Gudi Padwa 2022: श्रीखंड की मिठास में नीम के पत्तों सी करकरी गुड़ी पड़वा
भारतीय त्योहार भावनाओं का समंदर हैं। इनसे अनमोल और खूबसूरत यादें जुड़ी होती हैं। जो सभी को परिवार और समाज से भी जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए यहां हर त्योहार सबका साझा होता है।
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ऋतुएं बदलती हैं, फसलें नई होती हैं, प्रकृति नया चोला धारण करती है। पौधों-वृक्षों पर नई कोंपलों का फूटना नए के आगमन का स्वागत होता है। भारत की खूबसूरत सांस्कृतिक विरासत इसे विविधता से भरपूर बनाती है। गुड़ी पड़वा का त्यौहार इसी सांस्कृतिक परम्परा का अंग है।
गुड़ी पड़वा अर्थात हिन्दू नव वर्ष। जो कि नव सम्वत्सर के रूप में पहचाना जाता है। दक्षिण भारत मे इसी दिन उगादि पर्व मनाया जाता है और इसका अर्थ भी नव वर्ष से ही जुड़ा है। नया वर्ष यानी नई आशाओं व शुभता के आगमन का प्रतीक। चैत्र माह की प्रतिपदा यानी पहली तिथि के उस नव वर्ष के साथ ही शुरू हो जाता है चैत्र नवरात्र का पर्व भी। अर्थात देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना का समय। इस लिहाज से यह समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
बचपन में गुड़ी पड़वा की सबसे बड़ी चुनौती होती थी, कड़वे नीम की पत्तियां खाने की। दादी कहतीं-'नए साल में कड़वा खाओ तो सालभर बीमारी दूर रहती है। जाहिर है कि नीम की पत्तियां खाना आसान नहीं होता। सो पापा चुन चुनकर नीम की नाजुक, तांबे और हरे रंग के कॉम्बिनेशन से बनी कोपल तोड़ लाते। फिर उन कोपलों की गोलियां बनाई जातीं और शकर के साथ हमारे हाथ में रखी जातीं। मां पानी का गिलास लिए खड़ी रहती और हम बच्चे एक एक करके वो गोलियां निगल जाते। ऊपर से शकर की फंकी मार लेते। कसैला-कड़वा से स्वाद गले से नीचे उतरकर नीम की कड़वाहट भरी सुगंध को भी नाक में भर देता लेकिन मन मे ये संतुष्टि होती कि अब बीमारियां दूर रहेंगी। ये आस्था और विश्वास का मामला अधिक था। क्योंकि केवल साल में एक बार नीम की दो कोंपलें चबा लेने से स्वास्थ्य पर उनकी मात्रा जितना ही असर हो सकता था। पर असली असर होता था साल भर धूप में भागने-दौड़ने, बिना मोबाइल और कम्प्यूटर पर आंखें गड़ाए समय गुजारने, तेज धूप और बरिश दोनों में बेपरवाह घूमने और दोनों समय घर का ताजा खाना व मौसमी फल-सब्जियां खाने से। जो आज के बच्चों को बहुत कम ही नसीब होता।
कड़वी नीम की पत्तियां चबाने के बाद जिस चीज का इंतज़ार होता था वह था ठंडा, मीठा और हल्का खट्टा श्रीखंड। साथ ही बनती थी मीठी और नमकीन घी से तर पूरनपोली। नमकीन पूरनपोली इसलिए ताकि मीठे और नमकीन का बैलेंस रहे। साथ ही माँ बताती कि गुड़ी पड़वा पर कोई भी चीज स्टफिंग करके यानी भर कर बनाने का रिवाज है, ताकि साल-भर घर मे अन्न-धान भरापूरा रहे।
सुबह जल्दी नहा-धोकर हम निकलते आस-पड़ोस के महाराष्ट्रीयन घरों में सजी गुड़ी को देखने। यह महाराष्ट्र की परंपरा का अभिन्न अंग है। सारे घरों के चक्कर लगाने के बाद तय किया जाता कि कौन से घर की गुड़ी ज्यादा सुंदर है। फिर हम बच्चे पूरी कॉलोनी में घू मकर उस नाम का ढिंढोरा पीटते।
भारतीय त्योहार भावनाओं का समंदर हैं। इनसे अनमोल और खूबसूरत यादें जुड़ी होती हैं। जो सभी को परिवार और समाज से भी जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए यहां हर त्योहार सबका साझा होता है। जब पड़ोस से आई पूरनपोली की महक और मिठास मन मे घुलती है तो त्योहार का आनंद और भी बढ़ जाता है। उम्मीद करें कि यह नववर्ष भी सुखद खबरें लेकर आएगा और विगत की कड़वी यादों पर मिठास की परत चढ़ा जाएगा।
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