हरियाणा की जाट पॉलिटिक्स ने दिए नए संकेत, दुष्यंत चौटाला पर सबकी नजर
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बेशक भाजपा हरियाणा में दुबारा अपनी सरकार बनाने जा रही है। लेकिन भाजपा को बहुमत न मिलना हरियाणा की राजनीति में नए संकेत लेकर आए है। भाजपा ने जातीए समीकरण की जमीन जो तैयार की थी उसे साधने में विफल रही। जाट वर्सेज नॉन जाट की राजनीति में भाजपा फेल हो गई। भाजपा को उम्मीद थी कि जाटों के खिलाफ गैर जाट एकत्रित होंगे और इसी गणित पर भाजपा आसानी से बहुमत हासिल कर लेगी।
लेकिन राज्य के 27 प्रतिशत जाट वोटरों की अच्छी रणनीति ने भाजपा को बहुमत से दूर कर दिया। यही नहीं जाटों ने साफ संकेत दिया है कि जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान भाजपा सरकार दवारा अपनाई गई रणनीति से जाट अब भी खासे नाराज है। हालांकि भाजपा पहले भी कभी जाट समुदाय की पार्टी हरियाणा में नहीं रही। यूपी के जाट से अलग हरियाणा के जाट भाजपा से हमेशा दूर रहे। जबकि राजस्थान में भी जाटों ने भाजपा को समर्थन दिया है। हरियाणा में भाजपा मूल रूप से बनियों की पार्टी रही। बाद में भाजपा से पंजाबी, ब्राहमण और अन्य पिछड़ी जातियां जुड़ी।
किसी जमाने में सिर्फ शहरी पार्टी होने के कारण हरियाणा में भाजपा को चुंगी पार्टी भी कहा जाता था। लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने हरियाणा में भारी उलटफेर कर दिया था। 2014 की जीत के बाद भाजपा ने हरियाणा की राजनीति में एक गैर जाट पंजाबी मनोहर लाल खटटर को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस की उस रणनीति को अपनाया था, जो कांग्रेस ने किसी जमाने में भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाकर अपनाई थी। लेकिन भाजपा 2019 में बहुमत से दूर रही। हालांकि, भाजपा का शहरी इलाके में दबदबा दिखा, लेकिन ग्रामीण इलाकों में भाजपा को बेरोजगारी और किसानी संकट के सवालों से जूझना पड़ा। भाजपा की हार काफी हद तक जाट मतदाताओं ने तय की।
चौधरी देवीलाल की विरासत दुष्यंत के पास
हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणामों ने जाट राजनीति में आया बदलाव साफ दिख रहा है। चुनावों से पहले यह अनुमान लगाया जा रहा था कि हरियाणा की जाट राजनीति से चौधरी देवीलाल परिवार समाप्त हो जाएगा। ठीक उसी तरह से जैसे उतर प्रदेश की राजनीति से चौधरी चरण सिंह का परिवार समाप्त हो गया है।
भाजपा ने चौधरी चरण परिवार की राजनीति एक तरह से यूपी में खत्म कर दी है। लेकिन हरियाणा में चौधरी देवीलाल परिवार की राजनीति को समाप्त करने में फिलहाल भाजपा विफल रही है। यही नहीं जाटों के एक बड़े नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा की राजनीति को भी भाजपा समाप्त नहीं कर पायी। चौधरी देवीलाल परिवार में विभाजन के बाद राजनीतिक विशेलेषकों को अंदाज था कि ओमप्रकाश चौटाला के दो बेटे अभय चौटाला और अजय चौटाला के बीच हुए विवाद से चौधरी देवीलाल परिवार की राजनीति खत्म हो जाएगी।
लेकिन यह अनुमान गलत साबित हुआ। चौधरी देवीलाल परिवार की विरासत जाटों ने बचा ली, बस अंतर इतना आया है कि जाटों ने चौधरी देवीलाल के पोते अजय चौटाला के परिवार को अभय चौटाला के परिवार के मुकाबले स्वीकार किया है। अभय़ चौटाला सिर्फ इस विधानसभा चुनाव में अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। चौधरी देवीलाल परिवार की राजनीतिक विरासत सिर्फ दुष्यंत चौटाला के पास चली गई है।
हालांकि इस बार एक कमाल और हो गया। चौधरी देवीलाल परिवार में ओमप्रकाश चौटाला के कारण हाशिए पर रहे देवीलाल के बेटे रणजीत सिंह भी इस बार विधानसभा चुनाव निर्दलीय जीत गए है। वे अब भाजपा को सरकार बनाने में मदद कर रहे है। इस बार देवीलाल परिवार से पांच लोग विधानसभा में पहुंचे। उसमें दुष्यंत चौटाला, अभय चौटाला, नैना चौटाला, रणजीत सिंह और अमित सिहाग शामिल है।
देशवाली जाटो और बांगर के जाटों में दिखा स्पष्ट विभाजन
