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75 साल की आजादी और हिजाब प्रकरण: हाशिए पर चले गए हैं रोजगार और शिक्षा के मुद्देे

Mon, 14 Feb 2022 11:58 AM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Mon, 14 Feb 2022 11:58 AM IST
सार

आजादी के 75 साल बाद भी मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी आज भी हाशिए पर ही है, हालांकि हमारे समाज में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनमें महिलाओं ने घूंघट और बुर्के की हदें लांघी हैं और अपनी परम्पराओं में रचबस कर कई कीर्तिमान भी हासिल किए हैं।

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Hijab Controversy how Hijab Dispute is breaking the harmony of our society
भारत के शिक्षण संस्थान दुनिया के सुनहरे भविष्य की पौधशाला हैं जिनमें पढ़े बच्चे आज दुनिया में अपना परचम लहरा रहे हैं। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

वर्तमान समय में देश के युवाओं को सबसे अहम जरूरत शिक्षा और रोजगार की है। जिसपर विचार-विमर्श होना चाहिए। नए-नए रास्ते खोजने की जरूरत है लेकिन पिछले कुछ दिनों से शिक्षण संस्थानों और छात्रों के मध्य छिड़ा हिजाब का विवाद चिंता का विषय है। भारत के शिक्षण संस्थान दुनिया के सुनहरे भविष्य की पौधशाला हैं जिनमें पढ़े बच्चे आज दुनिया में अपना परचम लहरा रहे हैं।

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यह बात किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में हिजाब पर छिड़ी बहस हम सभी के लिए किसी समस्या से कम नहीं है जिसका पुख़्ता हल समाज, सरकार और न्यायालयों को मिलकर खोजने होंगे। ताकि देश की युवा शक्ति की ऊर्जा को सही दिशा में लगाया जा सके। हमारी एक छोटी सी गलती से एक पूरी पीढ़ी खतरे में पड़ सकती है।
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और भी मुद्दे हैं जिन्हें समझना होगा 

आजादी के 75वें  साल में दुनिया के शिक्षाविदों और समाजचिन्तकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस बात की भी रहने वाली है कि कहीं लड़कियों का एक बड़ा हिस्सा जो शिक्षा के अधिकार लिए अभी भी जद्दोजहद से जूझ रहा है, अपने सपनों की उड़ान भरने से पहले ही अपने कदम वापस न ले ले।

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मुझे याद है बचपन में हमारे पड़ोस में एक दादी रहती थीं, जो अकसर लड़कियों को कहा करती थी कि- 'लड़कियों मुंड (सर) झुकाकर पढ़ लो और नौकरी करके ही शादी- ब्याह कराना।'


ये उनका तकिया कलाम बन चुका था हम जब उनसे पूछते की आपने पढ़ाई क्यों न की तो वो हमें अपनी कहानी सुनाती कि जब मैं छोटी थी तो पढ़ने का बड़ा शौक था। स्कूल भी जाती थी। जब हम कक्षा तीन में थे तब एक लड़की जो किसी और क्लास की थी मुंबई चली गई हीरोइन बनने, उस लड़की का तो पता नहीं हीरोइन बनी या न बनी। लेकिन हमें और हमारी जैसी कई लड़कियों के घर वालों ने स्कूल जाना बंद करा दिया। घर पर रहकर ही हमनें थोड़ा बहुत लिखना- पढ़ना सीखा।

मुझे याद है वो दादी कभी किसी कागजात पर अंगूठा नहीं लगाती थीं। हमेशा सिग्नेचर करती। उन्हें अखबार पढ़ने का शौक ऐसा था कि खुद भी अखबार पढ़ने में जूझती और जो न समझ आता वो इधर-उधर से बच्चों से पढ़वाया करती। उनकी शिक्षा अधूरी रह गई तो वो हर लड़की को पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।

आज के इस हिजाब और गमछे से उठते विवाद ने मुझे वो दादी अनायास याद दिला दी जो कहीं इस भीड़ के इतर खड़ी कई लड़कियों में न हों। शिक्षा पर सबका अधिकार है। हम विश्व गुरु तब ही बन पाएंगे जब हमारी आधी आबादी सुरक्षित और शिक्षित होगी।
     

भारत की सांझी विरासत में पर्दे का विशेष महत्व रहा है-

हमने गांव में दादी-नानियों से अक्सर सुना है कि उन्होंने चौराहे पर रखे पत्थरों को घूंघट ओढ़ा है क्योंकि कभी उनके पूर्वज उन पत्थरों पर बैठा करते थे। बरसों बरस वो पत्थर ही उनके पूर्वज की याद बन जिंदा रहे। पर्दा हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है कहीं वो घूंघट के तौर पर किया जाता था कहीं हिजाब के तौर पर।
 

निःसंदेह इसके पसंद न पसंद का अधिकार केवल उस महिला को होना चाहिए जिसनें उस संस्कृति की परंपराओं को चुना है। पुरुषों की प्रधानता को यह अधिकार नहीं होना चाहिए की वे उन पर जबरदस्ती पर्दा थोपे और न ही अपनी इच्छा से पर्दा करने वाली किसी महिला को बेपर्दा करें। 
         

निःसंदेह  स्कूल, कॉलेज प्रशासन को अधिकार है कि वो अपने स्कूल, कॉलेज के लिए बेहतर नियम बना सकते हैं और बनाएं भी अपितु सारे नियमों से ऊपर भारत का संविधान है जो प्रत्येक भारतीय नागरिक को चाहे वो महिला हो या पुरुष समानता और स्वतंत्रता का बराबर अधिकार देता है।

