभग डेढ करोड़ आबादी को कोरोना की वैक्सीन दी गई है और अगर हर महीने दो करोड़ लोगों को भी वैक्सीन दी जाती है तो भी पूरी आबादी को कवर करने में लगभग छह साल लग जाएंगे।

कोरोना के केसों का फिर बढ़ना
पिछले कुछ दिनों में कोरोना के नए मामलों में फिर उछाल देखने को मिला है, विशेषकर महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों में तो कोरोना के दैनिक मामलों की संख्या फिर से पुराने स्तर की ओर बढ़ने लगी है। जहां जनवरी में कुल एक्टिव केसों की संख्या में कमी आ रही थी, तो फ़रवरी में इसमें फिर उछाल देखने को मिल रहा है। कोरोना के मामलों में आया यह उछाल इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि अभी तक इतनी हिम्मत और मेहनत से लड़ी हुई इस लड़ाई को हमने आखिरी मुकाम पर लाकर थोड़ी ढील दे दी है।

कोरोना पर हम सब की अब तक की जीत में मास्क लगाने और शारीरिक दूरी रखने जैसे सतर्कता के कदमों का बड़ा योगदान रहा है। वैक्सीन अब भी सब की पहुंच से दूर है और पूरी आबादी तक पहुंचने में लंबा समय लग सकता है। लेकिन हम शायद वैक्सीन आने के बाद काफी निश्चिन्त हो गए।

दरअसल, हमें ध्यान रखना होगा कि वैक्सीन संक्रमण होने से बचाती है, लेकिन जब तक टीकाकरण में आपका नंबर नहीं आया है, तब तक आप खतरे से दूर नहीं हैं। और एक बड़ी बात यह भी है कि कोरोना का कोई सटीक इलाज अब भी नहीं मिला है। संक्रमण की चपेट में आने के बाद वैक्सीन नहीं बचा सकती है। इस बात को समझते हुए हमें सतर्क बने रहना होगा।

खतरा अब भी है और बल्कि पहले से ज्यादा है। समझदारी इसी में है कि हम इस लड़ाई में आखिरी पड़ाव पर खुद को कमजोर न बनाएं। होली भी आने को है, इसलिए सतर्कता और भी जरूरी है। आप पिछले साल की कनिका कपूर की होली पार्टी को भी याद कर सकते हैं कि कैसे एक पार्टी से कोरोना का प्रसार हुआ था। इस बार ‘बुरा न मानो होली है’ के बजाय ‘बुरा न मानो दूरी है’ को अपनाएं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
 

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