हिंदी दिवस विशेष: अब संसद में अभिव्यक्ति की मुख्य भाषा हिंदी ही है
अगर संसद भारत की आत्मा है तो हिंदी के हक में एक बहुत ब़ड़ा बदलाव वहां दिखाई पड़ता है। पहली लोकसभा में जितने सांसद देश भर से चुन कर आए थे, उनमें से साठ फीसदी प्राय: अंग्रेजी में ही अपनी बात रखते थे। केवल हिंदी भाषी प्रदेशो के सांसद ही हिंदी में बोलते थे और उनमें से भी कुछ ऐसे थे, जो अंग्रेजी में ज्यादा बोलना पसंद करते थे बजाए हिंदी के। अब भाषायी अभिव्यक्ति के स्तर पर संसद का परिदृश्य बहुत कुछ बदला हुआ है। आज अठारहवीं लोकसभा ( और राज्यसभा में भी) में 70 फीसदी से ज्यादा सांसद हिंदी में अपनी बात रखते हैं या फिर ऐसा करने की कोशिश करते हैं।
अगर संसद भारत की आत्मा है तो हिंदी के हक में एक बहुत ब़ड़ा बदलाव वहां दिखाई पड़ता है। पहली लोकसभा में जितने सांसद देश भर से चुन कर आए थे, उनमें से साठ फीसदी प्राय: अंग्रेजी में ही अपनी बात रखते थे। केवल हिंदी भाषी प्रदेशो के सांसद ही हिंदी में बोलते थे और उनमें से भी कुछ ऐसे थे, जो अंग्रेजी में ज्यादा बोलना पसंद करते थे बजाए हिंदी के। अब भाषायी अभिव्यक्ति के स्तर पर संसद का परिदृश्य बहुत कुछ बदला हुआ है। आज अठारहवीं लोकसभा ( और राज्यसभा में भी) में 70 फीसदी से ज्यादा सांसद हिंदी में अपनी बात रखते हैं या फिर ऐसा करने की कोशिश करते हैं।
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विस्तार
हिंदी को राजभाषा बनने के 75 सालों में एक गुणात्मक बदलाव यह आया है कि अब हिंदी को भारत की प्रतिनिधि भाषा के रूप में वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार कर लिया गया है, भले ही किंतु-परंतु के साथ। कमोबेश यही स्थिति भारत के भीतर भी है। हिंदी की यह स्वीकार्यता भाषा को लेकर की जाने वाली क्षुद्र राजनीति के बाद संभव हुई है।
बीते दस सालों में हिंदी को शीर्ष स्तर पर स्थापित करने के जो सायास अथवा मजबूरी में जो प्रयास हुए हैं, उनका असर यह है कि कई बार न चाहते हुए राजनीति और प्रशासन के शीर्षस्थ लोगों को भी हिंदी को स्वीकारना पड़ा है, पड़ रहा है। इसका काफी हद तक श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी देना पड़ेगा, जिन्होंने अहिंदी भाषी होने के बाद भी हिंदी को हर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया है।
दरअसल, उन्होंने सत्ता शीर्ष को अंग्रेजी न आने की ग्लानि से भी पूरी तरह मुक्त किया है। अब यह मान लिया गया है कि आप अंग्रेजी का हाथ छोड़ें न छोड़ें, लेकिन हिंदी को तो अपने साथ रखना ही होगा। क्योंकि हिंदी अब सबसे बड़ी संपर्क भाषा है और भारत की आत्मा को जानने की कुंजी है।
हिंदी का बदलता परिदृश्य और विस्तार
हिंदी की यह ‘विजय यात्रा’ उसके आधिकारिक राष्ट्रभाषा बन पाने अथवा न बन पाने, देश में अंग्रेजी के वर्चस्व का रोना रोते रहने, प्रौद्योगिकी, कॉरपोरेट, उच्च न्यायपालिका व अन्य कुछ क्षेत्रों में अंग्रेजी के ही छाए रहने जैसी कुढ़न के बावजूद जारी है। फर्क इतना है कि हिंदी जिस नए स्वरूप, तेवर और पाचकता के जीवन के विविध क्षेत्रो में घुस रही है, पनप रही है, वो कई परंपरावादियों, शुद्धतावादियों और हिंदी के ठेकेदारो को रास नहीं आ रही है, इसलिए लगातार विस्तारित होती हिंदी पर कई बार ‘बिगड़ने’ और ‘भ्रष्ट’ होने जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। यह मानकर कि भाषा कोई राजरथ है, जिसकी लगाम कुछ लोगों के हाथ में ही थमी रह सकती है।
यह अपने आप में अच्छी और सकारात्मक बात है कि हिंदी राजभाषा और राष्ट्रभाषा की आधिकारिक मान्यता जैसे दबावों और मानसिक बोझ से हटकर अपनी राह और जुनून के साथ आगे बढ़ रही है। वह अब एक खास भौगोलिक क्षेत्र के लोगों की भाषा ही नहीं रह गई है, बल्कि आर्थिकी ,व्यापार, विज्ञापन, आपसी संवाद, क्षेत्रीय परस्परता, विविध भाषियों के बीच संपर्क और राष्ट्रव्यापी गतिशीलता के लिए अभी अनिवार्य तत्व बन गई है। यह स्थिति केवल कानूनी अथवा किसी डंडे के दम पर नहीं बल्कि स्वयं लोक की इच्छा और जरूरत के कारण बन रही है। यह सिलसिला बढ़ते ही जाना है।