इसी अधिकार के तहत हर भारतीय को धार्मिक स्वतंत्रता का भी अधिकार दिया गया है। भारत की ज्यादातर महिलाएं बुर्का नहीं पहनती और न ही हिजाब पहनती हैं। और वहीं भारत की ज्यादातर महिलाएं चाहें वो किसी भी धर्म की हों गर्मियों में अक्सर धूप से सुरक्षा के लिए एक कपड़ा जो हिजाब की तरह ही होता है अपने फेस को कवर करती हैं, यहां तक की कोरोना काल में खुद हमारे प्रधानमंत्री जी ने लोगों को गमछा लपेटने की सलाह दी थी यदि उनके पास मास्क नहीं हो तो।

इस लिहाज से सार्वजनिक क्षेत्र पर संभवतः हिजाब से किसी को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। यह महिलाओं का अपना व्यक्तिगत चुनाव होना चाहिए न की उनपर किसी भी बंदिश का थोपा जाना। जहां तक स्कूल में लड़कियों के हिजाब पहनने न पहनने के मुद्दे का सवाल है तो स्कूल प्रशासन और सरकार को मिलकर कोई ऐसा बीच का रास्ता निकालना होगा जिससे बच्चियों के भविष्य से खिलवाड़ न हो सके। 

Hijab Controversy how Hijab Dispute is breaking the harmony of our society
सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति फ़ातिमा बीबी, भारत की बेटी सानिया मिर्जा जिसनें अपने कपड़ों का चुनाव समाज से डर के नहीं डट के किया। - फोटो : अमर उजाला

संविधान ने दिए हैं हमें कई अधिकार 

हम आजाद भारत के निवासी हैं। हमारा संविधान एक खूबसूरत दस्तावेज़ है। उसमें वर्णित मौलिक अधिकार आर्टिकल 15 (1) के मुताबिक राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।

साथ ही अनुच्छेद 15 के दूसरे क्लॉज के मुताबिक, किसी भी भारतीय नागरिक को धर्म, लिंग, जाति,जन्म स्थान और वंश के आधार पर दुकानों, होटलों, सार्वजानिक भोजनालयों, सार्वजानिक मनोरंजन स्थलों, कुओं, स्नान घाटों, तालाबों, सड़कों, और पब्लिक रिजॉर्ट्स में घुसने से नहीं रोका जा सकता।  हर भारतीय नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 (1) के तहत संरक्षित है। हम सब जानते हैं कि हमारा संविधान हमें आर्टिकल 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। जो निश्चित रूप से किसी भी भारतीय के साथ होने वाले न्याय का सूचक है।
 
आज कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, राजनीति हर क्षेत्र में महिलाओं ने यह साबित किया है कि वो पुरुषवादी समाज में कमतर नहीं हैं लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है। चाहे वो संसद में हों या सड़क में,  किसी चाय की दुकान में हों या किसी आलीशान दफ्तर में। वे अब भी पिछड़ी हुई हैं और उनमें हर समाज की महिला है क्योंकि वो सबसे पहले एक महिला है जिसे अपने हिस्से का समाज खुद ही तैयार करना होता है। फिर चाहे वह घूंघट के पार की दुनिया हो या हिजाब से किताबों तक का सफ़र तय करना हो।
 

आजादी के 75 साल बाद भी मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी आज भी हाशिए पर ही है हालांकि हमारे समाज में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनमें महिलाओं ने घूंघट और बुर्के की हदें लांघी हैं और अपनी परम्पराओं में रचबस कर कई कीर्तिमान भी हासिल किए हैं।


आज अनेकों उदाहरण हमारे बीच मौजूद हैं जैसे देश की पहली मुस्लिम शिक्षिका फ़ातिमा शेख जी, जिन्होंने देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फूले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हाशिए पर खड़ी लड़कियों में शिक्षा की अलख जगाई वो भी उस दौर में जब महिलाओं का जीवन और भी ज्यादा जटिल था। अभी हाल ही में उनकी 191 वीं जयंती के अवसर पर गूगल ने भी डूडल बनाकर उन्हें सलाम किया था। यह हर भारतीय के लिए गौरव की बात है।      
             
सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति फ़ातिमा बीबी, भारत की बेटी सानिया मिर्जा जिसनें अपने कपड़ों का चुनाव समाज से डर के नहीं डट के किया। आज खेल जगत पर कितने उभरते सितारे हैं जो अक्सर समाज की अवहेलना का शिकार हो जाती हैं लेकिन फिर भी वे अपने हिजाब या पूरे ढके कपड़ों की वजह से अपनी कामयाबी की रफ़्तार को कम नहीं होने दे रहीं। धर्म और हिजाब के नाम पर लड़कियों को शिक्षा से दूर करना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है।

हमें वो हर अवसर खोजने चाहिए जिससे महिलाओं में शिक्षा  और रोजगार का प्रतिशत बढ़े और उनकी कामयाबी की उड़ान जारी रहे। सरकारी नौकरी के साथ-साथ व्यवसाय में भी उनका आधे का प्रतिनिधित्व हो। आज हिजाब और गमछा प्रकरण 75 साल की आजादी को बेपर्दा करता नज़र आ रहा है।

काश की कभी भीड़ का एक हुजूम किसी निर्भया की रक्षा के लिए सामने आए, न की उसे स्कूल, कॉलेज से दूर करने के लिए। काश की भीड़ का सैलाब आधी आबादी को संसद से सड़क तक आधी हिस्सेदारी सौपने आगे आए। न की उन पर अपनी मर्जी थोप कर उनकी आजादी छीनने। काश की समाज का जिम्मेदार तबका हर लड़की को अपने हिस्से का आसमां दिलाने के लिए आगे आए। आखिर हर समाज की महिलाओं की समस्याएं वही हैं बस उनके रूप अलग-अलग हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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