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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: राउल कोटार्ड- गोदार्द का प्रिय सिनेमाटोग्राफर

Sun, 07 Apr 2024 08:48 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sun, 07 Apr 2024 08:48 PM IST
सार

16 सितम्बर 1924 को पेरिस में पैदा हुए राउल कोटार्ड अपने मोबाइल कैमरा और लॉन्ग ट्रैकिंग शॉट्स के लिए जाने जाते हैं। वे हैंड-हेल्ड कैमरा तथा नेचुरल लाइटिंग के लिए भी ख्यात हैं। ब्लैक-व्हाइट फिल्मों में कमाल दिखाने का जादू उन्हें आता था, साथ ही उन्होंने यादगार रंगीन फिल्में भी बनाई।

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history of world cinema Raoul Coutard French cinematographer Movies and awards
Raoul Coutard, world cinema - फोटो : X/@projectionistw

विस्तार

गोदार्द का नाम तो आपने अवश्य सुना होगा। वही फिल्म समीक्षक, स्क्रीनप्ले राइटर तथा प्रसिद्ध सिने-निर्देशक ज्यां लुक गोदार जिनकी ‘ब्रेथलेस’ देखे बिना कोई फिल्म प्रशिक्षण पूरा नहीं हो सकता है। आज गोदार्द की नहीं, आज बात करती हूं, उनके साथ काम करने वाले सिनेमाटोग्राफर राउल कोटार्ड की। वैसे राउल सिनेमाटोग्राफर के साथ-साथ सिने-निर्देशक भी थे। उन्होंने 86 फिल्मों का फिल्मांकन किया था। गोदार्द और राउल ने मिल कर एक दर्जन से अधिक फिल्में बनाई।

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राउल कोटार्ड ने न केवल ज्यां लुक गोदार्द के साथ काम किया वरन अन्य कई दिग्गज सिने-निर्देशकों के सिनेमाटोग्राफर भी रहे। चार फिल्में उन्होंने फ्रांसुआ त्रूफो के लिए कैमरे में बांधीं। यही कारण है उन्हें ‘न्यू वेव सिनेमा की आंख’ का दर्जा प्राप्त है। गोदार्द के साथ उन्होंने ‘कन्टेंप्ट’, ‘ब्रेथलेस’ और ‘वीकेंड’ जैसी फिल्में की तो त्रूफो की प्रसिद्ध फिल्म ‘जूल्स एंड जिम’ तथा ‘द ब्राइड वोर ब्लैक’ आदि के लिए भी कैमरा संभाला।
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फर्मासुटिकल फर्म में एकाउंटेंट पिता के यहां 16 सितम्बर 1924 को पेरिस में पैदा हुए राउल कोटार्ड अपने मोबाइल कैमरा और लॉन्ग ट्रैकिंग शॉट्स के लिए जाने जाते हैं। वे हैंड-हेल्ड कैमरा तथा नेचुरल लाइटिंग के लिए भी ख्यात हैं। ब्लैक-व्हाइट फिल्मों में कमाल दिखाने का जादू उन्हें आता था, साथ ही उन्होंने यादगार रंगीन फिल्म भी बनाई। इसी कारण खिताब मिला, ‘द फर्स्ट सुपरस्टार सिनेमाटोग्राफर’।
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राउल कोटार्ड केमेस्ट्री पढ़ना चाहते थे, प्रवेश परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन पढ़ाई की फीस देने का बन्दोबस्त न हो सका अत: एक फोटो लैब में काम करने लगे। जैसा उन दिनों रिवाज था राउल 1945 में सेना में गए। वहां से लौट कर फ्रेंच मिलिट्री इन्फॉर्मेशन सर्विस केलिए युद्ध संबंधी फोटोग्राफी करने लगे।

मात्र इसे करके संतोष न था, इसके साथ वे ग्रामीण जीवन, तौर-तरीकों की फोटोग्राफी भी कर रहे थे। बाद में फ्रीलैंस फोटोग्राफर बन गए और ‘रडार’, ‘पेरिस मैच’ तथा ‘लाइफ’ जैसी पत्रिकाओं के लिए फोटोग्राफी करने लगे।

फिल्म- ‘द डेविल’स पास’

हनोई में काम करते हुए उनकी दोस्ती एक अन्य फोटोग्राफर से हुई और वे फिल्म फोटोग्राफी की ओर मुड़ गए। इस घटना को उन्होंने अपने एक संस्मरण, ‘ल’इम्पिरिआले ड वान सु: हाऊ आई ब्रोक इनटू द मूवीज वाइल ईटिंग ए बाउल ऑफ चाइनीज सूप’ (1977) में विस्तार से लिखा है। इसी दोस्त ने अपनी पहली फिल्म ‘द डेविल’स पास’ निर्देशित की और राउल कोटार्ड की भी बतौर फिल्म फोटोग्राफर यह पहली फिल्म बनी। फिर राउल ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

दोनों ने मिल कर ‘द 317थ प्लैटून’, ‘ड्रमर क्रैब’ आदि कई फिल्में बनाईं। 1984 में मियामी हेराल्ड ने लिखा, ‘राउल कोटार्ड के पास समुद्र को पिघली चांदी, डूबते सूरज को रक्त-अग्नि में परिवर्तित करने की कला आती है।’

राउल कोटार्ड ने त्रूफो की निर्देशित ‘शूट द पियानो प्लेयर’ तथा ‘द सोफ्ट स्किन’ जैसी फिल्मों की  फोटोग्राफी की थी। लेकिन कुछ समय बाद दोनों में खटपट हो गई। उनके और गोदार्द के रिश्तों में भी 1968 में राजनैतिक विचारधारा की भिन्नता के बाद दरार आ गई। लेकिन एक-दूसरे के लिए सम्मान बना रहा। अस्सी के दशक में दोनों ने मिल कर फिर से काम किया। गोदार्द की फिल्म ‘पैशन’ तथा ‘फर्स्ट नेम कैरमेन’ की शूटिंग राउल ने की।