अगर संख्या को ही आधार माने तो आज देश में (2011 की जनगणना के अनुसार) 40 करोड़ लोगों की हिंदी पहली और 65 करो़ड़ लोगों की दूसरी भाषा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी अब दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ में उसे अभी भी मान्यता नहीं है। दूसरे, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनने की दिशा में भी अभी काफी कुछ करना बाकी है।
दरअसल हिंदी की यह ‘जय यात्रा’ अपने दम पर और हिंदी भाषियों की जिजीविषा के कारण ही ज्यादा है। भले ही यह माना जाता हो कि आज भारतीय विदेशों में अपनी अच्छी अंग्रेजी के कारण रोजगार पाते हों, लेकिन इसी के साथ यह भी मान लिया गया है कि भारत की प्रतिनिधि भाषा हिंदी ही है। अंग्रेजी रोजगार की भाषा हो सकती है, लेकिन हिंदी अस्मिता की भाषा है। इसे जाने बगैर भारत को नहीं जाना जा सकता।
हिंदी का यह स्वाभाविक ‘वर्चस्व’ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में तो स्थापित हो ही चुका है। इसमें हिंदी फिल्मों का बड़ा योगदान है। साथ ही टीवी और इंटरनेट भी अब हिंदी को साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अंग्रेजी के अलावा अनूदित मनोरंजन सामग्री हिंदी में ही उपलब्ध है।
भारत और पड़ोसी देशों के बच्चे भी अब हिंदी को सहज भाषा के रूप में ले रहे हैं। खुद भारत के भीतर भी गैर हिंदी भाषी राज्यों में युवा पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी की तुलना में हिंदी ज्यादा सहजता से बोल और समझ पाती है। यह काम हिंदी की औपचारिक शिक्षा से ज्यादा हिंदी के जरिए भारत को जानने की सहज जिज्ञासा और जरूरत के कारण ज्यादा हो रहा है।
अगर संसद भारत की आत्मा है तो हिंदी के हक में एक बहुत ब़ड़ा बदलाव वहां दिखाई पड़ता है। पहली लोकसभा में जितने सांसद देश भर से चुन कर आए थे, उनमें से साठ फीसदी प्राय: अंग्रेजी में ही अपनी बात रखते थे। केवल हिंदी भाषी प्रदेशो के सांसद ही हिंदी में बोलते थे और उनमें से भी कुछ ऐसे थे, जो अंग्रेजी में ज्यादा बोलना पसंद करते थे बजाए हिंदी के। अब भाषायी अभिव्यक्ति के स्तर पर संसद का परिदृश्य बहुत कुछ बदला हुआ है।
आज अठारहवीं लोकसभा ( और राज्यसभा में भी) में 70 फीसदी से ज्यादा सांसद हिंदी में अपनी बात रखते हैं या फिर ऐसा करने की कोशिश करते हैं। यह बदलाव खास तौर पर बंगाली, असमी, अोडिया, मराठी, तेलुगू (तेलंगाना), पंजाबी, गुजराती, कन्नड , कश्मीरी भाषी सांसदो के रवैये में देखने को मिलता है। अभी तमिलनाडु और कुछ हद तक केरल इसका अपवाद हैं। लेकिन अगर ज्यादातर गैरहिंदी भाषी सांसद अब अपनी बात हिंदी में ही रखने को प्राथमिकता दे रहे हैं, उसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि उन्हें लगता है कि इसी भाषा के जरिए वो अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा पाएंगे। उनकी बात समूचे देश में सुनी जाएगी। यह बदलाव किसी दबाव के तहत नहीं बल्कि इस बात के खुले मन से स्वीकार से हुआ है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सम्प्रेषण की भाषा हिंदी ही हो सकती है, जोकि वह है भी।
संतोष की बात यही है कि हिंदी बगैर बैसाखियों के अपनी चाल और मस्ती में आगे बढ़ती जा रही है। एक महानदी की तरह वह साथ मिलने वाली भाषायी नदियों को भी अपने में समोती चली जा रही है। जो नई हिंदी गढ़ी जा रही है, वह नई सदी की हिंदी है। नई सभ्यता, संस्कृति और समरसता की हिंदी है। वह सबको साथ लेकर और सबके भीतर लहलहाने वाली हिंदी है।
हिंदी की यही ताकत उसे और अधिक स्वीकार्य बनाएगी। देश के भीतर हिंदी का राजनीतिक विरोध 60 साल में सिमटता गया है। धीरे- धीरे यह और सिकु़ड़ता जाएगा। क्योंकि हिंदी और तेजी से देश की एक स्वाभाविक जरूरत बन रही है, बनती चली जाएगी।
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