अब अमीर देश भी भुगत रहे जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम
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जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम पहले गरीब तीसरी दुनिया के देश ज्यादा भुगत रहे थे, लेकिन अब इसकी मार, इसके लिए जिम्मेदार अमीर देशों पर भी पड़ रही है। यह दावा हाल ही में जारी वैश्विक जलवायु संकट सूचकांक यानी ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स में किया गया है।
यह रिपोर्ट मेड्रिड में "काप 25- जलवायु वार्ता सम्मेलन" में दुनिया के सभी देशों के बीच बीती 4 दिसंबर को जारी की गई। पर्यावरण थिंक टैंक जर्मनवॉच द्वारा प्रकाशित वैश्विक जलवायु संकट सूचकांक दर्शाता है कि वर्ष 2018 में जापान और जर्मनी जैसे औद्योगिक देशों में गर्मी की लहर और भीषण सूखे की मार सबसे भयावह थी, जबकि फिलीपींस ने दुनिया भर में दर्ज सबसे प्रचंड तूफान का सामना किया।
मौसम से संबंधित नुकसान की घटनाओं (तूफान, बाढ़, हीटवेव आदि) के प्रभाव से देश और क्षेत्र किस हद तक प्रभावित हुए हैं, का आकलन इस ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2020 में किया गया है। इसमें 1999 से 2018 तक का डाटा उपलब्ध है।
नवीनतम डाटा वर्ष 2018 का है। अगर इस इंडेक्स में उपलब्ध 1999 से 2018 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया जाए, तो मालूम पड़ता है कि कि गरीब देशों पर ये जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव और भी अधिक हैं।
इस दौरान जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाले दस में से सात देश विकासशील देश हैं, जहां प्रतिव्यक्ति आय निम्न या निम्न-मध्यम है। लंबी-अवधि के सूचकांक के अनुसार पुएर्टो रीको, म्यानमार और हैती सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देश हैं।
पिछले 20 वर्षों में, पूरी दुनिया में करीब 500,000 मौतें हुईं, जो सीधे तौर पर 12,000 से अधिक बार पड़ी मौसम की भीषण मार की वजह से हुईं। आर्थिक क्षति की बात करें तो पूरी दुनिया में करीब 3.54 अमेरिकी डॉलर (क्रय शक्ति समता के आधार पर गणना की गई) का नुकसान हुआ।
रिपोर्ट के लेखक डेविड एकस्टीन, वेरा कुन्ज़ेल, लौरा शॉफर व माईक विंग्स हैं। जर्मनवॉच, बोन्न एंड बर्जिन (जर्मनी), स्थित एक स्वतंत्र संस्था एवं पर्यावरणीय संगठन है, जो स्थाई वैश्विक विकास के क्षेत्र में काम करती है।
इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली टीम के एक सदस्य डेविड एकस्टीन के मुताबिक, "दि क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स यह दर्शाता है कि जलवायु के भीषण रूप के विनाशकारी प्रभाव पड़े हैं, खासकर गरीब देशों पर, लेकिन साथ ही जापान और जर्मनी जैसे औद्योगिक देशों को भी गंभीर नुकसान पहुंचा है, जो निरंतर बढ़ रहा है।"
हैती, फिलीपींस और पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों पर बार-बार मौसम की भीषण मार पड़ रही है और इन देशों को संभलने का मौका तक नहीं मिल पा रहा। रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि अब गरीब देशों को भरोसेमंद वित्तीय सहायता मिलना बेहद जरूरी हो गई है। यह सहायता न केवल जलवायु परिवर्तन की मार झेलने के बाद पुनर्वास के लिये हो, बल्कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली हानि एवं क्षति की भी पूर्ति इससे की जा सके।
