फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   History's Strangest Archaeological Forgery; Fraud and deception are human nature.

दूसरा पहलू: इतिहास की सबसे अजीब पुरातात्विक जालसाजी

Wed, 28 Jan 2026 07:37 AM IST
पवन पांडेय रामधनी द्विवेदी
रामधनी द्विवेदी Published by: पवन पांडेय Updated Wed, 28 Jan 2026 07:37 AM IST
सार

यूं तो जालसाजी के तमाम किस्से सुनने को मिलते हैं, पर कुछ ऐसी भी जालसाजियां होती हैं, जो इतिहास में दर्ज हो जाती हैं। ऐसी ही जालसाजी फ्यूहरर नामक पुरातत्वविद ने बौद्ध भिक्षु ऊ मा के साथ की, जब उन्होंने बुद्ध के बजाय घोड़े के दांत की तरह दिखने वाला दाढ़ का दांत भेज दिया था। ऊ मा ने फ्यूहरर की इस जालसाजी की शिकायत ब्रिटिश अधिकारियों से की। इतिहासकार चार्ल्स एलन की पुस्तक द बुद्धा एंड फ्यूहरर में भी फ्यूहरर की कई और जालसाजियां उजागर की गई हैं।

विज्ञापन
History's Strangest Archaeological Forgery; Fraud and deception are human nature.
एए फ्यूहरर, पुरातत्वविद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूं तो जालसाजी और धोखाधड़ी मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन कुछ ऐसी भी जालसाजियां होती हैं, जो इतिहास में दर्ज हो जाती हैं। ऐसी ही जालसाजी एक पुरातत्वविद ने एक बौद्ध भिक्षु के साथ की। हुआ कुछ यों कि 1895-96 में बर्मा (आज का म्यांमार) के बौद्ध भिक्षु ऊ मा बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा पर भारत आए थे। उसी बीच उनकी मुलाकात पुरातत्वविद डॉक्टर एए फ्यूहरर से हुई। वह जर्मनी के पुरातत्वविद थे और उन दिनों नेपाल की तराई में उत्खनन और भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों की खोज कर रहे थे। तथागत के अस्थि अवशेषों को बौद्ध बहुत पवित्र मानते हैं। ऊ मा ने एए फ्यूहरर से कहा कि यदि उन्हें तथागत के अस्थि अवशेष मिलें, तो उनमें से कोई एक उन्हें दे दें, जिनकी स्थापना वह अपने देश में करेंगे। फ्यूहरर ने ऊ मा से वादा किया तथा कुछ समय बाद उन्हें एक दांत का अवशेष भेजा और कहा कि यह उन्हें श्रावस्ती से उत्खनन में मिला है।
विज्ञापन


यह दांत 21 सितंबर, 1897 को भेजा गया। लेकिन जब यह दांत ऊ मा के पास पहुंचा, तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई और इसे बुद्ध का दांत मानने से इन्कार कर दिया। यह एक मोलर टूथ (दाढ़ का दांत) था और आकार में बहुत बड़ा था। ऐसा लगा कि यह किसी घोड़े का दांत था। इस पर उन्होंने आपत्ति की और फ्यूहरर को पत्र लिख कर इसके फर्जी होने की बात कही। फ्यूहरर ने उन्हें पत्र लिख कर आश्वस्त किया कि यह बुद्ध का ही दांत है और उन्होंने उसे उत्खनन में ही पाया है। चूंकि, बुद्ध का शरीर बड़ा था, इसलिए दांत का आकार भी बड़ा है। लेकिन उसे लेकर भ्रम नहीं होना चाहिए।
विज्ञापन


उन्होंने यह भी लिखा कि उन्हें इस दांत के साथ ही एक अभिलेख भी मिला है, जिसमें बताया गया है कि यह दांत सम्राट अशोक ने उपगुप्त को उपहार में दिया था। इसलिए यह दांत सही है। हालांकि, उस समय ऐसा कोई अभिलेख फ्यूहरर को नहीं मिला था, लेकिन सांची और अन्य जगहों पर बाद में ऐसे अभिलेख पाए गए। पर भिक्षु ऊ मा ने फ्यूहरर की बात नहीं मानी और ब्रिटिश अधिकारियों से उनकी शिकायत कर दी और प्रमाण में वे सभी पत्राचार भी प्रस्तुत किए, जो दोनों के बीच हुए थे। यह जांच लखनऊ के तत्कालीन कमिश्नर के सामने गई, जिनके अधिकार क्षेत्र में उस समय हो रहे उत्खनन के काम भी थे। यह पूरा रोचक विवरण पत्रकार और इतिहासकार चार्ल्स एलन ने अपनी पुस्तक द बुद्धा एंड फ्यूहरर में बहुत विस्तार से लिखा है, जिसमें एए फ्यूहरर की कई और जालसाजियां भी उजागर की गई हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed