फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   gujarat news cm vijay rupani resignation know political analysis and effects

गुजरात: इसलिए हटाए गए रूपाणी? कहीं ये तो नहीं भाजपा की प्लानिंग?

Sat, 11 Sep 2021 08:06 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Sat, 11 Sep 2021 08:06 PM IST
सार

गुजरात के सीएम विजय रूपाणी के इस्तीफे के कई मायने हैं। दरअसल, पार्टी की हालत 2017 के चुनाव में भी खस्ता थी और बेहद मुश्किलों से वहां दोबारा भाजपा की सत्ता में वापसी हो पाई थी।

विजय रूपाणी ने अमर उजाला से कहा था कि भाजपा 150 सीटें जीतेगी। उनसे न तो केशुभाई पटेल नाराज़ हैं, न आनंदीबेन पटेल, सब साथ हैं और राहुल गांधी या कांग्रेस को कोई गंभीरता से नहीं लेता।

विज्ञापन
gujarat news cm vijay rupani resignation know political analysis and effects
आम लोगों में नाराज़गी के बावजूद अगर 2017 में विजय रूपाणी जीते तो वह प्रधानमंत्री मोदी की ही मेहरबानी थी। - फोटो : एएनआई

विस्तार

कहते हैं कि गुजरात में पिछले करीब दो दशकों से एक पत्ता भी नरेन्द्र भाई मोदी की रजामंदी के बगैर नहीं हिलता। अपनी सरकार के खिलाफ जबरदस्त हवा होने और आम लोगों में नाराज़गी के बावजूद अगर 2017 में विजय रूपाणी जीते तो वह प्रधानमंत्री मोदी की ही मेहरबानी थी। एकदम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अगर बड़ी मुश्किलों से भाजपा ने 182 में से तब 99 सीटें हासिल कीं तो उसकी वजह भी मोदी ही बने।

विज्ञापन


इधर, कई सीटें तो भाजपा ने हारते हारते बस किसी तरह जीतीं। अगर कांग्रेस से शंकर सिंघ वाघेला जैसे नेता अलग नहीं होते और राहुल गांधी संयमित होकर बयानबाजी करते तो कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस सरकार बना ले जाती। लेकिन नतीजे तो नतीजे हैं, जीत तो जीत है, भले ही एक वोट से क्यों न हो।

विज्ञापन

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान गुजरात में रिपोर्टिंग करते वक्त बहुत सारे ऐसे लोग मिले थे जो मोदी के पीएम बनने और गुजरात छोड़ देने से दुखी थे। ज्यादातर लोग मोदी के बगैर भाजपा के किसी नेता को पसंद नहीं करते थे और उनका कहना था कि जब से मोदी ने गुजरात छोड़ा है, बाकी नेताओं ने गुजरात का बुरा हाल कर दिया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

तब मोदी सरकार के नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से भी गुजरात का व्यापारी वर्ग बुरी तरह नाराज़ था। सूरत, राजकोट और अन्य इलाकों में किस तरह बीजेपी को जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा, ये सबको याद है।

पार्टी की हालत 2017 के चुनाव में भी खस्ता थी और बेहद मुश्किलों से वहां दोबारा भाजपा की सत्ता में वापसी हो पाई थी। विजय रूपाणी ने अमर उजाला से कहा था कि भाजपा 150 सीटें जीतेगी। उनसे न तो केशुभाई पटेल नाराज़ हैं, न आनंदीबेन पटेल, सब साथ हैं और राहुल गांधी या कांग्रेस को कोई गंभीरता से नहीं लेता।

gujarat news cm vijay rupani resignation know political analysis and effects
कोरोना काल आने के बाद से जिस तरह रूपाणी सरकार की नाकामियां सामने आईं, - फोटो : अमर उजाला

मोदी से दूर नहीं गया गुजरात 

ये सब जानते हैं कि मोदी ने पीएम बनने के बाद अपनी विश्वस्त आनंदीबेन पटेल को गुजरात की सत्ता सौंपी थी, लेकिन उनके राज में भ्रष्टाचार और पाटीदारों के जबरदस्त आंदोलन से निपटने में नाकामी की वजह से उन्हें हटाकर कैसे विजय रूपाणी को सत्ता सौंपी गई और कैसे रूपाणी को कमान देने से मनसुख मंडाविया और नितिन पटेल  समेत वहां के तमाम नेता नाराज़ थे, ये बात भी सुर्खियां बनती रही थीं। लेकिन पिछले दो सालों में गुजरात की हवा बदल गई है।