24 अक्तूबर 2019 के चुनाव परिणाम ने बांगर और देशवाली इलाकों के जाटों के वोटिंग पैटर्न में स्पष्ट विभाजन दिखाया। देशवाली क्षेत्र के जाटों ने खुलकर भूपेंद्र सिंह हुड्डा का साथ दिया। बांगर के जाटों ने खुलकर दुष्यंत चौटाला का साध दिया। दुष्यंत चौटाला की पार्टी जननायक जनता पार्टी को ज्यादातर सीटें बांगर के इलाके से मिली है। इसमें हिसार, जिंद, भिवानी और फतेहाबाद जिले से उन्हें सीटें मिली है। जबकि कांग्रेस ने सोनीपत, रोहतक, झज्जर, पानीपत के इलाके जहां देशवाली जाटों की संख्या है, सीटें जीती है।
पहले भी बांगर के जाट चौधरी देवीलाल परिवार को समर्थन देते थे। 2005 के बाद देशवाली इलाकों में भूपेंद्र सिंह हुड्डा देशवाली जाटों के एकछत्र नेता हो गए थे। वहां के जाटों ने इस चुनाव में खुलकर हुड्डा का साथ दिया। हालांकि देशवाली इलाके के जाट बहुल कुछ सीटें कांग्रेस हारी है, जिसमें सोनीपत जिले के गन्नौर और राई आदि विधानसभा क्षेत्र शामिल है। इसके बावजूद जाटों का एकमुश्त वोट कांग्रेस को इस इलाके में गया है।
जाटों के कई बड़े दिग्गज धाराशाई, अब जाटों का चौधर हुडडा और दुष्यंत के पास
हरियाणा विधानसभा चुनाव में जाटों के कई दिग्गज धाराईशाई हो गए। जाटों का भाजपा विऱोध किस कदर था यह चुनाव परिणामों में दिखा। भाजपा के बड़े जाट दिग्गज चुनाव हार गए। इसमें प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला शामिल है। राज्य के वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु, कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ भी चुनाव हार गए। ये राज्य के वित्त मंत्री और कृषि मंत्री थे और जाट बिरादरी से संबंधित थे। इन दोनों मंत्रियों पर मुख्य रुप से राज्य के किसानों के हालात सुधारने का दारोमदार था। दोनों को जाटों ने रिजेक्ट किया।
बांगर इलाके दो और बड़े जाट नेता इस चुनाव में धाराशाई हो गए। इसमें एक कांग्रेस से जुड़े है और एक भाजपा से जुड़े है। कांग्रेस से भाजपा में गए पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलला उचाना से दुष्यंत चौटाला के मुकाबले बुरी तरह से हारी। वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता और प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला कैथल से चुनाव हार गए। रणदीप सुरजेवाला की हार ने कांग्रेस की जाट राजनीति में बदलाव लाया है। अब कांग्रेस के अंदर कोई और दूसरा जाट भूपेंद्र सिंह हुड्डा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है।
दुष्यंत की रणनीति भाजपा विरोध की होगी या समर्थन की?
चुनाव परिणाम के बाद सारों की नजर दुष्यंत चौटाला पर थी। क्योंकि त्रिशंकु विधानसभा के हालात बने और उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी विधायक थे। कांग्रेस भी एक बार उनसे बातचीत शुरू कर चुकी थी। हालांकि देर शाम तक हालात स्पष्ट हो गए क्योंकि, निर्दलीय विधायक भाजपा के साथ आ गए। लेकिन दुष्यंत ने चालाकी से समर्थन की बात को टाला। दरअसल भाजपा के साथ जाए या न जाए यह दुविधा दुष्यंत को परेशान कर रही थी। आगे भी अगले पाचं साल उनके साथ यह दुविधा रहेगी। दरअसल दुष्यंत को समर्थन देने वाली जाट बिरादरी भाजपा की विरोधी है। अगर दुष्यंत भाजपा के साथ जाएंगे तो जाट मतदाता नाराज होंगे। क्योंकि जाट आरक्षण आंदोलन से ही भाजपा और जाटों के बीच जोरदार विरोध चल रहा है।
जाट बहुल सीटों पर प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला, वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु और कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ की हार कुछ यही संकेत देते है। वैसे में दुष्यंत चौटाला भाजपा के साथ जाएंगे तो जाट वोट नाराज होगा। वहीं दुष्यंत की समस्या उनके पिता अजय चौटाला का जेल में होना है। अजय चौटाला समेत उनके पिता और भाई पर अभी भी आय से अधिक संपति के मामले में मुकदमा लंबित है। उस कारण सरकार का दबाव भी दुष्यंत चौटाला पर है।