#हिंदीहैंहम: अपनी ही भाषा हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए बेचैन क्यों है हिंदुस्तान?
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भारत का विदेश मंत्रालय प्रत्येक तीन साल में एक बार विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करता है। कभी भारत में तो कभी विदेश में। पिछला सम्मेलन मॉरीशस में 18 से 20 अगस्त 2018 में हुआ था, जिसमें देश-दुनिया के करीब 2 हजार हिंदी प्रेमी जुटे थे।
अप्रत्यक्ष रूप से मॉरीशस के 14 लाख लोगों की सहभागिता इस आयोजन में थी, क्योंकि नेपाल के बाद यह दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी 52 प्रतिशत आबादी हिंदू है। नेपाल में 81 प्रतिशत हिंदू आबादी है।
भारत, जहां की ज्यादातर आबादी हिंदू कहलाती तो है, लेकिन वह वह इतनी जातियों, उप जातियों, धर्म और वर्ण व्यवस्था में विभाजित है कि एकमुश्त हिंदू कहलाना पसंद नहीं करती। आज ऐसा भले ही राजनीतिक कारणों से हो, किंतु अतीत में सामाजिक कारणों से कायम यह व्यवस्था अब नासूर बन चुकी है।
यह भी एक वजह है कि आजादी के 73 साल बाद भी इस देश की राष्ट्र भाषा हिंदी नहीं बन पाई। जबकि फिजी जैसे राष्ट्र की अधिकृत भाषा फिजियन हिंदी है। मात्र 9 लाख की आबादी के द्वीप समूह वाले देश में 70 प्रतिशत हिंदी भाषी लोग हैं, जो मॉरीशस की ही तरह गिरमिटिया मजदूरों की भावी पीढ़ी से आबाद हैं।
11वां विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी के प्रचार-प्रसार के मकसद से जारी इस सिलसिले का 11वां पड़ाव था और विदेशी धरती का 8वां अवसर। मुझे नहीं पता, अभी तक के हिंदी सम्मेलनों में इस पर बात हुई या नहीं, लेकिन मेरे मन में एक सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि हिंदी भाषी मुल्क की सरकार को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी, जो वह बीते 43 बरस से हिंदी को देश-विदेश में प्रतिस्थापित, प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाए हुए हैं?
इसी के साथ एक सवाल और है- क्या दुनिया का और भी मुल्क अपनी मूल भाषा के लिए इसी तरह की जद्दोजहद कर रहा है? मुझे नहीं लगता कि कर रहा होगा, क्योंकि सभी मुल्कों को उनकी अपनी भाषा, मातृभाषा राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त है।
उन्हें न तो देश में न ही दुनिया का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। हम हर तरफ प्रयासरत हैं। अब जबकि हम अपने ही मुल्क में हिंदी को राष्ट्र भाषा नहीं बना पाए तो संयुक्त राष्ट्र से कैसे उम्मीद करें कि वह इसे अपनी अधिकृत भाषा का दर्जा दे।
यह सवाल इसलिए कि 1975 में हुए पहले विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर 11वें सम्मेलन तक यह एक प्रस्ताव अनिवार्य रूप से पारित होता आ रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को अधिकृत भाषा का दर्जा प्राप्त हो।
हालांकि , इसके लिए उसकी अपनी प्रक्रिया है, जिसे पूरा करने पर वह सहर्ष तैयार हो जाएगा। भारत इसके लिए प्रयासरत भी है, किंतु एक व्यावहारिक दिक्कत इसमें है। कायदा यह है कि जो राष्ट्र इसका समर्थन करेंगे, उन्हें संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषा में शरीक होने का खर्च 40 करोड़ रुपये देना होगा।
कोई मुल्क भला अपना बजट किसी दूसरे राष्ट्र की भाषा के लिए क्यों देने लगा? जबकि भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संसद तक में कह चुकी हैं कि भारत सरकार 40 तो क्या 400 करोड़ रुपये खुद देने को तैयार है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपने नियमों से बंधा होने से मानने को तैयार नहीं।
यह दरअसल, संयुक्त राष्ट्र पर कब्जा किए बैठे मुल्कों की तजबीज है कि वे किसी को उन दायरों में घुसने ही नहीं देते। फिर मामला किसी भाषा को अधिकृत करने का हो, सुरक्षा परिषद की सदस्यता का हो या किसी भी मसले पर वीटो के अधिकार का हो।
ये मुल्क हैं अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी और कहीं-कहीं चीन। बात भाषा की करें तो इस समय मंदारिन (यानी चीनी), अरेबिक , अंग्रेजी, फ्रेंच, रशियन और स्पेनिश ही अधिकृत भाषाएं हैं। जो भाषाएं संयुक्त राष्ट्र में दाखिले के लिए अर्जी लिए दरवाजे पर दस्तक दे रही हैं, उनमें हिंदी अकेली नहीं है।
बंगाली, मलय, पोर्तुगीस, स्वाहिली और टर्किश भी बरसोबरस से कतार में हैं। इनमें से हिंदी का दावा इस मायने में सबसे दमदार है कि यह दुनिया की चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। करीब 60 करोड़ लोग भारत या विदेशों में हिंदी बोलने वाले हैं। पहले क्रम पर मंदारिन यानी चाइनीज है, जिसे करीब एक अरब 37 करोड़ लोग बोलते हैं।
इसमें उल्लेखनीय यह है कि मंदारिन केवल चीन और थोड़ी बहुत हांगकांग में बोली जाती है, जबकि हिंदी संभवत: दुनिया के सबसे ज्यादा मुल्कों में बोली जाने वाली भाषा है, जिसके प्रेमी 20 देशों में तो सीधे तौर पर बहुतायत से हैं ही।
इसमें भी भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मॉरीशस, फिजी में बड़ी तादाद में हिंदी का चलन है। फिर भारतीय अप्रवासी काफी बड़ी संख्या में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया, दुबई व खाड़ी देशों के अलावा अफ्रीकी देशों में पीढियों से बसे हैं। उनकी दूसरी भाषा हिंदी है ही।
सीधी-सच्ची बात यह है कि जब तक संयुक्त राष्ट्र संघ इतने राजनीतिक, कूटनीतिक दबाव में नहीं आ जाए कि वह बिना प्रक्रिया अपनाए या समर्थक मुल्कों से आर्थिक हिस्सेदारी के नियम को शिथिल न कर दे, तब तक हिंदी का अधिकृत भाषा बनना असंभव ही है।
कितना विसंगतिपूर्ण है कि हमारी कोई एक भाषा नहीं, और तो और देश का कोई एक सुनिश्चित नाम भी नहीं। भारत, इंडिया, हिंदुस्तान में जंग चलती रहती है कि वास्तविक कौन? वैसे ही अंग्रेजी तो सरकारी कामकाज की भाषा है ही, साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं का भी बोलबाला है।
जैसे महाराष्ट्र में मराठी का, गुजरात में गुजराती का, आंध्र में तेलुगू का, तमिलनाडु में तमिल का, केरल में मलयाली का, गोवा में कोंकणी का, कश्मीर में पश्तो का। उत्तर और मध्य हिंदुस्तान को छोड़ दें तो सरकारी कामकाज में अंग्रेजी के अलावा हिंदी का प्रयोग कहीं नहीं होता। फिर भी हम चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी को मान्यता दे।
विश्व हिंदी सम्मेलन के जरिए कोशिश इस बात कि ही की जाती है कि हिंदी के प्रति ये भेदभाव समाप्त हो, न्यूनतम हो। सम्मेलन ने एक सकारात्मक और परिणाममूलक पहल तो यह की है कि इसे साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहने दिया। यह बदलाव हुआ, 2015 के भोपाल में आयोजित 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन से।
तब पहली बार विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने हिंदी की तमाम विधाओं और उसके शिल्पकारों को ससम्मान इसमें शरीक किया। इस पहल को सार्थक मुकाम दिया तत्कालीन सांसद और सम्मेलन के संयोजक अनिल माधव दवे ने। उन्होंने आगे बढ़कर हिंदी प्रेमियों को मान और प्रतिनिधित्व देने का बीड़ा उठाया।
नतीजतन देश-विदेश से बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक, स्तंभकार , विचारक सम्मेलन में पधारे और मंच साझा करने से लेकर आयोजन की सफलता में हर संभव सहयोग दिया। फिल्म, नाटक, कविता, अखबार, टेलीविजन जैसे क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने आयोजन में हिस्सा लिया और पूर्ववर्ती सम्मलनों से कहीं आगे जाकर इसे सकारात्मक, सार्थक गति प्रदान की।
इसका फायदा यह हुआ कि यह सीधे तौर पर देश की धडकन बन गया। इस पर जो एक विशिष्ट वर्ग की छाप लग गई थी, वह काफी हद तक उस छवि से मुक्त हो गया। भोपाल के ताल से उठी बदलाव की यह लहर मॉरीशस के नीले समंदर तक अठखेली करते पहुंच गई।
मॉरीशस में जो चेहरे नजर आए वे किसी कॉफी हाउस या संभ्रांत क्लब में ब्रिज खेलते या सिगार का धुंआ उड़ाते रौबीले चेहरे नहीं, बल्कि भारत के ठेठ सुदूर तक आसानी से पहचाने जाने वाले आम चेहरे थे। चूंकि इसमें स्कूली अध्यापक, कॉलेज प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, प्राचार्य से लेकर कुलपति तक थे और किसी नाममात्र के प्रसार वाले अखबार के रिपोर्टर, संपादक भी।
अब यह भाषा के सभी आयामों को समेट कर उसके उत्थान का जरिया बनता जा रहा है...
देश भर से तकरीबन सवा तीन सौ हिंदी प्रेमी चिह्वित किए गए थे, जिन्हें सरकारी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया गया। दूसरी तरफ इस सम्मेलन में राष्ट्रीय स्तर के कवि, साहित्यकार, फिल्मी गीतकार, लेखक, अभिनेता भी थे।
यानी हिंदी को पूरे देश में एक समान रूप से मान्यता दिलाने वाला भारतीय सिनेमा भी पूरे सम्मान के साथ वहां मौजूद था। हालांकि इससे जुड़े विषय पर जब बात चली तो बॉलीवुड फिल्मों को भारतीय संस्कृति से खिलवाड़ करने वाला और गलत तरीके से पेश करने वाला भी बताया गया और फिल्मों की भूमिका पर तीखे सवाल भी खड़े किए गए, लेकिन इतना तो तय हो गया कि भारतीय सिनेमा भी हिंदी के सेवक की भूमिका तो निभा रहा है।
इन फिल्मों ने हिंदी को जनजीवन की भाषा तो बना दिया। इसलिए उसकी अनदेखी कर हिंदी का भला नहीं किया जा सकता , यह मान लिया गया। इस बहस को मुकाम तक पहुंचाने में सेंसर बोर्ड के चेयरमैन, गीतकार प्रसून जोशी और फिल्म लेखन से जुड़े यतींद्र मिश्रा पूरी तरह से कामयाब नहीं रहे, किंतु उन्हें यह तो मानना ही पड़ा कि भाषा और संस्कृति दो अलग-अलग मुद्दे हैं, जिन्हें मिलाकर नहीं देख सकते और अकेले फिल्में भाषा की खिदमत नहीं कर सकतीं।
बेशक, मॉरीशस वासियों का हिंदी और हिंदुस्तान प्रेम बेमिसाल है, बावजूद इसके उनकी राष्ट्र भाषा अंग्रेजी है और लोक जीवन का ज्यादातर कामकाज फ्रांसीसी में होता है।
यूं कहने को उनकी अपनी मॉरीशियन क्रियोल भाषा भी है, लेकिन वह बोलचाल में ही है। इस तरह मॉरीशस बहुभाषी देश है, जहां अलग-अलग स्तर पर अंग्रेजी, फ्रांसीसी, हिंदी, क्रियोल का इस्तेमाल होता है। हम कह सकते हैं कि उनके दिल में हिंदी धडकती है, दिमाग में अंग्रेजी रहती है, व्यवहार में फ्रांसीसी लाते हैं और जबान क्रियोल बोलती है।
वे हमारी तरह नहीं हैं कि लोक सेवक से लेकर उच्च वर्ग तक अंग्रेजी बोलता है, अंग्रेजी न जानने वाला हिंदी बोलता है और जब कोई अपने इलाके वाला मिल जाता है तो क्षेत्रीय भाषा बोलने लगते हैं। इस समय वे हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए कटिबद्ध नजर आते हैं। वहां प्राथमिक, माध्यमिक व हायर सेकंडरी में हिंदी पढ़ाई जा रही है।
हिंदी का उपयोग वहां इतने लोग करते हैं कि जब आप भ्रमवश उनसे अंग्रेजी में बात शुरू करते हैं तब वे आपको हिंदी में जवाब देकर चकित कर देते हैं। जैसे होटल, रेस्त्रां, कार, टैक्सी, शॉपिंग मॉल, समुद्री किनारे पर्यटक केंद्रों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर कोई भी आसानी से हिंदी में बात करने लगता है।
हालांकि चेहरे-मोहरे तो बहुतेरे हिंदुस्तानी ही होते हैं, फिर भी विदेशी सरजमीं होने से आपकी पहली कोशिश अंग्रेजी में बतियाने की होती है, जिसकी शुरुआत एयरपोर्ट से कार में बैठते ही होती है। आप उसे अंग्रेजी में होटल का नाम-पता बताने की पहल करते हैं और वह पूरी विनम्रता से हिंदी में आपको तसल्ली देता है कि वह आपको सही जगह पहुंचा देगा।
रास्ते में हिंदी गाना भी गुनगुनाने लगे तो हैरत मत कीजिएगा। आखिर वे गए तो पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल से ही हैं। हां, संतोष और गर्व है तो इस बात का कि हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं जानने के बावजूद हिंदी जबान बोलने में वे संकोच नहीं करते। यही हाल पंचतारा होटल की स्वागत अधिकारी सुकुमारी का भी होगा। वह अच्छी हिंदी में आपका मार्गदर्शन करेगी।
