विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: दिलीप गुप्ता- कैमरे के पीछे
बिमल राय के साथ दिलीप गुप्ता ने ‘बिराज बहु’, ‘प्रेम पत्र’, ‘मधुमति’, ‘बेनजीर’ और ‘दो दूनी चार’ में काम किया। निर्देशक बिमल राय और फोटोग्राफर दिलीप गुप्ता दोनों ‘मधुमति’ को अपनी श्रेष्ठ फिल्म स्वीकारते हैं। दोनों ने मिल कर इस श्वेत-श्याम फिल्म में परदे पर सौंदर्य को मूर्तिमान कर दिया।
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इसमें शक नहीं कि वैजयन्ती माला बहुत खूबसूरत हैं। चाहे वह ‘देवदास’, ‘नया दौर’, ‘संगम’ हो अथवा ‘गंगा जमुना’ या उनकी कोई अन्य फिल्म हो, वे बहुत खूबसूरत लगती हैं। मगर ‘मधुमति’ में उनका टटका रूप और उस फिल्म की फोटोग्राफी उनके सौंदर्य को एक नई ऊंचाई देती है। यहां उनका कोहरे से निकलता, पेड़ों में लुकता-छिपता रूप हीरो और दर्शक की उत्सुकता जगाता है। वे सुंदर हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है मगर इस सौंदर्य को और निखार कर परदे पर लाने का श्रेय जिस व्यक्ति को जाता है, उससे बहुत कम लोग परिचित हैं।
कैमरामैन पर बहुत कम बात होती है। हिन्दी फिल्मों के शुरुआती दौर के इस फोटोग्राफर का जन्म कलकत्ता (आज के कोलकाता) के एक जमींदार परिवार में 4 सितंबर 1911 को हुआ था। पूरा नाम था दिलीप कुमार दत्ता गुप्ता।
दिलीप गुप्ता जब मात्र छ: वर्ष के थे, पिता का साया उनके सिर से उठ गया, मां ने पालन-पोषण किया। दिलीप गुप्ता का पढ़ने में बहुत मन नहीं लगता था। शैलेंद्र गुप्ता और ज्योत्सना देवी के इस पुत्र ने मुख्यरूप से हिन्दी सिनेमा के लिए काम किया। उन्होंने बांग्ला और मराठी फिल्मों की फोटोग्राफी भी की। उन दिनों सिनेमाटोग्राफर को फोटोग्राफर कहा जाता था।
उन्होंने बिमल राय के अलावा फणि मजुमदार, पी. सी. बरुआ, चिमनलाल त्रिवेदी, नितिन बोस, नासिर हुसैन, एम भवनानी, प्रह्लाद केशव अत्रे, सुधीर सेन तथा द्वारका खोसला की फिल्म की सिनेमाटोग्राफी की। सबसे अच्छी ट्यूनिंग फिल्म निर्देशक बिमल राय के साथ थी।
बिमल राय के साथ उन्होंने ‘बिराज बहु’, ‘प्रेम पत्र’, ‘मधुमति’, ‘बेनजीर’ और ‘दो दूनी चार’ में काम किया। निर्देशक बिमल राय और फोटोग्राफर दिलीप गुप्ता दोनों ‘मधुमति’ को अपनी श्रेष्ठ फिल्म स्वीकारते हैं। दोनों ने मिल कर इस श्वेत-श्याम फिल्म में परदे पर सौंदर्य को मूर्तिमान कर दिया है।
18 साल की उम्र में सहायक के रूप में किया काम
18 वर्ष की अवस्था में पढ़ाई छोड़ कर नितिन बोस के सहायक के रूप में ‘धूप छाया’ तथा ‘प्रेसीडेंट’ में काम किया। पी. सी. बरुआ की ‘देवदास’ फिल्म को फिल्माने में कैमरामैन बिमल राय के सहायक का पद संभाला था। उन दिनों तक भारत में बार्न डोर्स (प्रकाश संशोधक) या कटर का प्रयोग नहीं होता था। सेट्स लाइट से भरे रहते थे। अत: वे 1932 में प्रशिक्षण के लिए अमेरिका गए।
लौट कर दिलीप गुप्ता ने प्रकाश और छाया के अद्भुत प्रयोग किए। इसे अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में प्रयोग किया। लाइटिंग की इंडोर और आउटडोर टोन की समानता पर ध्यान दिया। वे स्टूडियो में रात फिल्माने के लिए नीले फिल्टर का उपयोग करते।
श्वेत-श्याम में आयाम प्रकट करने की चुनौती स्वीकारी और श्वेत-श्याम में करिश्मा कर दिखाया। त्वचा के टोन की एकसारता के लिए कैमरे पर हरे फिल्टर का प्रयोग करते। कभी भी अपनी फिल्मों को ओवर-डेवलेप या अंडर-डेवलप नहीं किया। उनके नेगेटिव सदैव स्वाभाविक रूप से डेवलप किए जाते थे। पूरे देश के लिए एक-सा प्रिंट बनाने पर वे जोर देते।
डिफ्यूज प्रभाव के लिए वे सॉफ्ट रिफ्लेक्टर का उपयोग करते। ‘मधुमति’ में आउटडोर और इनडोर (जिसे आउटडोर दिखाया गया है) का अच्छा मिश्रण हुआ है, बताना मुश्किल है, कौन आउटडोर है, कौन स्टूडियो में फिल्माया गया सीन है। आश्चर्य नहीं इस फिल्म ने नौ फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते। उस साल फिल्मफेयर का नव-स्थापित फोटोग्राफर पुरस्कार दिलीप गुप्ता को मिला।