खासकर कोरोना काल आने के बाद से जिस तरह रूपाणी सरकार की नाकामियां सामने आईं, जिस तरह अस्पतालों में लोगों की लंबी लंबी कतारें देखी गईं और मौतों का सिलसिला रोक पाने में, मरीजों को ऑक्सीजन दिला पाने में, वैक्सीनेशन का लक्ष्य पूरा कर पाने में वो नाकाम रही उससे लोगों के भीतर जबरदस्त गुस्सा है।


पिछले कई महीनों से गुजरात के सियासी हलकों में ये चर्चा आम है कि रूपाणी की नाकामी से मोदी और अमित शाह खफ़ा हैं और गुजरात के लोगों का भरोसा फिर से जीतने की कोशिश तभी हो सकती है जब रूपाणी को हटाया जाए।

केन्द्रीय नेतृत्व लगातार इसी मंथन में लगा था कि गुजरात में करीब 14-15 महीने बाद चुनाव होने हैं और अगर अब फैसला नहीं लिया गया तो स्थिति हाथ से निकल जाएगी। जाहिर है रूपाणी को हटने का इशारा कर दिया गया।

gujarat news cm vijay rupani resignation know political analysis and effects
नेतृत्व परिवर्तन कोई हंसी खेल नहीं। इसके दूरगामी मायने होते हैं और पार्टी की रणनीति होती है। - फोटो : ANI

सोच-समझकर लिया गया फैसला? 

पार्टी को इस बात का एहसास है कि उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन का फैसला लेने में उसे देर हुई और वहां भी त्रिवेंद्र सिंह रावत को हराकर जिस तरह तीरथ सिंह रावत जैसे नेता को बनाकर उसने फिर से गलती की और अब पुष्कर सिंह धामी को कमान सौंप कर वह 6 महीने बाद होने वाले चुनाव में कितनी कामयाबी हासिल कर पाएगी, उसे लेकर खुद असमंजस में है।

ऐसी गलती वह गुजरात में नहीं दोहराना चाहती, इसलिए वक्त रहते और कोरोना की संभावित तीसरी लहर से पहले पार्टी ने फटाफट रूपाणी को हटाने का फैसला कर डाला।

जाहिर है नेतृत्व परिवर्तन कोई हंसी खेल नहीं। इसके दूरगामी मायने होते हैं और पार्टी की रणनीति होती है। गुजरात प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा का सवाल है और उसे किसी भी तरह अपने हाथ में बरकरार रखना उनकी पहली प्राथमिकता बनती है।
 

ज़मीनी हकीकत बेशक पहले से कहीं ज्यादा खराब हो, भाजपा को लेकर असंतोष के स्वर उभर रहे हों और कोरोना काल में सरकार की छवि संवेदनहीन और जनता विरोधी बनी हो, लेकिन उसे ठीक करने या लोगों के घाव पर थोड़ा मरहम लगाने के लिए थोड़ा वक्त जरूरी है जो चुनाव में फायदा पहुंचा सके।


जब से पाटीदारों का आंदोलन फैला, भाजपा की कोशिश इस समुदाय को खुश करने की रही है, इसलिए माना जा रहा है कि शायद नया नेतृत्व किसी पाटीदार वर्ग से हो और इसके लिए मनसुख मंजाविया का नाम लिया जा रहा है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटील का नाम भी लिया जा रहा है जिसके नेतृत्व में भाजपा ने तमाम उप चुनाव और निकाय चुनाव जीते हैं।

कौन होगा नया सीएम? 

पुरुषोत्तम रुपाला से लेकर गोरधन जडाफिया तक के नाम हवा में तैर रहे हैं। लेकिन ये अटकलें मीडिया भले ही लगाए, केन्द्रीय नेतृत्व पहले से ही रूपाणी का विकल्प तय कर चुका है और उसपर महज औपचारिक मुहर लगनी बाकी है। इन सियासी घटनाओं पर कांग्रेस गहराई से नजर रख रही है और अगले चुनाव में फिर से कोई गलती न हो, इसके लिए रोडमैप तैयार करने में जुटी है।

जाहिर है चुनावी गणित के दांप पेंच में रूपाणी का जाना कोई ताज्जुब नहीं पैदा करता, क्योंकि भाजपा दूर की सोच रही है। सियासत में लोगों की भावनाओं से ज्यादा चुनावी समीकरण मायने रखते हैं और जाहिर है अमित शाह और मोदी फिलहाल इन समीकरणों को साधने में माहिर साबित हुए हैं। फिर ये तो गुजरात की बात है जिसके ‘विकास मॉडल’ की बात करके जाने कितनी सत्ता हासिल की गई है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed