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गुरु नानक जयंती: आज भी प्रासंगिक हैं गुरु नानक देव जी की शिक्षाएं

Mon, 07 Nov 2022 07:06 PM IST
Rajesh Verma राजेश वर्मा
Updated Mon, 07 Nov 2022 07:06 PM IST
सार

जब गुरु नानक देव जी ने इस धरती पर जन्म लिया तो दुनिया में पाखंड, अंधविश्वास और कट्टरता का बोलबाला था। जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था व छुआछूत चरम पर था। गुरु नानक ने लंगर प्रथा शुरू की, जहां गरीब-अमीर, ऊंच-नीच सभी लंगर खाते थे।

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Guru Nanak Gurpurab, Guru Nanak Dev Ji laid the foundation of the Sikh religion
गुरुनानक देव जयंती 2022 - फोटो : Twitter

विस्तार

बहुत कम लोग जानते होंगे की गुरु नानक देव जी के पूर्वज पंजाब के शासक रहे हैं। गुरु नानक देव जी का खानदान सूर्यवंशी भगवान् श्री राम चंद्र जी के बेटे 'कुष' से चलता है। इस वंश में बड़े-बड़े शूरवीरों व योद्धाओं के अलावा बहुत धुरंधर विद्वान भी हुए जिन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया। इन विद्वानों के विशाल वैदिक अध्ययन के कारण ही इस खानदान का नाम बेदी खानदान पड़ा।

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इसी महान शूरवीरता और विद्वत्ता की विरासत को लेकर गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ईस्वी में माता तृप्ता और पिता मेहता कालू (कल्याण चंद) के घर राए भोई की तलवंडी जिसे आजकल ननकाना साहिब कहते हैं, में हुआ। कल्याण चंद जी के पिता राए भोई की तलवंडी के करदार थे बाद में कल्याण चंद जी को यह पदवी मिली। 
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गुरु नानक जी बचपन से ही बड़े गंभीर स्वाभाव के थे। जो कुछ भी बोलते, सोच-समझ कर बोलते थे और उनकी कही हर बात अटल सत्य की तरह होती थी। बचपन में एक बार जब नानक किसी पोथी को पढ़ रहे थे तो पिता ने पूछा- नानक क्या पढ़ रहे हो तो उन्होंने कहा पिता जी मैं 'सप्त सलोकी' गीता पढ़ रहा हूं। उनकी ऐसी बातें सभी को अचरज में डाल देती थी। सभी के लिए गुरु नानक देव जी एक ब्रह्म ज्ञानी, एक महान विचारक, एक रहस्यवादी बन चुके थे।
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जब गुरु नानक देव जी ने इस धरती पर जन्म लिया तो दुनिया में पाखंड, अंधविश्वास और कट्टरता का बोलबाला था। जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था व छुआछूत चरम पर था। शासक दमनकारी और अन्यायी थे। आम जनता उस समय पीड़ित थी, चारों तरफ अंधेरा व्याप्त था।
 

गुरु नानक तो बचपन से ही विचारशील और तेज बुद्धि के मालिक थे। वे जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने के समर्थक थे। उन्होंने कहा कि जन्म से किसी की जाति ऊंची या नीची नहीं होती। ऊंच-नीच तो अच्छे और बुरे कर्म के माध्यम से तय होती है।

 


धर्म से बड़ी इंसानियत

गुरु नानक जी को जब ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ तो उन्होंने सबसे पहले यह कहा " ना हम हिंदू, न मुसलमान" अर्थात सभी मनुष्य एक हैं। गुरु जी जब मक्का में गए तो वह मक्का की तरफ पांव करके लेटे हुए थे तभी वहां मौलवी आया और वह यह सब देखकर क्रोधित हुआ। इसपर गुरु जी ने कहा जिधर मक्का नहीं उधर मेरे पांव कर दो। मौलवी यह बात सुन कर गुरु जी के पांव में गिर गया। इस तरह गुरु नानक ने यह समझाने का प्रयास किया कि परमात्मा हर जगह है।

गुरु नानक ने लंगर प्रथा शुरू की जहां गरीब-राजा, ऊंच-नीच सभी लंगर खाते थे। गुरु जी ने मलिक भागो की दावत को स्वीकार करने की बजाय गरीब लालो की कोदरे की रोटी खुशी-खुशी से खाई। उनका कहना है कि गरीबों को परेशान करके पैसा इकट्ठा करना गरीबों का खून चूसने के बराबर है। गुरु ने मलिक भागो की रोटी से हराम का खून और लालो की रोटी से हक हलाल का दूध निकाला।

गुरु ने गृहस्थ जीवन को सर्वोच्च बताया है। उन्होंने मनुष्य को कमल की तरह कीचड़ से निरलेप रह कर माया का मोह त्याग कर प्रभु भक्ति करने पर जोर दिया। गृहस्थी जीवन में मेहनत करके खाने पर जोर दिया। गुरु जी ने सेवा के महत्व को बताया, झाड़ू लगाना, बर्तन धोना, जूतों की सफाई करना, लंगर का प्रबंध करना आदि सेवा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सच्ची सेवा से ही मन हमेंशा घमंड से दूर रहता है। सच्चे मन से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव हो पाती है। इनकी शिक्षाओं ने मनुष्य में स्वाभिमान पैदा किया और बताया की गुलामी की जिंदगी से कभी शांति नहीं मिलती।

