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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: सिंगापुर सिने-इतिहास, शुरुआती रोचक दौर

Tue, 22 Aug 2023 03:40 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 22 Aug 2023 03:40 PM IST
सार

शुरुआत में जो फीचर फिल्में यहां बनीं उनमें सिंगापुर नाम के लिए ही था। न इन्हें सिंगापुर में फिल्माया जा रहा था और न ही इनमें सिंगापुर के कौन कहे, एशिया के अभिनेता काम कर रहे थे। सिंगापुर में बनी स्थानीय फिल्म ‘दि इमीग्रैंट’ है, 1934 में ‘लैला मजनू’ बनी। ‘दि इमीग्रैंट’ तथा ‘लैला मजनू’ में स्थानीय दृश्य नजर आते हैं।

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सिंगापुर सिनेमा का इतिहास - फोटो : Istock

विस्तार

सिंगापुर का सिने-इतिहास बहुत रोचक है। कई अन्य देशों की भांति ही सिंगापुर में भी सिनेमा अपने अन्वेषण के प्रारंभिक दौर में ही आ गया। यहां के दर्शकों को पहले-पहल चलती-फिरती तस्वीरों को देखने का अवसर 1896 में मिला जब अमेरिकी तकनीकी– काइन्टोस्कोप का प्रयोग डॉक्टर हैर्ले ने किया। यह एक स्टैंडिंग बॉक्स था जिसमें बॉक्स के ऊपर बने पीपहोल से एक बार में एक आदमी ही देख सकता था। यह सीन हुआ करता था डॉन्स का अथवा मुर्गा लड़ाई का। फिल्म चक्र की सहायता से दिखाए जाते थे।

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यह व्हील बिजली की मोटर से घूमता और तस्वीरें तेजी से आगे बढ़तीं, बिजली की मोटर के साथ एक चमकता हुआ बिजली का बल्ब भी हुआ करता था। दर्शकों को चलती-फिरती तस्वीरें देखने की खुशी मिलती। जल्द ही कई काइन्टोस्कोप बॉक्स आ गए। जुलाई 1896 में कई ऐसे बॉक्स का प्रदर्शन भी हुआ।
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ठीक एक साल बाद मई 1897 में सिंगापुर में रिपोग्राफ का प्रवेश हुआ। रिपोग्राफ को विशाल सिनेमाटोग्राफ के नाम से भी जाना जाता है। इसे पेरिस से ऑर्दर सलीवान लेकर आए। उन्होंने अपनी मशीन के विज्ञापन में दावा किया कि यह 10,000 डॉलर का उपकरण दुनिया की सबसे बड़ी तस्वीरें दिखाता है। शायद यह उनका व्यापारिक बड़बोलापन था। यह दिसम्बर 1895 में फ्रांस में लुमियर भाइयों की दर्शकों के लिए पहली प्रदर्शनी के दो साल के भीतर हुआ।

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फिल्मों के प्रदर्शन में होता सुधार

इस बीच फिल्म जगत में धड़ाधड़ अन्वेषण हो रहे थे। अमेरिका में थॉमस एडीसन, फ्रांस में लुमियर भाई एवं लिओन बाउली सब लगे हुए थे। लोग सिनेमाटोग्राफ, बायोस्कोप, बायोग्राफ, विस्टाग्राफ, प्रोजेक्टो स्कोप के नाम से परिचित हो रहे थे। एक के बाद एक फिल्म दिखाने की तकनीक में सुधार हो रहा था। हर अगला उपकरण पिछले से बेहतर हो रहा था और ये दुनिया के अन्य देशों की भांति सिंगापुर भी पहुंच रहे थे।


1904 में पेरिस सिनेमाटोग्राफ का प्रदर्शन पॉल पिकार्ड ने विक्टोरिया स्ट्रीट पर मलाया थियेटर में किया। उन्होंने घंटेभर लम्बी फिल्म दिखानी शुरू की, साथ ही मूक फिल्म को आकर्षक बनाने के लिए उनके पास संगीत का भी प्रबंध था। इसके पहले सिंगापुर में टेंट में तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। अब तम्बू सिनेमा के लिए यह एक चुनौती बन गया। कुछ लोग रोशनी अर्थात बिजली के बल्ब और पंखा का लालच दे कर दर्शकों को आकर्षित कर रहे थे।

कुछ लोग अपने उपकरण एक स्थान पर न रख कर उठाऊ रखते और सुविधानुसार कहीं भी अपना कारोबार कुछ दिन के लिए जमा लेते और फिर नई जगह के लिए चल देते। स्टेज हाल अथवा म्यूजिक हॉल जहां सुविधा मिलती फिल्म दिखाते। अब तम्बू सिनेमा, उठाऊ सिनेमा, थियेटर सिनेमा में प्रतिस्पर्द्धा थी। कोई कहता उसके यहां बैठने की बेहतर सुविधा है, तो कोई कहता उसके यहां रोशनी दूसरों से अच्छी है। दर्शकों को लुभाने का कार्य शुरू हो गया था।

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सिंगापुर की फिल्में - फोटो : istock

सिंगापुर में इस होड़ के फलस्वरूप सिनेमा हाल की संख्या में वृद्धि हो रही थी, नए हाल के साथ पुराने हाल का रिनोवेशन हो रहा था। इम्प्रेस पैलेस का टाउन हाल विक्टोरिया थियेटर और कन्सर्ट हॉल बन गया। होटल मोडिफाई हो कर सिनेमा दिखाने के लिए तैयार किए जा रहे थे।