‘मधुमति’ में कैमरे का कमाल
‘मधुमति’ में उन्होंने रहस्य और सौंदर्य का अनोखा तालमेल बैठाया है। तूफान, बारिश, बिजली की कड़क, बादलों की गड़गड़ाहट को फिल्माने में वे माहिर थे। ‘मधुमति’ का क्लाइमेक्स सीन झाड़-फानुस के साथ है। अभिनेता दिलीप कुमार हवेली में प्राण का चित्र बना रहे हैं। तेज हवा चल रही है, परदे उड़ रहे हैं। बिजली कड़क रही है। दिलीप कुमार बातों से प्राण के मन में भय उत्पन्न कर रहे हैं।
वे पेंटिंग देखने के लिए प्राण को बुलाते हैं, झाड़-फानुस नीचे करते हैं, ताकि चित्र पर रोशनी पड़ सके। मगर चित्र पर खून है। अपने चित्र पर खून देख कर प्राण दहशत से भर जाता है। इसके बाद झाड़-फानुस पैन्डुलम की तरह हिलने लगता है। हिरोइन, जिसे प्राण मरी हुई मानता था, वहां आती है। ज्यों ही प्राण उस पर गोली चलाना चाहता है, झाड़-फानुस टूट कर नीचे गिर पड़ता है, चूर-चूर हो जाता है और धुप्प अंधेरा हो जाता है। दर्शक रोमांच से भर जाता है।
लाइटिंग और साउंड से सृजित इस सीन के लिए दिलीप गुप्ता को काफी मेहनत करनी पड़ी। बिजली कड़कने पर अचानक खिड़की चमक उठती है, हिलते परदे पर प्रकाश परिवर्तित होता जाता है। हिलती-डुलती छायाएं हवेली के बाहर और चरित्रों के भीतर, उनके मन में चल रहे तूफान को दिखाती हैं। तब दिलीप कुमार कमरे के दूसरी ओर जा कर झाड़-फानुस नीचे करते हैं। दिलीप गुप्ता का कैमरा दर्शक में रहस्य, भय, रोमांच की सृष्टि करता है।
ज्यों-ज्यों दिलीप कुमार झाड़-फानुस नीचे करते हैं, छायाएं परिवर्तित होती जाती हैं। फानुस हिलता है, छायाएं हिलती हैं। फानुस टूटने से अंधेरा हो जाता है, ठीक उसी समय वैजयन्ती माला आती हैं। चरित्रों की धुंधली छायाएं दिखती हैं। फानुस की रोशनी बंद होने पर चरित्र अंधेरे में घूमते हुए दीखते हैं।
डेब्री कैमरे का प्रयोग
कैमरामैन के रूप में उन्होंने सबसे पहले डेब्री कैमरे का प्रयोग किया। डेब्री के बाद वे मिचेल को काम में लाने लगे। ‘मधुमति’ के लिए उन्होंने आउटडोर के लिए आर्टेफ्लैक्स तथा मिचेल दोनों का प्रयोग किया। हर कैमरे के साथ इमेज की गुणवत्ता बदल जाती है। डेब्री सॉफ्टनेस की अनुभूति देता है, पिक्चर में शार्पनेस नहीं आती है।
दिलीप गुप्ता को सॉफ्टनेस चाहिए होती तो वे इसे लाइटिंग तथा डिफ्यूजर की सहायता से उपलब्ध कर लेते। काली पट्टी तथा एमपी डिफ्यूजर का उपयोग करते। कभी-कभी शार्पनेस के लिए वे काली पट्टी में छेद कर देते। इसे वे खासतौर से हिरोइन के लिए प्रयोग करते।
‘मधुमति’ का उनका सबसे मनपसंद गीत ‘आजा रे...’ है, इसे खास ट्रीटमेंट दिया है। पहले दूर से गाना केवल सुनते हैं। कोई दिखता नहीं है, कौन गा रहा है, यह पता नहीं चलता है। हीरो और दर्शक के मन में उत्सुकता जगती है। फिर जब हीरो इस आवाज को सुनता है, तो वह का पीछा करता है, साथ-साथ दर्शक भी। जब भी हीरो और दर्शक आवाज को सुनते हैं, लड़की की झलक पाते हैं, वह दूर है, कभी पेड़ों की ओट में, कभी मात्र उसकी छाया दीखती है, कभी वह धुंध में लिपटी हुई नजर आती है। वायवी स्वर और लुकती-छिपती आकृति मिल कर वास्तविकता और कल्पना का अद्भुत निर्माण करती है।
1936 में दिलीप गुप्ता ने नीलिमा (लिली) से शादी की। रत्ना, चंपा, दीपा, रीता व मानसी- इनकी पांच बेटियां हैं। पृथा सेन संपादित ‘ए पोर्ट्रेट ऑफ दिलीप गुप्ता: दि आर्टिस्ट हू पेंटेड विथ लाइट एंड सैडो’ केलिए चंपा राय ने सामग्री उपलब्ध कराई। बिमल राय मेमोरियल समिति ने 1997 में दिलीप गुप्ता को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया। मद्रास में 1999 में दिलीप गुप्ता की मृत्यु हुई।
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