गुलाम व्यक्ति तो पिंजरे में कैद एक पक्षी की तरह होता है। औरत-पुरुष के बीच में भेदभाव को मिटाने के लिए गुरु जी ने बताया की जब भगवान् ने औरत को बनाने में उंच-नींच का भेदभाव नहीं समझा फिर पुरुष को किसने हक दिया ऐसा भेदभाव करने का। गुरु नानक देव जी ने स्त्री के स्वाभिमान को जगाया तभी अपनी वाणी में इन्होंने कहा है

" सो क्यो मंदा आखिए? जितुः जंमहि राजान।।

Guru Nanak Gurpurab, Guru Nanak Dev Ji laid the foundation of the Sikh religion
गुरु नानक देव जयंती विशेष - फोटो : Twitter

आडंबर-अंधविश्वास के घोर विरोधी

गुरु नानक जी ने भ्रम, आडंबर, अंधविश्वास का भी भरपूर खंडन किया है। मानवता के लिए गुरु नानक ने काम, क्रोध, लोभ मोह, अहम्, आदि अवगुणों को त्याग कर सच, संतोष, दया, धर्म व धीरज आदि सदगुणों को अपनाने का संदेश दिया, क्योंकि इससे ही इंसान, इंसान के नजदीक आता है।

गुरु नानक जी ने तो जनेऊ धारण करने से भी इंकार कर दिया था। बचपन में जब गुरु नानक जी को जनेऊ धारण करवाया जाने लगा तो उन्होंने भरी सभा में ऐसे जनेऊ की मांग की जो दया से भरपूर हो, सब्र, संयम का हो जो न कभी टूट सके न जल सके, न कभी मैला हो सके। उनके कुल पुरोहित पंडित हरदयाल ने कहा कि यह जनेऊ धारण करना उच्च जाति की निशानी है और यह लोक प्रलोक में भी रक्षा करता है।

 9 साल की छोटी सी आयु में जब गुरु नानक देव जी ने कहा की यदि इतने सारे गुण इसमें हैं तो इस जनेऊ को सबसे पहले मेरी बहन नानकी के गले में डाला जाए क्योंकि वह मेरे से पांच वर्ष बड़ी हैं यह सुनकर उस सभा में सन्नाटा छा गया हर कोई यह सुनकर हैरान था। तभी पीछे से आवाज़ें आई की नहीं-नहीं इसे केवल मर्द ही पहन सकते हैं, औरतें नहीं, तो गुरु नानक जी ने सीधे कहा की जो कच्चा धागा औरत-पुरुष व जाति प्रथा में ऊंच-नींच का भेदभाव पैदा करता हो वह उसे कभी धारण नहीं करेंगे।

भेदभाव के खिलाफ उठाई आवाज

आज हमारे समाज में धर्म कर्म के मामले में महिलाओं से भेदभाव किया जाता है, गुरु नानक देव जी प्रथम शख्सियत थे जिन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ़ खुलकर आवाज़ उठाई। वहीं जिस जातपात से आज भी हमारा समाज जूझ रहा है उसी जातपात व ऊंच-नीच के बंधनों को तोड़ने के लिए गुरु नानक देव जी ने उस समय नीच जाति कही जानी वाली मरासी जाति से संबंधित भाई मरदाने को अपना साथी व भाई माना। गुरु ग्रंथ साहिब में भी समानता की इस वाणी का जिक्र मिलता है

अविल अल्लाह नूर उपाए, कुदरत दे सब बंदे।।
एक नूर ते सब जग ऊपजया कौन भले कौन मंदे।।


17 वर्ष की आयु में नानक जी के पिता ने व्यापार करने के लिए 20 रुपये दिए। नानक अपने पड़ोसी मित्र बाला के साथ व्यापार के लिए निकल गए। रास्ते में एक स्थान पर उन्हें भूखे साधु महात्मा मिले नानक ने पिता जी के द्वारा दिए 20 रुपये से राशन खरीद कर उन साधुओं को भिजवा दिया और खुद खाली हाथ घर लौट आए। घर वापसी पर पिता जी से डांट भी खाई लेकिन उन्होंने कहा कि पिता जी आपने ही कहा था की सच्चा सौदा करना है और इससे सच्चा व खरा सौदा और क्या हो सकता है।

गुरु नानक देव जी ने पुजारीवाद व ब्राह्मणवाद का भय लोगों में से दूर किया। इन्होंने मौलवियों, जोगियों, पीरों, अंहकारी राजाओं और पाखंडियों को मुंह पर खरी खोटी सुनाकर आम लोगों के दिलों दिमाग में से इनका भय दूर किया। गुरु नानक देव जी की और भी बहुत शिक्षाएं व उपदेश हैं जिन्होंने पूरी मानव जाति की भलाई के लिए कार्य किया।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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