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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: ''प्रेमम्''- 'दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जाए

Fri, 17 Feb 2023 07:19 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Fri, 17 Feb 2023 07:19 PM IST
सार

21 पुरस्कारों वाली ‘प्रेमम्’ में प्रेम के गंभीर मसले को हास्य के छौंक के साथ प्रस्तुत किया गया है। यहां तक कि दिल टूटने जैसे हताश-उदास लम्हे भी हल्के-फुल्के ढंग से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।

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history of world cinema, Premam a Malayalam-language film
21 पुरस्कारों वाली ‘प्रेमम्’ फिल्म का दृश्य - फोटो : Twitter

विस्तार

वसंत का महीना, चारों ओर प्रेम की खुशबू हवाओं में। दिल में, ऐसे में कहीं से हूक उठती है, ‘धीरे धीरे मचल ए दिले बेकरार कोई आता है...’

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और लो वो आ गई, अपनी छोटी बहन के साथ। स्कूल जाती हुई, घने बालों की दो अधखुली चोटी में। साइकिल थामे हुए कई दिल एक साथ धीरे-धीरे नहीं, जोर-जोर से, जल्दी-जल्दी मचलने लगे। एक खास ने आज पहली बार दाढ़ी बनाई है। साइकिल दोस्तों को थमा कर वह जल्दी से कल्पना में डूब गया। वह नाव खे रहा है, लड़की के घने बाल खुल कर उसके चेहरे के चारों ओर वलय बना उसे एक नई आभा प्रदान कर रहे हैं।
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ऐसा नहीं है कि लड़की उसके प्रेम से बेखबर है, उसके आते ही छोटी बहन अपनी चेची को बता देती है कि वह पीछे आ रहा है। लड़की घूम कर देखती है और लड़के की बांछें खिल जाती हैं। यह देखते ही उमर दराज दर्शकों में से अधिकांश अपने पुराने दिनों में उतर जाते हैं, जब वे साइकिल लिए अपनी लड़की का पीछा करते थे या लड़के साइकिल लिए आते थे और लड़कियां इठलाती, हुई बलखाती हुई, चोटी लहराती हुई चला करती थीं।
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एक जमाने में वैलेंटाइन डे न था, न ही वैलेंटाइन वीक था। मगर प्यार तब भी हुआ करता था। जब फ़ूल खिलता था, तो अनगिनत भौंरे मंडराते थे। उसी में हीरो भी हुआ करता था।
 

2015 की फिल्म 1984 की कहानी

वैसे फिल्म बनी है 2015 में मगर इसमें प्रेम प्रारंभ होता है 1984 में। लड़का अभी स्कूल समाप्त कर प्रेम का नशा चख रहा है और लड़की अभी स्कूल में है। मैं बात कर रही हूं मलयालम फ़िल्म ‘प्रेमम्’ की। ढ़ाई घंटे की इस फिल्म में निर्देशक अल्फ़ोन्स पुतरन सिद्ध कर देते हैं कि खूबसूरती छोटी-छोटी चीजों-बातों में होती है। उन्हें कहानी कहने का जादुई तरीका आता है, जिसकी शुरुआत क्रेडिट से हो जाती है।

केरल की प्राकृतिक हरियाली में एक तितली का उड़ती फिरना दर्शक को फिल्म की थीम थमा देता है। प्रेम पर अनगिनत भाषाओं में, काल में, देश में साहित्य में लिखा गया है, सिनेमा के परदे पर उतारा गया है। इसी शाश्वत प्रेम को, कथन की शैली इसे एक-दूसरे से भिन्न और नवीन बनाती है, और अल्फ़ोन्स कहानी कहना जानते हैं।

जॉर्ज, जिस कैरी के पकने का इंतजार कर रहा था वह किसी और की होने वाली थी। मजे की बात है मेरी के पिता का नाम जॉर्ज (रेन्जी पणिकर) है, उसके एक कजिन का नाम जॉर्ज है और हीरो तो जॉर्ज (निविन पॉली) है ही। मगर पहली बार का प्रेम सफल हो ऐसा कदाचित होता है। किससे प्यार होगा, कौन जीवन साथी बनेगा, यह भविष्य के गर्भ में होता है।

जॉर्ज डेविड के साथ भी यही होता है। प्रथम ही नहीं द्वितीय प्रेम भी उसके हाथ से निकल अजता है। प्रेम एक रंग-रूप में नहीं आता है, एक बार ही नहीं आता है। इसके कई रंग, कई छटाएं होती हैं। कब कहां और किससे हो जाए भला कौन बता सकता है?

