पूर्वोत्तर में बाढ़ का कहर: कुदरत के हाहाकार में ढह गए सरकारी इंतजाम, 19 लाख लोग प्रभावित
असम के 19 जिलों में करीब चार लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं। इनमें से 12 हजार को राहत शिविरों में पहुंचाया गया है। पानी में डूबे इलाकों से लोगों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है।
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देश के ज्यादातर उत्तरी इलाके फिलहाल भीषण गर्मी की चपेट में हैं, लेकिन पूर्वोत्तर भारत बाढ़ की गहरी मार से कराह रहा है। सिक्किम से लेकर असम समेत पूर्वोत्तर के तमाम राज्य भारी बारिश और बाढ़ की चपेट में हैं। इलाके की ज्यादातर नदियां खतरे के निशान को पार कर गई हैं। बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में अब तक 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हो गए हैं। मौसम विभाग ने अगले चार दिनों तक भारी बारिश जारी रहने की चेतावनी दी है। इससे इलाके में खतरा और बढ़ गया है। कई राज्यों में राहत व बचाव कार्यों में सेना की मदद ली जा रही है।
असम के 19 जिलों में करीब चार लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं। इनमें से 12 हजार को राहत शिविरों में पहुंचाया गया है। पानी में डूबे इलाकों से लोगों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। लेकिन सरकारी सूत्रों ने बताया कि बेहद प्रतिकूल मौसम के कारण राहत औऱ बचाव में बाधा आ रही है। राज्य में अब तक करीब एक दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है।
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पूर्वोत्तर की बात करें तो मरने वालों का आंकड़ा 40 से ज्यादा है। राज्य में बाढ़ से करीब चार लाख लोग प्रभावित हैं। प्रशासन ने 155 राहत शिविर खोले हैं। फिलहाल 764 गांव पानी में डूब गए हैं। और साढ़े तीन हजार हेक्टेयर में खड़ी फसलें नष्ट हो गई हैं। पूर्वोत्तर में बारिश और बाढ़ की वजह से रेलवे, सड़क और हवाई सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। कई इलाकों में रेलवे की पटरियों के पानी में डूब जाने की वजह से ट्रेन सेवाएं ठप हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से फोन पर बातचीत में हालात की जानकारी ली है और केंद्र की ओर से हरसंभव मदद का भरोसा दिया है। मुख्यमंत्री ने खासकर तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों से सुरक्षित जगहों पर शरण लेने की अपील की है। शाह ने असम के अलावा सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों और मणिपुर के राज्यपाल से भी बात की है। मौसम विभाग ने राज्य में छह जून तक भारी बारिश की चेतावनी दी है।
मेघालय और मिजोरम में भी बारिश और बाढ़ ने भूस्खलन के साथ मिल कर भारी तबाही मचाई है। मेघालय में नेशनल हाइवे का एक हिस्सा बाढ़ के पानी में बह गया है। मिजोरम में भी पहाड़ी का मलबा गिरने से हाइवे पर आवाजाही ठप हो गई है। राज्य में कई पुलों को भी नुकसान पहुंचा है। इन दोनों राज्यों में सात-सात लोगों की मौत हो चुकी है। इनके साथ ही अरुणाचल प्रदेश में दस लोगों की मौत हो गई है और कई इलाकों का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से कट गया है।
त्रिपुरा में भी कई इलाके बाढ़ की चपेट में हैं। वहां करीब डेढ़ हजार लोगों को राहत सिविरो में रखा गया है। मुख्यमंत्री मानिक साहा ने कहा है कि सरकार परिस्थिति की निगरानी कर रही है औऱ प्रभावितों को मदद पहुंचाई जा रही है।
मणिपुर में इंफाल शहर पानी में डूब गया है। यहां 31 मई से लगातार बारिश हो रही है। इंफाल और नंबुल नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। राज्य में चार हजार से भी ज्यादा लोग प्रभावित हैं और करीब एक हजार घरों को नुकसान पहुंचा है। सेना ने एक हजार से ज्यादा लोगों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है।
अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन और बाढ़ से 9 लोगों की मौत हो गई है। रविवार को भारतीय वायु सेना ने लोअर दिबांग घाटी के बोमजीर नदी में फंसे 14 लोगों को सुरक्षित निकाल कर राहत शिविर में पहुंचाया। एक कार के बाढ़ में बह जाने के कारण उसमें सवार सात लोगों की मौत हो गई। भूस्खलन से कई सड़कें बंद हैं और गांव मुख्य जमीन से कट गए हैं।
