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हिंदी दिवस विशेष: ज्ञान और रोजगार नहीं, मनोरंजन व उपभोक्ता की भाषा है हिंदी 

Sat, 14 Sep 2019 03:04 PM IST
Prakash Upretti प्रकाश उप्रेती
Updated Sat, 14 Sep 2019 03:04 PM IST
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Hindi Diwas 2019 Hindi is the language of entertainment and consumer, not knowledge and employment
हिंदी के विस्तार और विकास के लिए कोई ठोस नीति इन सालों के ‘हिंदी दिवस मंथन’  से निकली है !  - फोटो : अमर उजाला

हिंदी पर सेमिनार, संगोष्ठी, अखबारों के लंबे –लंबे संपादकीय और गंभीर मुद्रा में चिंतन व चिंता का दिन आखिर आ ही गया । कैलेंडर की तारीख में हर साल यह दिन 14 सितंबर के रूप आता है और बृहत हिंदी समाज को चिंतनमय करके फिर अगले वर्ष के कैलंडर में लौट जाता है । यह आवागमन की प्रक्रिया उतनी भी आसान नहीं है जितनी लगती है ।

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हिंदी का बूढ़ा और नौजवान विद्वान (वैसे तो हिंदी पट्टी का हर व्यक्ति अपने को हिंदी का विद्वान माने बैठा होता है) जिसको की विद्वान होने की मान्यता विश्वविद्यालयों में चलने वाले हिंदी के विभाग जिनको कि राजेन्द्र यादव ‘ज्ञान की कब्रगाह कहते थे’ और गमों-रंजिश में ढहते हिंदी के लेखक संगठन आदि से मार्का प्रमाण-पत्र मिल चुका होता है, वो सभी पूरा साल इसी एक दिन की आशा में गुजार देते हैं । ताकि इस दिन हिंदी पर गंभीर चिंतन कर सकें ।
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इसलिए यह प्रक्रिया सामान्य नहीं है । अब सवाल उठता है कि क्या जन-जन में भाषा का संस्कार और उसके प्रति अभिरुचि एक दिन के जलसे से पैदा की जा सकती है या भाषा हर दिन के परिश्रम से गतिशील व जन सामान्य की अभिरुचि का हिस्सा बनती है? इन दोनों सवालों के इर्द-गिर्द इस बार के हिंदी दिवस को देखना चाहिए और इतिहास की यात्रा को टटोलना चाहिए कि हमने क्या और कितना पाया ।
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फिर भी अगर पहले सवाल को ही सही मान लिया जाए तो राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के प्रस्ताव पर 14 सितंबर 1953 से हर वर्ष  सितंबर माह की 14 तारीख को हिंदी  दिवस के रूप में मनाए जाने के संकल्प के बाद हिंदी के विकास का कोई आंकलन है या फिर यह तारीख, मात्र रस्म अदायगी भर रह गई है । हिंदी के विस्तार और विकास के लिए कोई ठोस नीति इन सालों के ‘हिंदी दिवस मंथन’  से निकली है ! 

Hindi Diwas 2019 Hindi is the language of entertainment and consumer, not knowledge and employment
हमने हिंदी का समाज नहीं बल्कि उपलब्धि के तौर पर हिंदी का बाजार तैयार किया है । - फोटो : अमर उजाला

हमने हिंदी का समाज नहीं, उपलब्धि के तौर पर हिंदी का बाजार तैयार किया है
हमें थोड़ा ठहर के सोचने की जरूरत है क्योंकि हिंदी आज भी ज्ञान और रोजगार की भाषा से ज्यादा मनोरंजन और उपभोक्ता की भाषा है । हमने हिंदी का समाज नहीं बल्कि उपलब्धि के तौर पर हिंदी का बाजार तैयार किया है । वह भी उपभोक्ता का बाजार । इस  बात का प्रमाण यह है कि हिंदी के विकास के नाम पर जो बात होती है वह सिनेमा और बाजार को केंद्र में रखकर ही होती है ।

हिंदी के विकास के नाम पर वह आंकड़े होते हैं जिनसे यह पता चलता है कि हिंदी फिल्मों को देखने के लिए दुनिया के मुल्कों में कितनी संख्या में लोग हिंदी सीख रहे हैं या फिर भारत इतना बड़ा उपभोक्ता बाजार है कि बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक अपने कर्मचारियों को हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं ताकि वे भारत के बाजार में आसानी से अपना उत्पात भेज सकें । इसके अतिरिक्त हिंदी के विकास पर छाती फुलाने के लिए और क्या है ! क्या सात दशकों के ‘हिंदी दिवस’ या हिंदी पखवाड़े की कोई उपलब्धि देवकीनन्दन खत्री जैसी है ? क्या इन 66 वर्षों में हम, हिंदी में ऐसा ज्ञान सृजित कर पाएं हैं कि उसे पढ़ने और जानने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी हो !