इस तरह जब आप अपने वतन से करीब 5800 किलोमीटर दूर हिंदी जबान सुनते हैं तो एक बार फिर यह विचार मजबूत होता है कि क्यों न हम भी हिंदी को हमारे ही देश में आम बोलचाल की, शिक्षा की, सरकार के कामकाज की भाषा बना सकते? चिंताजनक स्थिति तो यह है कि अब बोलचाल से भी हिंदी कम होती जा रही है।
समानांतर रूप से दो बातें इसमें रुकावट पैदा कर रही हैं। एक, कॉन्वेंट शिक्षा और बढ़ती क्षेत्रीयता। मसलन, केरल के दो लोग मिलेंगे तो वे मलयाली बोलना पसंद करेंगे तो आंध्र के लोग तेलुगू बोलेंगे। मारवाड़ी से मारवाड़ी अपनी जबान बोलेगा तो गुजराती से गुजराती।
हिंदी के विकास में क्षेत्रीयता की यह दीवार लगातार ऊंची होती जा रही है। हम अकेले व्यवस्था को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। आज ऐसे कितने लोग हैं जो नगरीय, शहरी बस्तियों में रहते हुए अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के निजी या सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं? सही बात तो यह है कि मैं भी ऐसा नहीं करूंगा। वजह साफ भी है और ठोस भी।
अब ऐसे शासकीय स्कूलों का वह स्तर बचा ही कहां है, जो वह किसी बच्चे को 12वीं तक ऐसी शिक्षा दे सके जो उसे दुनिया में जारी प्रतिस्पर्धा में बराबरी की टक्कर देने के काबिल बना सके। यानी हम अंग्रेजी चाल चलते रहेंगे?
नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है , हम अपनी चाल चल सकते हैं, कैसे और कब? इस मसले पर ही गहन चर्चा का मंच है विश्व हिंदी सम्मेलन। सरकारी आयोजन होकर भी इसमें हिंदी के मान-सम्मान को बनाए रखने, उसकी गरिमा को बढ़ाने और देश-विदेश में उसके विस्तार-स्थापना की तड़प है।
यूं कहने को वह तीन साल में एक बार हिंदी प्रेमियों को एक मंच पर लाती है, लेकिन यहां तीन दिन तक हिंदी के यथोचित स्थान को संजोए रखने के जतन प्रशंसनीय हैं। कभी हिंदी साहित्य तक सीमित यह सम्मेलन अब इस खोल से बाहर आकर इसके व्यावहारिक धरातल पर खड़ा हो चुका है।
अब यह भाषा के सभी आयामों को समेट कर उसके उत्थान का जरिया बनता जा रहा है। अब इसमें हिंदी के पत्रकार, लेखक, शिक्षक और शिक्षाविद् भी शिरकत करते हैं और मंच से लेकर प्रमुख सत्रों की सदारत तक करते हैं। उनके बेशकीमती सुझावों-अनुशंसाओं को तरजीह दी जाती है, उन्हें विचार के लिए रखा जाता है, उन पर अमल सुनिश्चित किया जाता है और अगले सम्मेलन में उसकी प्रगति से अवगत भी कराया जाता है।
हिंदी सेवियों के सम्मान में भी अब साहित्य विधा से आगे हिंदी की किसी भी तरह से सेवा करने वाले नवाजे जा रहे हैं। ये शुभ संकेत हिंदी के प्रति ईमानदार प्रयासों का प्रमाण हैं।
पूरी दुनिया में हिंदी को फैलाने के संकल्प के साथ मॉरीशस सम्मेलन समाप्त हुआ था। इसे अगले साल 2021 में कहीं होना है। इस दौरान उन तमाम सहभागियों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में हिंदी के विकास और बेहतरी के लिए काम करें और अंजाम तक पहुंचाएं।
इसमें सबसे अहम है कि सरकारी प्रयासों से इसे राष्ट्र भाषा और संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाने के एकमेव ध्येय से हटकर भी इसे जनमानस के दिल-दिमाग में इस तरह दर्ज करा दें कि उसे किसी औपचारिक प्रक्रिया की दरकार ही न रहे।
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