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हिंदी दिवस पर विशेष: राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 और रोजगार की तलाश करती हिंदी

Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Tue, 14 Sep 2021 10:25 AM IST

सार

आज 14 सितंबर पूरे देश में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका अपना एक इतिहास है। इस दिन 14 सितम्बर 1949 को संवैधानिक स्तर पर भारत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी को मान्यता प्राप्त हुई थी।

सवाल यह है कि आजादी के 70 साल बाद भी हम ज्ञान-विज्ञान के पाठ्यक्रमों को हिंदी, मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने में असमर्थ क्यों हैं? हिंदी बाजार और रोजगार की भाषा क्यों नहीं बन पाई है? 
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हम ज्ञान-विज्ञान के पाठ्यक्रमों को हिंदी, मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं।
हम ज्ञान-विज्ञान के पाठ्यक्रमों को हिंदी, मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं। - फोटो : Pixabay
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विस्तार

आज 14 सितंबर पूरे देश में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका अपना एक इतिहास है। इस दिन 14 सितम्बर 1949 को संवैधानिक स्तर पर भारत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी को मान्यता प्राप्त हुई थी।
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धारा- 343 में कहा गया-

 
“संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी और अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा। शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग 15 वर्ष की अवधि तक किया जाता रहेगा।”

इस संबंध में 1955 में राजभाषा आयोग बना। हिंदी को राजभाषा के रूप में पूर्णत: स्थापित करने की प्रक्रिया में आयोग द्वारा तेरह सुझाव दिए गए। जिन पर सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं लिया गया। 1965 से पूर्व 1963  में राजभाषा अधिनियम आता है। जो पुन: 1967 में संशोधित होता है। इस अधिनियम के अंतर्गत 1965 तक हिंदी को पूर्णत: राजभाषा के रूप में स्थापित कराने के आश्वासन को पुन: अनिश्चित समय तक बढ़ा दिया जाता है, जिसका सबसे बड़ा कारण गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी का घोर विरोध था।

इस कारण यह कहा गया-

“26 जनवरी 1965  के बाद भी हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग में लाई जाती रहेगी, जिनके लिए इससे पहले प्रयोग में लाई जाती रही है।”

यह व्यवस्था संविधान लागू होने से लेकर आज तक यथावत् चली आ रही है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि सरकारी नीतियों के कारण आज भी हिंदी राजभाषा में सहायक के रूप में कार्य कर रही है और एक विदेशी भाषा हमारी प्रमुख राजभाषा के रूप के शासकीय प्रयोजनों व वार्ताओं, पत्रों, अभिलेखों की आधार भाषा बनी हुई है।


हिंदी भाषा और हम भारतीय 

भाषा ज्ञान के रास्तों को खोलती है, लेकिन हमारे ही देश में अंग्रेजी पर हम सभी की अति-निर्भरता ने गांव, कस्बों व शहरों तक के विद्यार्थियों को अंग्रेजी भाषा ज्ञान के अभाव के कारण विज्ञान और तकनीकी ज्ञान से वंचित कर दिया है। अगर हम अपने आसपास ही देखें तो विद्यालय तक विज्ञान की शिक्षा हिंदी में लेने वाला छात्र, उच्च शिक्षा में प्रवेश के समय अंग्रेजी पाठ्यक्रम व अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता व हिंदी भाषा में पाठ्यपुस्तकों में अभाव के कारण विज्ञान व तकनीकी पाठ्यक्रमों से दूरी बना लेता है।

यह हमारी शिक्षा व भाषा नीति की विफलता है कि वह एक और आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है दूसरी ओर आजादी के इतने वर्षों उपरांत भी हम ज्ञान-विज्ञान के पाठ्यक्रमों को हिंदी, मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं। जो थोड़ा बहुत उपलब्ध भी हो रहा है, वह अनुवाद मात्र है और स्तरीय नहीं है। भाषा की इस दुरूहता के कारण हमारी बहुत सी प्रतिभाओं को सामने आने का मौका नहीं मिल पा रहा है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी कहा है-

“हमने अपनी आंखें खोकर चश्में लगा लिए हैं”। यह चश्में आजादी मिलने के उपरांत अधिक बटने और लगने लगे। आज यह चश्में बौद्धिक चर्चा व बहसों के केंद्र में सर्वाधिक लगाए देखे जा सकते हैं।
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