जब न्यू वेव की धारा सूखने लगी तो राउल कोटार्ड ने स्वयं फिल्म निर्देशित करना प्रारंभ किया। वे 11 साल तक वियतनाम में फ्रीलैन्स सिविलियन फोटोग्राफर के रूप में रहे थे। निर्देशक की फिल्म उसके विचारों का प्रनिधित्व करती है। राउल कोटार्ड ने ‘होआ-बिन्ह’ (पीस) नामक फिल्म 1970 में बनाई यह ड्रामा-युद्ध फिल्म वियतनाम के बच्चों पर युद्ध के प्रभाव को दिखाती है। फिल्म को पुरस्कार मिले।

राउल ने कुल चार फिल्में निर्देशित की और चार फिल्मों में अभिनय भी किया। उनकी निर्देशित फिल्म ‘ऑपरेशन लेपर्ड’ काफी चर्चित रही। इसमें उन्होंने 1978 में जाइरे पर किए गए फ्रांस के सैनिक आक्रमण को दिखाया है। उनकी फिल्म ‘एसएएस इन सैन सैल्वाडोर’ की एक राजनैतिक थ्रिलर है।

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विश्व सिनेमा - फोटो : istock

राउल ने कभी मूवी कैमरा नहीं चलाया था, मगर उन्होंने 1958 में अफगानिस्तान में ‘द डेविल’स पास’ एडवेंचर फिल्म की शूटिंग की, फिल्म को बर्लिन फिल्म समारोह में सर्वोच्च पुरस्कार का नामांकन मिला। असल में उनसे कहा गया था कि कुछ फोटो लेने हैं। यदि वे जानते कि फिल्म बनानी है और उन्हें डॉयरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी का पद संभालना है, तो शायद वे कभी हां न कहते, ऐसा उन्होंने खुद 2001 में द गार्डियन पत्रिका को बताया। इसी फिल्म को देखने के बाद गोदार्द ने उन्हें अपनी पहली फिल्म ‘ब्रेथलेस’ के लिए ले लिया। और यह फिलम फ्रांस के सिनेमा केलिए मील का पत्थर साबित हुई।

फिल्म ‘ब्रेथलेस’ डॉक्यूमेंट्री शैली में बनी फिल्म है, जिसमें प्राकृतिक प्रकाश का उपयोग हुआ है, इस फिल्म के टटकेपन, ऊर्जा और कच्चेपन ने फ्रांस की चली आ रही चमकीली फिल्मों को धुंधला कर दिया और एक नई लहर चल निकली, जिसने पूरी दुनिया के सिनेमा को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

राउल ने श्वेत-श्याम तथा रंगीन दोनों तरह की फिल्मों के लिए काम किया। दोनों तरह की फिल्मों की उनकी समझ बहुत गहरी थी। वे मानते थे कि जब कैमरामैन रंगीन फिल्म के साथ काम कर रहा होता है, वह जानता है, मनुष्य की आंख जितना संवेदनशील कोई फिल्म स्टॉक नहीं होता है। समस्या है, उनके समय की तकनीक और काम करने का अभ्यास प्रारंभिक कलर स्टॉक के साथ विकसित हुआ था। प्रारंभ से उनका तात्पर्य टेक्निकलर जैसे से था, जो बहुत लचीला नहीं होता है। फिल्म की कलर तकनीक विकसित होती गई परंतु कई फोटोग्राफर वहीं अटके रहे।

इसमें आने वाली एक समस्या अभिनेताओं के मेक-अप से जुड़ी हुई है। कलर फिल्म के लिए मेक-अप जरूरी है। पहले के सारे मेक-अप मैन टेक्निकलर के लिए अभ्यस्त थे, वे अभिनेता का मेक-अप लाल करते थे, जो उस तकनीक के लिए आवश्यक था। जब लेबोरटरी इस लाल को सही करना चाहती थी, वे कुछ नीला मिलाते थे।


सिनेमाटोग्राफर की चुनौतियां

गोदार्द अपनी फिल्म दीवाल के संग फिल्माना पसंद करते थे, अगर दीवाल नीली हुई, तो सब चौपट हो जाता था, अत: सिनेमाटोग्राफर को इन तकनीक परिवर्तन की जानकारी होना आवश्यक है और इनके साथ उन्हें अपनी कार्य पद्यति में बदलाव लाना चाहिए। ये सब पुरानी बातें हैं। अब काफी कुछ बदल गया है। फिल्म स्टॉक में आमूलचूल परिवर्तन आ गया है। कोडाक्रोम में बिना मेक-अप के भी सर्वोत्कृष्ट फोटो आते हैं।

वे बताते हैं, गेवर्ट (जेवर्ट) 36 फिल्म स्टॉक, जिसका बनाना बंद हो गया है, के कारण फिल्म ‘लोला’ इतनी खूबसूरत बन पड़ी है। यह तकनीक सफेद को उत्तम सफेद और काले को उत्तम काले में पकड़ने में सक्षम थी। इसका दानेदार टेक्चर वास्तविकता और वायवी का भास देता था। इसी कारण ‘लोला’ का 70% लालित्य आता है।

ऐसा समझदार सिनेमाटोग्राफर 92 वर्ष की आयु में जब 8 नवम्बर 2016 को गुजरा तो शोक संदेशों की बाढ़ आ गई।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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