एडेल्फी हॉल एक-से-एक फिल्में जैसे ‘द चार्ज ऑफ लेन्सर्स’, ‘द सर्पेन्टाइन डॉन्स’, ‘ली हन्ग-चान्ग इन पेरिस’ दिखा रहा था जहां दर्शक को सामने की सीट के लिए एक डॉलर और पीछे की सीट के लिए 50 सेंट देने होते थे। अच्छी फिल्म और उच्च वर्ग के दर्शकों से अधिक पैसा वसूला जा रहा था। 1908 में ‘बेन हर’ फिल्म की टिकट राफल्स होटल ने 2 डॉलर की रखी थी, और दर्शक टूट कर देखने गए थे।

इन शुरुआती प्रदर्शनों की ओर लोग नवीनता के चलते खिंचे चले आ रहे थे। जल्द ही कमियां नजर आने लगीं। लगातार कांपती अस्थिर तस्वीरें, बीच-बीच में बड़े सफेद धब्बे लोगों को परेशान करने लगे जबकि उनसे सर्वाधिक मनोरंजन और अनुभव का वायदा किया जाता था। इन कमियों का मुख्य कारण तकनीक का पूरा विकसित न होना था लेकिन इसके साथ एक अन्य कारण भी था।


फिल्मों के प्रदर्शन में बाधाएं

प्रदर्शन के दौरान होने वाली इन बाधाओं का एक बड़ा कारण वहां का पर्यावरण था, ट्रोपिकल नमी भरा मौसम था। नमी की वजह से फिल्म चिपक जाती और चलाते समय एकसार तरीके से नहीं घूमती थी। दिखाने वालों ने इसकी भी काट निकाल ली। जब रील में बाधा आती, वे दर्शकों के अन्य मनोरंजन का प्रबंध पहले से तैयार रखते। धीरे-धीरे तकनीक में सुधार हुआ और फिल्म प्रदर्शन बिना व्यवधान के अधिक सुचारू रूप से होने लगा।

जल्द ही (1907) सिंगापुर इलाके के लिए फिल्म वितरण का केंद्र बन गया। इसके मुख्य संचालक फ्रांस के पाथे फ्रेरेस थे। सिंगापुर के बंदरगाह और समुद्र दृश्य नई डॉक्यूमेंट्री में निरंतर दिखने लगे। यहां तक कि फिल्म के पुरोधा जॉर्ज मेलिस ने भी एक डॉक्यूमेंट्री ‘ए डे एट सिंगापुर’ बनाई। ये वही मेलिस थे जिन्होंने 1902 में ही स्पेशल इफेक्ट का प्रयोग करने ‘ए ट्रिप टू द मून’ जैसी मील का पत्थर फिल्म बनाई थी। इन्हीं मेलिस को श्रद्धांजलि देते हुए मार्टिन स्कोरसेस ने ‘ह्यूगो’ फिल्म बनाई है। यदि अब तक नहीं देखी है तो मौका मिले तो यह फिल्म अवश्य देखें।

शुरुआत में जो फीचर फिल्में यहां बनीं उनमें सिंगापुर नाम के लिए ही था। न इन्हें सिंगापुर में फिल्माया जा रहा था और न ही इनमें सिंगापुर के कौन कहे, एशिया के अभिनेता काम कर रहे थे। ‘एक्रॉस टू सिंगापुर’, ‘साल ऑफ सिंगापुर’, द क्रिमसन सिटी’, द रोड टू सिंगापुर’, ‘आउट ऑफ सिंगापुर’, ‘मालाया नाइट्स’ (इसे ‘शैडोज ऑफ सिंगापुर’ के नाम से भी जाना जाता है) ऐसी ही फिल्में हैं। ये आज से सौ साल पहले 1923-1933 यानी दस साल के बीच बनी फिल्में हैं।

1933 में बनी फिल्म ‘समरंग’ एक सूडो-डॉक्यूमेंट्री है, जिसे शायद हॉलीवुड ने 1932 में पहले पहल पूरा-का-पूरा सिंगापुर में फिल्माया है। यह फिल्म कोटोन्ग बंदरगाह पर फिल्माई गई है। इसमें एक मोती गोताखोर की कहानी है जो स्थानीय प्रमुख की खूबसूरत बेटी के प्रेम में पड़ जाता है। यहां दर्शकों को लुभाने के लिए आदमखोर हैं, शार्क हैं और हैं अजगर। इसे यूनाइटेड आर्टिस्ट्स तथा बी. एफ. जैडमैन ने प्रड्यूस किया तथा वार्ड विंग ने निर्देशित किया है, इसका लेखन लोरी बैरा ने किया है।

सिंगापुर में बनी स्थानीय फिल्म ‘दि इमीग्रैंट’ है, 1934 में ‘लैला मजनू’ बनी। ‘दि इमीग्रैंट’ तथा ‘लैला मजनू’ में स्थानीय दृश्य नजर आते हैं। इनका निर्माण एशिया के लोगों ने किया यहां एशिया के अभिनेता हैं, आधिकारिक कहानी भी एशिया की है। इन फिल्मों ने पचास के दशक में मलाया फिल्मों उद्योग को पनपने में सहायता दी।

सिंगापुर सिने-इतिहास की आगे की कहानी फिर और कभी।


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यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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