या कोई ऐसा गल्प ही रच डाला हो जिसको हम हिंदी की उपलब्धि कहें और दुनिया भी हिंदी को बाजार की भाषा के रूप में न देखकर ज्ञान की भाषा के रूप में देखे । ऐसी कोई उपलब्धि तो मेरी नज़र में नहीं है । फिर हिंदी दिवस की सार्थकता क्या है ? सिर्फ रस्मी आयोजन और सरकारी दफ़्तरों में हिंदी का पखवाड़ा ?  

Hindi Diwas 2019 Hindi is the language of entertainment and consumer, not knowledge and employment
सरकार के हिंदी दिवस ने सिर्फ अनुवादक पैदा किए न की पाठक और भाषाई संस्कार से युक्त सामाजिक मनुष्य । - फोटो : hindi diwas

हिंदी दिवस की इस यात्रा में हिंदी जन-जन की भाषा या फिर ज्ञान व रोजगार की भाषा भले ही न बन पाई हो लेकिन अनुवाद की भाषा जरूर बन गई है । यह हिंदी दिवस की उपलब्धि है । चाहे तो राष्ट्रभाषा आयोग इस उपलब्धि पर गर्व कर सकता है और आने वाले 100 वर्षों तक इसी उपलब्धि के सहारे हिंदी दिवस और पखवाडा मना सकता है । लेकिन इन रस्मी आयोजनों से इत्तर, इधर के कुछ वर्षों में यह देखने को मिला है कि हिंदी के प्रचार- प्रसार के लिए बनी संस्थाएं हिंदी में ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में कुछ हद तक चेती हैं ।

जैसे केंद्रीय हिंदी संस्थान गणित और विज्ञान विषय के शब्दकोश हिंदी में तैयार कर रहा है वहीं कुछ संस्थाएं प्रबंधन और कानून विषय से संबंधित पाठ्यक्रम भी विश्वविद्यालयों के लिए तैयार कर रहे हैं । लेकिन इसमें हिंदी दिवस और उस दिवस के अवसर पर सारगर्भित व गरिष्ठ व्याख्यान देने वाले विद्वानों की कोई भूमिका नहीं है । सरकार के हिंदी दिवस ने सिर्फ अनुवादक पैदा किए न की पाठक और भाषाई संस्कार से युक्त सामाजिक मनुष्य । इसलिए मैं बार-बार इसकी समीक्षा की बात कर रहा हूं । भारत में भाषाई संस्कार की जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है ।  

हिंदी दिवस पर बात करते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदुस्तान किसी एक भाषा का नहीं बल्कि मातृ भाषाओं का देश है । यहां हर प्रांत की भाषा और उप भाषाएं हैं । मैं जानबूझकर उन्हें बोली नहीं कह रहा हूँ क्योंकि वह व्याकरण  शास्त्रियों के लिए बोली हो सकती है लेकिन उसे बोलने के लिए वह मातृ भाषा है । भाषा की इन्हीं विविधताओं के कारण यह उक्ति भी प्रचलित हुई कि ‘कोस- कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी । इस वाणी को हिंदी की एक विराट सत्ता में समाहित नहीं किया जा सकता है । इन सबका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है ।

हिंदी दिवस की चकाचौंध में इन्हें नहीं भूलना चाहिए क्योंकि हिंदी का अस्तित्व भी इन्हीं भाषाओं से है ।  लेकिन अक्सर हिंदी दिवस पर मंचों के मठाधीश हिंदी को हाथी और प्रांतीय भाषाओं को चींटी समझने लगते हैं ।  इसलिए हिंदी दिवस की सार्थकता और भाषा के सवाल पर नए तरह से विमर्श की आवश्यकता है । भाषा का वर्चस्ववाद कहीं से भी उपनिवेशवाद से कम खतरनाक नहीं है । हिंदी को इस वर्चस्ववाद से भी बचना होगा । तभी ज्ञान के नए आयाम और कला, साहित्य, संगीत का वैविध्य हिंदी से जुड़ पाएगा । इसी बात में हिंदी दिवस की सार्थकता को देखना चाहिए न की दुनिया के कितने लोग हिंदी बोल रहे हैं और कहाँ-कहाँ हिंदी पढ़ाई जा रही के भ्रामक आंकड़ों के संदर्भ में ।  

रघुवीर सहाय ने ‘हिंदी’ नाम से एक कविता लिखी । बहुत सारी कड़वी बातों के बीच इस कविता को पढ़कर आप हिंदी को लेकर खुश भी हो सकते हैं लेकिन थोड़ा ठहरकर आप यदि इस कविता को पढ़ेंगे और गुनेंगे तो भाषा की दुनिया को समझने की एक नई राह भी तलाश सकते हैं  -
पुरस्कारों के नाम हिंदी में हैं
हथियारों के अंग्रेज़ी में
युद्ध की भाषा अंग्रेज़ी है
विजय की हिन्दी ॥ 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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