इसलिए स्कूलों में अंग्रेजी शामिल की थी ब्रिटिश सरकार ने, भारत के सामने हैं ये बड़ी चुनौतियां
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सार्वजनिक शिक्षा एक आधुनिक विचार है, जिसमें सभी बच्चों को चाहे वे किसी भी लिंग, जाति, वर्ग, भाषा आदि के हों, शिक्षा उपलब्ध कराना शासन का कर्तव्य माना जाता है। भारत में वर्तमान आधुनिक शिक्षा का राष्ट्रीय ढांचा और प्रबन्ध औपनिवेशिक काल और आजादी के बाद के दौर में ही खड़ा हुआ है। 1757 में जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के हुकूमत की शुरुआत हुई तब यहां राज्य द्वारा समर्थित एवं संचालित कोई ठोस शिक्षा व्यवस्था नहीं थी। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों की अपनी निजी शिक्षा व्यवस्थाएं थीं।
बहरहाल, प्रारंभ में अंग्रेजों की नीति भारत में पहले से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था का सहयोग करने की थी और जोर इस पर था कि देश का शासन चलाने में उनकी मदद करने के लिए भारतीय अधिकारियों को संस्कृत,फारसी और अरबी में अच्छी तरह निपुण किया जाए और परंपरागत हिन्दू और मुस्लिम अभिजात वर्ग में अपनी साख बनाई जा सके। इसी को ध्यान में रखते हुए 1781 में इस्लामी अध्ययन मुहैया कराने के लिए कलकत्ता मदरसा, 1792 में बनारस में बनारस संस्कृत कालेज आदि की स्थापना की गई।
कालांतर में इस नीति में बदलाव हुआ अंग्रेजी शासन के लिए आधुनिक शिक्षा प्राप्त वर्ग की जरूरत महसूस की गई. भाव भी था कि कैसे अज्ञानी भारतीयों को अंधकार से दूर करके उन्हें सभ्य बनाया जाए जिसमें यूरोप के विज्ञान, कला, अंग्रेजी शिक्षा इसे ईसाइयत के प्रचार को साधन भी माना गया। मैकाले के अनुसार-‘अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तियों के एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना था जो रंग और रक्त में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हो। एक ऐसा वर्ग जो सरकार और लाखों लोगों के बीच मध्यस्थ के तौर पर सेवा दे सके।’
इसके बाद 1837 में बड़ा बदलाव होता है और राजकाज एवं न्यायालय की भाषा से फारसी को हटाकर अंग्रेजी कर दी जाती है। 1844 में इस बात की विधवत घोषणा कर दी जाती है कि सरकारी नियुक्तियों में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को ही तरजीह दी जाएगी। इसी के साथ ही कलकत्ता,मद्रास और बम्बई विश्वविद्यालयों जैसे आधुनिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाती है। इस दौर में एक खास बात यह होती है कि ईस्ट इंडिया कंपनी मिशनरियों और बर्तानी हुकूमत द्वारा स्थापित स्कूल-कालेज सभी भारतीयों के लिए खुले थे। इस दौरान अंग्रेजो द्वारा एक स्पष्ट नीति अपनाई गई कि किसी अछूत बच्चे के सरकारी स्कूल में प्रवेश से इंकार नहीं किया जाएगा।
यह एक बड़ा बदलाव था जिसने सभी भारतीयों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोल दिया। 1911 में गोपाल कृष्ण गोखले ने प्राथमिक शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य करने का प्रयास किया। पहली बार किसी राष्ट्रीय मंच से अनिवार्य शिक्षा का सवाल उठाया गया। इसके विरोध में सरकारी पक्ष के सदस्य एवं सामंती तत्व एकजुट हो गए। फलतः गोखले का प्रस्ताव बहुमत से खारिज हो गया, लेकिन गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा उठाई गई अनिवार्य शिक्षा की मांग अभी तक बनी हुई है।
आजादी के बाद भारतीय राज्य का फोकस प्राथमिक शिक्षा पर नहीं था इसलिए शुरुआती वर्षों में इसे लेकर कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए पूरा जोर उद्योगिकी विकास और उच्च शिक्षा पर था, इसलिए 1948 में उच्च शिक्षा के लिए राधाकृष्णन आयोग का गठन किया गया। इसी तरह 1952 में दूसरा आयोग गठित किया गया जिसका संबंध माध्यमिक शिक्षा से था। प्राथमिक शिक्षा पर आते आते लगभग 17 साल लग गए और 1964 में कोठारी आयोग का गठन किया गया। प्रो. दौलत सिंह कोठारी अध्यक्षता में गठित यह भारत का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था जिसने प्राथमिक शिक्षा पर विचार किया और इसको लेकर कुछ ठोस सुझाव दिए।
पहला आयोग था जिसने सामंती एवं परंपरागत ढांचे परआधारित औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली का पुरजोर विरोध् किया। उन्होंने कहा ‘अब देश को ऐसे शिक्षा प्रणाली की जरूरत है जो अपने में बुनियादी मानवीय मूल्यों को समाहित करते हुए आधुनिक लोकतांत्रिक समाजवादी समाज के जरूरतों के अनुरूप हो।’कोठारी आयोग ने विस्तार से भारतीय-शिक्षा पद्धति का अध्ययन किया. इसके परिणामस्वरूप ही वर्ष 1968 में भारत की पहली “राष्ट्रीय शिक्षा-नीति” अस्तित्व में आ सकी।
कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा के निम्न उद्देश्य निर्धारित किए
सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास,
जनतंत्र के सुद्रढ़ बनाना,
देश का आधुनिकीकरण करना,
सामाजिक, नैतिक तथा अध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना उत्पादन में वृद्धि करना,
कोठारी आयोग के कई ऐसे महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे जो आज भी लक्ष्य बने हुए हैं। आयोग या सुझाव था कि समाज के अन्दर व्याप्त जड़ता सामाजिक भेद-भाव को समूल नष्ट करने के लिए समान स्कूल प्रणाली एक कारगर औजार होगा। समान स्कूल वयवस्था के आधार पर ही सभी वर्गों और समुदायों के बच्चे एक साथ सामान शिक्षा पा सकते हैं अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज के उच्च वर्गों के लोग सरकारी स्कूल से भागकर प्राइवेट स्कूलों का रुख़ करेंगे और पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी।
आजादी के बाद गठित सभी शिक्षा आयोगों में एक बात पर आम राय रही है कि शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए समान स्कूली शिक्षा व्यवस्था को स्थापित करना पहला कदम है. लेकिन इन सिफारिशों को हकीकत में बदलने के लिए क्रियान्वयन की कोशिश आज भी एक सपना है। सावर्जनिक शिक्षा लगातार कमजोर हुआ है और अब यहां ज्यादातर सबसे कमजोर तबकों के बच्चे ही जाते हैं। जनगणना(2011) के मुताबिक़ 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल ही नहीं जाते है जबकि 78 लाख बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल तो जाते हैं लेकिन इसके साथ काम पर भी जाते हैं। अनिवार्य शिक्षा का प्रश्न गोखले के सौ बरसों के बाद मुंह बाए खड़ा है। इतना अवश्य हुआ कि 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया।
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