वर्ष 2018 में तेज गर्म हवाओं के कारण सबसे ज्यादा क्षति हुई। पिछले साल सबसे अधिक प्रभावित होने वाले 10 देशों में जर्मनी, जापान और भारत भी शामिल हैं, जहां अपनी नियमित समयसीमा से अधिक समय तक गर्म हवाएं चलीं।
हाल ही के एक अध्ययन में यह साबित हो गया है कि गर्म हवाओं की पुनरावृत्ति और उनकी भीषणता से जलवायु परिवर्तन का सीधा संबंध है। यूरोप में, उदाहरण के लिए, गर्म हवाओं की अवधि 100 वर्ष पूर्व की तुलना में 100 गुनी है। साथ ही साथ, डाटा की कमी के कारण, अफ्रीका महाद्वीप पर गर्म हवाओं के प्रभाव को कम दर्शाया गया हो।
सितंबर 2019 में प्रकाशित एक अन्य शोधपत्र में 1973 और 2017 के बीच ऑस्ट्रेलियाई आग के मौसम की परिवर्तनशीलता को समझते हुए शोधकर्ता सारा हैरिस व क्रिस लुकास लगभग इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जंगलों की आग का जलवायु परिवर्तन से सीधा संबंध है।
मौसम की घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध को देख रहे वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से इस बात की गणना की है कि मानव द्वारा किए गए जलवायु परिवर्तन के कारण विशेष आग की आशंका को और अधिक गंभीर बना दिया है।
जर्मनवॉच के लौरा शॉफर ने जोर देते हुए कहा कि, "अब तक जिस तरह से गरीब लोग और देश मौसम की भयंकर मार के कारण क्षति और हानि से निबटने के लिए जूझ रहे हैं, उसे देखते हुए जलवायु वित्तीय सहायता के मुद्दे को जलवायु शिखर सम्मेलन में उठाने की जरूरत है।
इन देशों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की मार सबसे अधिक इसलिए पड़ी क्योंकि इनके पास इस परिवर्तन की वजह से होने वाली हानि और क्षति से निबटने के लिए वित्तीय और तकनीकी क्षमता की कमी है"।
इस रिपोर्ट में 2-13 दिसंबर के बीच मैड्रिड में जारी अंतर्राष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलन कॉप25 में होने वाली चर्चा को महत्वपूर्ण बताया है। जहां जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण अब स्थाई परिणाम पूरी दुनिया में दिखने लगे हैं, वहीं भूमि, सभ्यता और मनुष्यों के जीवन की हानि की भरपाई के लिए अब तक संयुक्त राष्ट्र में किसी भी प्रकार की वित्तीय सुविधा नहीं है।
फिलहाल औद्योगिक देशों ने किसी भी प्रकार की बातचीत तक से इंकार कर दिया है। लेकिन, ऐसा पहली बार हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान एवं क्षति की भरपाई के लिए वित्तीय सहायता को कॉप25 के एजेंडा में ऊपर रखा गया है, जिसके चलते सबसे गरीब और सबसे संवेदनशील देशों के लिये यह शिखर सम्मेलन बेहद महत्वपूर्ण होगा।
लौरा शॉफर जोर देकर कहते हैं कि "जलवायु सम्मेलन के परिणामस्वरूप यह फैसला लेने की सख्त आवश्यकता है कि अतिसंवेदनशील देशों पर पड़ने वाली मौसम की मार का नियमित आकलन किया जाए, साथ ही भविष्य में होने वाली क्षति से निबटने के लिए उन्हें सहायता प्रदान की जाए। और तो और इस वित्तीय जरूरत को पूरा करने के लिए एक भरोसेमंद स्रोत को विकसित करने के लिए जरूरी कदम उठाने पर कॉप25 को निर्णय लेना चाहिए। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलने को भी मजबूती देने की आवश्यकता है।"
देखना यह है कि जिन अमीर देशों ने पूरी दुनिया की जलवायु की सेहत बिगाड़ी है जिसके दुष्परिणाम गरीब देश भुगतते रहे हैं, क्या अब जब इसके दुष्परिणाम इन अमीर देशों की भी सेहत बिगाड़ रहे हैं, क्या अब ये देश जागेंगे ?
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