गोवा यात्रा 3: रोजगार के बेहतरीन ठिकाना बन रहे गोवा के बीच
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खूबसूरत गोवा में रुकने के लिए मैंने उत्तरी गोवा का मोरजिम बीच रिजार्ट चुना है। पणजी हवाई अड्डे से यहां करीब एक घंटे का रास्ता है। उत्तरी गोवा के बीचों की श्रृंखला का ये आखिरी बीच है। ये रिसार्ट समुद्र तट से सबसे करीब रिसार्टस में एक है। मोरजिम शांत और एकांत बीचों में एक है। इस रिसार्ट के आखिरी सिरे पर बने हट्स की खिड़कियों से समुद्र साफ नजर आता है, क्योंकि समुद्र यहां से कोई 300 मीटर दूर है।
यहां से रात में आप सागर की लहरों की आवाज सुन सकते हैं। इस समुद्र तट के बॉर और शेक्स यानी छोटी-छोटी लकड़ी और बांस के झोपड़ियों के रेस्टोरेंट इसे एक आकर्षक पर्यटन स्पॉट बनाते हैं। गोवा में मोरजिम बीच विदेशियों की पसंदीदा जगह है। खासतौर से रूसी पर्यटकों का, लेकिन आजकल विदेशी पर्यटकों पर रोक है। इसलिए ज्यादातर रिसोर्ट खाली हैं।
मैंने समंदर के किनारे वाला कमरा चुना। बातचीत से पता चला इस पुराने रिसार्ट को अमरेंद्र चला रहे हैं। अमरेंद्र लखनऊ के हैं और पांच साल से इस प्रापर्टी को संभाल रहे हैं। मेरे हट की बालकनी से मारजिम बीच का नजारा गजब है। सामने सूखी घास का मैदान और उसके पार अरब सागर की लहरें। घूमने के लिए मैंने एक कार किराए पर ली है। नारियल के पेड़ों के बीच से गुजरती सड़क पर वो फिसली जा रही है।
मैं अपने चारों तरफ बिखरी हरियाली अपने भीतर महसूस कर रहा हूं। पौराणिक साहित्य में मैंने कभी पढ़ा था कि गोवा का प्राचीन नाम गोपराष्ट्र था। गोपराष्ट्र यानी गाय चराने वालों का देश। सड़क पर आज भी बहुत सी गायें देख रहा हूं, लेकिन ये गायें हमारे उत्तर भारत से अलग हैं। इनकी सींगे एकदम अलग हैं। आगे से इतनी तीखी कि जैसे कोई नुकीला खंजर हो, लेकिन फिर भी ये सींगे इंसानों के लिए सुरक्षित हैं क्योंकि उनकी सींगें पीछे की ओर घूमी हुई हैं।
ये गायें आपको बीच पर भी घूमती टहलती मिल जाएंगी। यहां एक समुद्र तटीय गांव गोअ-वेल्हा हुआ करता था। कहते हैं इसीलिए पुर्तगालियों ने इसे गोवा कहा। अरब सागर के किनारे का यह तटीय इलाका सामरिक या आर्थिक दृष्टि से न मुगलों के मतलब का था न अंग्रेजों के. पुर्तगाली बहुत चालाक थे। ये मुगलों को महंगे तोहफे देकर अपने तटीय राज्यों से दूर ही रखते थे। इसलिए न अकबर, न औरंगजेब और न ही अंग्रेजों ने गोवा में कोई दिलचस्पी ली. और पुर्तगाली आजादी के बहुत बाद तक गोवा पर तब तक शासन करते रहे जब तक नेहरू ये नहीं कहा अब बहुत हो गया अब आप लोग सम्मान से अपने घर लौट जाइए।
पुर्तगाली तब भी नहीं माने तो 1961 में भारतीय सेना ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। जाते-जाते पुर्तगाली अपनी जमीनें यहां के जमींदारों को औने पौने दामों पर बेच गए। आज भी यहां समुंद्र के किनारे के बड़े-बड़े जमीन के टुकड़े गोवा के रइसों के नाम हैं। जो गरीब थे वे बेचारे गरीब ही रह गए। इन्हें रहने के लिए जमीन के छोटे छोटे टुकड़े देकर जमींदारों ने उपकृत कर दिया। यहां के मूल कोंकण निवासी या तो हिंदू हैं या क्रिश्चियन। स्वभाव के सरल और सीधे। इनकी जिंदगी आज भी मछली भात के आगे नहीं बढ़ी।
छोटी छोटी दुकाने, ढ़ाबे खोलकर जीवन चलाते हैं। न कोई महत्वाकांक्षा और न कोई जोखिम उठाने का साहस। वे सुबह दुकानें खोलते हैं। दोपहर में दुकानें बंद करके सोने के लिए घर चले जाते हैं। शाम को थोड़ी देर के लिए फिर दुकानें खोलते हैं, और रात में बियर के साथ मच्छी भात खा कर सो जाते हैं। वैसे तो गोवा को भारत का सबसे अमीर राज्य माना जाता है। यहां की प्रति व्यक्ति जीडीपी दर भारत की जीडीपी के मुकाबले तीन गुना है।
हैरत की बात ये कि इसमें स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी बहुत कम है...
पयर्टन गोवा का मुख्य उद्योग है। जाहिर है इसका श्रेय यहां की प्राकृतिक सुंदरता और आकर्षक समुद्री तटों को जाता है, लेकिन हैरत की बात ये कि इसमें स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी बहुत कम है। गोवा के होटलों, रिसार्ट, बीच के रेस्टोरेंट्स, आदि पर आज भी बाहरी राज्यों के लोगों का कब्जा है। यहां बाहरी लोगों को उत्तरांचल और हिमाचल प्रदेश की तरह जमीन खरीदने पर पाबंदियां नहीं है। जमीन की कीमत भी सस्ती है तो दूसरे राज्यों से आए कारोबारियों ने अपने उद्योग धंधे शुरू कर दिए।
कुछ जमीनें लीज पर लेकर पैसा कमा रहे हैं। थोड़ा पैसे में बिजनेस शुरू करने के लिए ये अच्छी जगह है। स्थानीय लोग या तो समुन्द्र में मछली पकड़ते हैं या बियर या वाइन की दुकानों पर काम करते हैं। ज्यादातर गोवा वासी दुकानें खोलकर पर्यटकों की छोटी- मोटी जरूरतों को पूरा करते हैं। अपने स्कृटर, बाइक और अपनी कारें किराए पर देते हैं और उनसे पैसा एंठने के लिए छोटी-मोटी मक्कारियां करते हैं। ऐसी मक्कारियां जो आमतौर पर देश के बाकी पर्यटन स्थलों में पाई जाती हैं।
मसलन गोवा में आपको 300 रुपए प्रतिदिन किराए पर स्कूटी या बाइक मिल जाएगी। रेटल कार 2000 रुपए प्रति दिन के किराए पर। कोई तीस फीसदी गोवन इसी धंधे में हैं। स्कूटी किराए पर लेकर आप दो दिन में उत्तरी गोवा के सारे समुद्री किनारे घूम लेंगे। मुझसे पूछें तो गोवा घूमने का असल मजा स्कूटी या बाइक पर है। कंधे पर एक बैग में जरूरी चीजें रखिए और निकल पड़िए ड्राइव पर। नारियल और पॉम के पेडों के झुरमुठों में सड़कें आपको सीधे बीच के किनारें लाकर खड़ा कर देंगी। इन बीचों का सटीक पता आपको गुगल मैप बता देगा। किसी से पूछने की जरूरत नहीं।
पेट्रोल पंप कम हैं और दूर दूर भी, लेकिन कोई फिक्र नहीं। यहां आपको सड़क के किनारे हर सब्जी वाले की दुकान पर, अंडे वाले की दुकान पर पेट्रोल की बोतल मिल जाएगी। एक लीटर पेट्रोल की कीमत नब्बे रुपए है, लेकिन तब जब आप रेट पहले पूछ कर पेट्रोल खरीदें। अगर बाइक में पेट्रोल डालने के बाद पूछेंगे तो ये गोवन आपसे 90 के बजाए सौ रुपए ले लेंगे। एक युवक इस बात पर एक दुकानदार से झगड़ रहा है।
उसने कहा -बगल की दुकान पर पर नब्बे रुपए की बोतल है। मैं अभी खरीद कर तुम्हे वापस करता हूं। चोरी पकड़े जाने पर वो भोला दुकानदार बोला वो पेट्रोल में पानी मिला कर बेचता है। मुझे हंसी आ जाती है। फिर वह दुकानदार अपने पड़ोसी दुकानदार से झगड़ने लगता है। तुम 90 की क्यों बेच रहे हो? दूसरा दुकानदार नाराज ग्राहक कहता है- 'ये ठीक कह रहा है। मेरी बोतल में तेल थोड़ा कम है। इस भोलेपन को आप क्या कहेंगे? सोच कर हंसता हूं दो चोरों को मौसेरा भाई क्यों कहा जाता है? यही बेचारे आलसी गोवा वालों की कमाई है।
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