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प्रेम के गंभीर मसले की फिल्म

21 पुरस्कारों वाली ‘प्रेमम्’ में प्रेम के गंभीर मसले को हास्य के छौंक के साथ प्रस्तुत किया गया है। यहां तक कि दिल टूटने जैसे हताश-उदास लम्हे भी हल्के-फुल्के ढंग से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। लड़कों का खूबसूरत मेरी (अनुपमा परमेश्वरन) के घर का चक्कर लगाना, मेरी के पिता का उनको खदेड़ना, दिल टूटना, डेविड जॉर्ज का रोना-बिसूरना, इन सबके साथ फिल्म आगे बढ़ती है।

अब बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ जॉर्ज प्रि-डिग्री पार कर कॉलेज पहुंच गया है। उसका अपना गैंग है, वह पीता, लड़ता-झगड़ता है, जूनियर छात्रों को पीटता है। मतलब पढ़ाई के अलावा ये लड़के सब करते हैं। जिंदगी एक बार फ़िर पलटा खाती है। जॉर्ज को एक बार फिर से प्यार होता है। इस बार उसे प्रेम होता है, अपने कॉलेज की गेस्ट लेक्चरर मलर से। मलर यानि साई पल्ल्वी। साई पल्लवी की एक तरह से यह पहली मलयालम फ़िल्म है, वैसे आदिवासी परिवार में जन्मी यह अभिनेत्री इसके पहले दो (एक मलयालम और एक तमिल) फ़िल्म में काम कर चुकी थी, मगर रोल छोटा था, अत: क्रेडिट में नाम नहीं आता है।

उसकी सादगी, खूबसूरती और क्षमता पर जॉर्ज पहली झलक में मर मिटता है। मलर को भी खास इंकार नहीं है। पर दिल क्या करे? कॉलेज के हकले लेक्चरर विमल (विनय फोर्ट) का दिल भी मलर की गिरफ़्त में है। वह आती गेस्ट लेक्चरर के रूप में है, पर छा जाती है। उसका आत्मविश्वास, उसकी अभिनय कुशलता सब देखने, अनुभव करने की बात है। हाय रे! जॉर्ज की किस्मत! यह बेल भी मेढ़े नहीं चढ़ती है।

निविन पॉली ने तीनों भूमिकाएं कुशलतापूर्वक करके सिद्ध कर दिया कि वे विभिन्न भूमिकाएं करने में सक्षम हैं। वैसे एक साल पहले वे खुद को ओम शांति ओशाना में बखूबी प्रमाणित कर चुके थे। ‘प्रेमम्’ में किशोर के रूप में निविन नर्वस, भयभीत, प्रेम निवेदन में लड़खड़ाते हुए, खोए-खोए से नजर आते हैं, तो युवा के रूप में अधिक सुनिश्चित और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं, जिसे अपनी टीचर से प्रेम निवेदन में कोई झिझक नहीं होती है।

निवेदन के बाद यह कहना भी जॉर्ज नहीं भूलता है कि वह पिए हुए नहीं है। और सन 2014 में वह मुस्कुराते युवा से फोर्ट कोच्ची में एक्जोटिक केक-पेस्ट्री की हाई क्वालिटी बेकरी-केफे चलाने वाला एक प्रौढ़, गुस्सैल, कड़क आदमी है। और फिर उसे मिलती है सेलीन (मैडोना सेबास्टीयन)। आई तो वह उसके ही अतीत से है, पर नए वेष, नए परिवेश में नई युवती के रूप वह जॉर्ज को मिलती है। फिर क्या होता है? कैसे होता है? आप स्वयं देखें। पर निविन पॉली हर भूमिका के साथ न्याय करते हैं, कभी भी सस्ते रोमियो नहीं दीखते हैं।

बाकी अभिनेताओं ने भी सटीक अभिनय किया है। संवाद (इंग्लिश सबटाइटिल) मजेदार हैं। उम्र के अलग-अलग दौर में प्रेम कैसे रंग दिखाता है, इसे कैमरामैन आनंद सी. चंद्रन ने पकड़ा है और दर्शकों तक संप्रेषित किया है। राजेश मुरुगेशन का संगीत कर्णप्रिय है।

अब देर क्यों कर रहे हैं? मौसम भी है, रुत भी है और रिवायत भी। जल्दी से इस सहज-स्वाभाविक प्रेम भरी फिल्म को देख लीजिए। फिल्म बताती है, ‘दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जाए...’। याद रखिए, ‘प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है, हर खुशी से हर गम से बेगाना होता है...’।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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