पश्चिम बंगाल से सटे पर्वतीय राज्य सिक्किम में लगातार भारी बारिश और भूस्खलन के कारण तीस्ता नदी का पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। पहाड़ों पर चट्टान खिसकने की वजह से डेढ़ हजार से ज्यादा पर्यटक उत्तरी सिक्किम के विभिन्न पर्यटन केंद्रों पर फंसे हुए हैं। पर्यटकों से भरी एक कार के तीस्ता में गिरने की वजह से उसमें सवार आठ लोगों की मौत हो चुकी है।
राज्य में रविवार शाम जमीन धंसने की वजह से सेना के एक शिविर में तीन जवानों की मौत हो गई। चार लोगों को मलबे से जिंदा निकाला गया है। लेकिन छह जवान अभी लापता हैं। उनकी तलाश की जा रही है। इस बाढ़ से निपटने के सरकारी इंतजाम पर भी सवाल उठ रहे हैं।यह आरोप लग रहा है कि हर साल कई बार बाढ़ आने के बाद राज्य को बाढ़ से बचाने के ठोस इंतजाम के दावे तो किए जाते हैं। लेकिन उसके बाद सब कुछ जस का तस हो जाता है।
विपक्षी कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा ने साल 2016 में ही राज्य को बाढ़-मुक्त बनाने का वादा किया था। लेकिन वह अब तक कागजों में ही है। पार्टी ने केदंर सरकार से बाढ़ पर अंकुश लगाने के उपायों के लिए वित्तीय सहायता देने की मांग की है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पार्टी ने विपक्ष पर प्राकृतिक विपदा के मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया है। उसका कहना है कि ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के उद्गम स्थल पर बीते कई दिनो से लगातार बारी बारिश ही इस बाढ़ की मुख्य वजह है। एक नेता दलील देते हैं कि हम मौसम को तो नहीं बदल सकते हैं।
हर साल कई दौर में आने वाली भयावह बाढ़ असम की नियति बनती जा रही है। देश में असम में ही सबसे पहले बाढ़ आती है। कोसी नदी को जिस तरह बिहार का शोक कहा जाता है उसी तरह ब्रह्मपुत्र को असम का शोक या अभिशाप कहा जा सकता है। वैसे, यह प्राकृतिक आपदा असम के लिए नई नहीं है। इतिहासकारों ने अहोम साम्राज्य के शासनकाल के दौरान भी हर साल आने वाली बाढ़ का जिक्र किया है। पहले के लोगों ने इससे बचने के लिए प्राकृतिक तरीके अपनाए थे। इसलिए बाढ़ की हालत में जान-माल का नुकसान कम से कम होता था।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ? कब तक हटेगा यह कहर
भारत, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश यानी चार देशों से गुजरने वाली ब्रह्मपुत्र नदी असम को दो हिस्सों में बांटती है। इसकी दर्जनों सहायक नदियां भी हैं।तिब्बत से निकलने वाली यह नदी अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर आती है। वह गाद धीरे-धीरे असम के मैदानी इलाकों में जमा होता रहता है। इससे नदी की गहराई कम होती है। इससे पानी बढ़ने पर बाढ़ और तटकटाव की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी में तिब्बत के ग्लेशियरों के पिघलने और उसके तुरंत बाद मानसून सीजन शुरू होने की वजह से ब्रह्मपुत्र और दूसरी नदियों का पानी काफी तेज गति से असम के मैदानी इलाकों में पहुंचता है। पर्यावरणविद् अरूप कुमार दत्त ने अपनी पुस्तक द ब्रह्मपुत्र में लिखा है कि पहाड़ियों से आने वाला पानी ब्रह्मपुत्र औऱ उसकी सहायक नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ा देता है। यही वजह है कि राज्य में सालाना बाढ़ की समस्या गंभीर हो रही है। इसके अलावा भौगोलिक रूप से असम ऐसे जोन में है जहां मानसून के दौरान तो देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा बारिश होती ही है, इलाके में जल्दी-जल्दी आने वाले भूकंप समस्या को और गंभीर बना देते हैं।
एक पर्यावरण विशेषज्ञ जी.के. महंत कहते हैं-
अरुणाचल प्रदेश में बीते कुछ वर्षों के दौरान पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बांधों की मंजूरी दी गई है। उसके बाद खासकर वहां और पड़ोसी असम में बाढ़ की विनाशलीला तेज हुई है। उनके मुताबिक, तटवर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर होने वाला निर्माण कार्य बी बाढ़ के गंभीरता बढ़ा देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार बाढ़ से होने वाले नुकसान से बचाव की दिशा में कोई ठोस नीति नहीं बना सकी है। राज्य में हर साल आग लगने पर कुआं खोदने वाली स्थिति पैदा हो जाती है। इसके साथ ही बाढ़ के बाद इसकी वजहों की जांच करने वाली विशेषज्ञ समिति बाढ़ और भूमि कटाव की वजह से आम लोगों के जीवन और रोजी-रोटी पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर वाले पहलू की अनदेखी करती है।
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