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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: सर्वोत्तम देने वाले ऑर्दर मिलर

Mon, 29 Jul 2024 05:13 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Mon, 29 Jul 2024 05:13 PM IST
सार

ऑर्दर मिलर न्यूयॉर्क सिटी के करीब लॉन्ग आइलैंड में 8 जुलाई 1895 को पैदा हुए थे और मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने सिनेमाटोग्राफर डॉयरेक्टर फ्रेड जे. बैल्शोफर की शागिर्दी शुरू कर दी थी।

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history of world cinema Arthur Miller American cinematographer
सिनेमा का इतिहास - फोटो : Freepik

विस्तार

147 फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी करने वाले ऑर्दर मिलर ने 3 ऑस्कर अपने नाम किए। विख्याति के चलते उनकी जीवनी लिखी गई। दो लोगों ने उनकी जीवनी लिखी, एक फ्रेड जे. बैल्शोफर ने ‘वन रील ए वीक’ नाम से लिखी और दूसरी लियोनार्ड मैल्टिन ने ‘बिहाइंड द कैमरा’ नाम से लिखी। क्यों न लिखी जाए? आखिर उन्हें हॉलीवुड का एक सर्वाधिक उपलब्धि वाला और श्वेत/श्याम सिनेमाटोग्राफी का कैमरामैन माना जाता है।

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करीब-करीब सिनेमा के साथ ही जन्मे ऑर्दर मिलर न्यूयॉर्क सिटी के करीब लॉन्ग आइलैंड में 8 जुलाई 1895 को पैदा हुए थे और मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने सिनेमाटोग्राफर डॉयरेक्टर फ्रेड जे. बैल्शोफर की शागिर्दी शुरू कर दी थी। दोनों ने मिलकर एक किताब, ‘टू रील्स एंड ए क्रैंक’ लिखी। मिलर की इस सिने-निर्देशक के साथ बनाई मूक लघु फिल्म 1909 की ‘द ट्रू हार्ट ऑफ एन इंडियन’ खूब सफल रही।

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सीरियल ‘द पेरिल्स ऑफ पाउलीन’

1914 में मिलर ने ‘द पेरिल्स ऑफ पाउलीन’ सीरियल की फोटोग्राफी की और 1932 में फॉक्स स्टूडियो के साथ एक लंबा करारनामा किया। असल में इसी के आसपास उन्होंने कई स्टूडियो से कॉन्ट्रेक्ट किया। वे मेट्रो-गोल्डविन-मेयर केलिए काम कर रहे थे, पुराने पाथे स्टूडियो का काम भी उनके पास था और यूनिवर्सल की फोटोग्राफी भी वे कर रहे थे। इसके पहले उन्होंने डिमिली के साथ काम किया था।

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मिलर ने डोनाल्ड क्रिस्प, जॉन फोर्ड, एलान हैले, विलियम बियुडाइन आदि सिने-निर्देशकों के लिए काम किया। पाथे के यहां वे हेड कैमरामैन थे। उन दिनों डॉयरेक्टर ऑफ सिनेमाटोग्राफर को हेड कैमरामैन ही कहा जाता था। वहीं काम करते हुए उन्होंने उन दिनों के हिसाब से मंहगे (25,000 डॉलर) ‘द पेरिल्स ऑफ पाउलीन’ सीरियल की फोटोग्राफी की।

ये सिने-निर्देशक अलग-अलग काम करने के लिए जाने जाते थे। मिलर एक पर्फेक्शनिस्ट थे, वे मनचाहा परिणाम पाने के लिए कुछ भी करते थे। यदि वे सीन को चमकीला बनाना चाहते थे, जरूरत पड़ने पर फर्नीचर और लकड़ी के सामान को फिर से पॉलिश करवाते थे। वे फोटोग्राफी में सर्वोत्तम के तलबगार थे। कम से कभी संतुष्ट न होते थे। जबकि सिने-निर्देशक विलियम बियुडाइन एक टेक में काम चलाने के पक्षधर थे, सीन चाहे जैसा भी शूट हो, गलतियां हों, तो हों, वे दोबारा टेक नहीं करना चाहते थे।

