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आदिवासी होली: रंगों से पहले रिश्तों का उत्सव
सार
आदिवासी होली हमें तीन सरल, लेकिन गहरे संदेश देती है। पहला, प्रकृति से दूरी नहीं, संवाद। दूसरा, उत्सव में दिखावा नहीं, सहभागिता और तीसरा, परंपरा में कठोरता नहीं, लचीलापन। शायद यही कारण है कि आदिवासी समाज में होली का आनंद देखने से ज्यादा महसूस करने का अनुभव बन जाता है।
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होली का उत्सव (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
जब हम होली की बात करते हैं तो मन में सबसे पहले रंग, गुलाल और प्रह्लाद-होलिका की कथा उभरती है, लेकिन भारत की धरती पर यह पर्व एक और रूप में भी जीवित है। जंगलों, पहाड़ियों और छोटे-छोटे गांवों में, जहां होली केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु जीवन के नए चक्र का उत्सव है। आदिवासी समाज की होली हमें याद दिलाती है कि भारतीय संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी और बहुरंगी हैं।
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मध्य भारत की जनजातियों पर अध्ययन करते हुए वेरियर एल्विन ने अपनी पुस्तक द शेड्यूल ट्राइब में लिखा कि वसंत के समय समुदाय का एक साथ इकट्ठा होना, अग्नि जलाना और रातभर गीत-नृत्य करना केवल उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का माध्यम है। यही दृश्य आज भी कई आदिवासी इलाकों में दिखाई देता है, जहां होली का अर्थ 'हम साथ हैं' है।
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शहरों में होलिका दहन अक्सर एक प्रतीकात्मक रस्म बनकर रह जाता है, लेकिन आदिवासी गांवों में यह सचमुच सामुदायिक अनुभव होता है। आग जलने से पहले गांव के बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं एकत्र होते हैं। कोई ढोल बजाता है, कोई गीत गाता है। यह दृश्य उस मूल भारतीय भावना को जीवित करता है, जिसमें अग्नि केवल पौराणिक कथा का पात्र नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास का केंद्र होती है।
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धर्म और लोक परंपराओं के इसी मेल को 'द इलस्ट्रेटेड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदुइज्म' में होली की प्रमुख विशेषता बताया गया है, जहां धार्मिक प्रतीक और लोकजीवन एक-दूसरे को अर्थ देते हैं। वहीं, आदिवासी समाज में होली का रंग अक्सर फूलों, मिट्टी या राख से आता है, लेकिन असली रंग रिश्तों में दिखाई देता है।
कई जगह यह युवाओं के मिलने, पुराने मतभेद भूलने और समुदाय को फिर से जोड़ने का समय होता है। समाजशास्त्री एन.के. बोस ने ट्राइबल इंडिया में लिखा है कि जनजातीय त्योहारों की सबसे बड़ी भूमिका सामाजिक संतुलन बनाए रखना है, यानी त्योहार केवल आनंद नहीं, सामाजिक संरचना का भी आधार हैं।
समय के साथ-साथ आदिवासी और मुख्यधारा परंपराओं ने एक-दूसरे को प्रभावित किया। कई गांवों में आज प्रह्लाद की कथा भी सुनाई जाती है तो कहीं प्रकृति पूजा पहले होती है। यह मिश्रण भारतीय संस्कृति की उसी विशेषता को दर्शाता है, जिसमें विविधता विरोध नहीं, विस्तार बन जाती है।
एंथ्रोपोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया और सांस्कृतिक धरोहर का दस्तावेज तैयार करने वाला इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी अपने अध्ययनों में इस सांस्कृतिक निरंतरता की ओर संकेत करते हैं, जहां लोक और शास्त्र साथ-साथ चलते हैं।
तीन सरल, लेकिन गहरे संदेश
आदिवासी होली हमें तीन सरल, लेकिन गहरे संदेश देती है। पहला, प्रकृति से दूरी नहीं, संवाद। दूसरा, उत्सव में दिखावा नहीं, सहभागिता और तीसरा, परंपरा में कठोरता नहीं, लचीलापन। शायद यही कारण है कि आदिवासी समाज में होली का आनंद देखने से ज्यादा महसूस करने का अनुभव बन जाता है।
यदि होली को केवल रंगों का त्योहार मानें तो हम उसके आधे अर्थ तक ही पहुंचते हैं। आदिवासी समाज की होली दिखाती है कि यह पर्व दरअसल जीवन, प्रकृति और रिश्तों के नवीनीकरण का उत्सव है। हिंदू सांस्कृतिक दृष्टि से यह स्पष्ट होता है कि भारत की परंपरा किसी एक कथा या रूप में सीमित नहीं, बल्कि अनेक लोक अभिव्यक्तियों से मिलकर बनी एक जीवित धारा है। आदिवासी होली उसी धारा की सबसे सहज, सबसे मानवीय अभिव्यक्तियों में से एक है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।