ऑर्दर मिलर और जॉन फोर्ड की जोड़ी

दूसरी ओर जॉन फोर्ड उन्हें पूरी स्वतंत्रता देते जैसा चाहें प्रकाश की व्यवस्था करें और जैसा चाहें वैसा फिल्मांकन करें। इसीलिए जॉन फोर्ड को छ: बार ऑस्कर पुरस्कार मिले एवं वे मिलर के पसंददीदा सिने-निर्देशक रहे। फोर्ड द्वारा निर्देशित ‘वी विली विन्की’ का फिल्मांकन मिलर ने 1937 में किया। करीब पौने दो घंटे की फिल्म रडयार्ड किपलिंग की कहानी पर आधारित है। यहीं से दोनों की जोड़ी बनी।

शेर्ली टेम्पल द्वारा अभिनीत इस फिल्म की कहानी कुछ यूं है, नौ साल की बच्ची प्रिसिला विलियम्स (शेर्ली टेम्पल) अपनी विधवा मां एवं अपने बाबा के साथ रहती है। बाबा भारत में पोस्टेड है। यह मिलर की फोटोग्राफी का कमाल था कि युद्ध की आशंका और भयंकर मंदी के दौरान भी दर्शक यह फिल्म देखने टूटे पड़ते थे और शेर्ली टेम्पल बॉक्स ऑफिस सेन्सेशन बन गई।

ऑर्दर मिलर और जॉन फोर्ड की जोड़ी की एक अन्य फिल्म है, ‘हाऊ ग्रीन वाज माई वैली’ (1941)। करीब दो घंटे की इस फिल्म को पांच ऑस्कर मिले। जिसमें सर्वोत्तम फिल्म, सर्वोत्तम निर्देशन (जॉन फोर्ड), सर्वोत्तम सहायक अभिनेता (डोनाल्ड क्रिस्प) के साथ सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफी का ऑस्कर भी शामिल था।

मिलर के अनुसार वे वास्तविक जीवन जैसी फिल्म बनाते और बाद में उसे आंखों केलिए थोड़ा सुंदर बनाते। यही उनका सिद्धांत था।मिलर और फोर्ड की जोड़ी ने सफलता पाई क्योंकि फोर्ड को सिने-उद्योग का बाहर-भीतर ज्ञात था और मिलर को फोटोग्राफी के गुर मालूम थे। फोर्ड से उनका संवाद खूब सघन था, बिना बोले वे एक-दूसरे की बात समझ लेते थे।

ऑर्दर मिलर ने ‘हिज सुप्रीम मोमेंट’ (1915), ‘न्यू यॉर्क’ (1916), ‘ए थीफ इन पैराडाइज’ ‘(1925), ‘ब्राइट आइज’ (1934), ‘द लिटिल कर्नल’, (1935), ‘रबेका ऑफ सनीब्रूक्स फॉर्म’ (1938), ‘द लिटिल प्रिंसेस’ (1939), ‘हाऊ ग्रीन वाज माई वैली’ (1941), निर्देशक विलियम ए. वेलमैन की ‘दि ओक्स-बॉक्स इंसीडेंट’ (1942), सिने-निर्देशक ओटो प्रिमिंगर की ‘वर्लपूल’ (1950), सिने-निर्देशक जोसेफ लोसे की प्रोवलर’ (1951) आदि फिल्मों की शूटिंग की। वैसे सिने-निर्देशक कोई भी हो मिलर अपना शत-प्रतिशत देते। आखीर किसी को कैमरा पकड़ने के लिए यूं ही तो ऑस्कर नहीं मिल जाते हैं, वह भी एक से अधिक बार।  




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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