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गिरीश कर्नाड: वे नहीं होंगे लेकिन हर जगह याद किए जाएंगे, हर बतकही में उनके किस्से दोहराए जाएंगे

Sachin Shrivastavaसचिन श्रीवास्तव Updated Mon, 10 Jun 2019 07:02 PM IST
गिरीश जी भारतीय रंगकर्म का सबसे लोकप्रिय चेहरा थे।
गिरीश जी भारतीय रंगकर्म का सबसे लोकप्रिय चेहरा थे। - फोटो : social media
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गिरीश कर्नाड नहीं रहे। आज सुबह से ही विभिन्न व्हाट्सएप समूहों, व्हाट्सएप इनबॉक्स से लेकर फेसबुक यूट्यूब और परंपरागत मीडिया तक यह खबर तेजी से फैली और लाखों लोगों की आंखें नम कर गईं। गिरीश जी का न होना महज दो-तीन घंटों में सारी दुनिया के उनके चाहने वालों तक खबर की शक्ल में पहुंच गया था। लेकिन 19 मई 1938 को देश के सबसे छोटे हिल स्टेशन माथेरान में पैदा हुए गिरीश के जन्म के बारे में उनके वजूद के बारे में दुनिया में काफी देर से जाना, बल्कि गूढ़ अर्थों में कहें तो अब तक ठीक से गिरीश को जाना ही नहीं गया।
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एक कलाकार और व्यक्ति के रूप में गिरीश जी 
गिरीश जी को लोकप्रियता मिली, बतौर निर्देशक उन्हें सम्मान मिला, बतौर लेखक उन्हें प्यार मिला, बतौर इंसान उन्हें सहज आत्मीयता भी मिली। लेकिन हकीकत यही है कि गिरीश जी के व्यक्तिव के कई हिस्से उनके साथ ही चले गए हैं।

वे लेखक, अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक और नाटककार के दायरे से कहीं आगे एक दार्शनिक शख्सियत भी थे। अपनी पहली और आखिरी मुलाकात के जरिये उन्हें खुद मुझ पर जो प्रभाव डाला वह आज तक उतना ही ताजा, यकीनी और बेहद मुलायम है, जितना करीब 14 साल पहले दिल्ली की सर्द शाम में था। 

वे खुद को अर्बन नक्सल घोषित कर चुके थे। बीमारी के बावजूद उन्होंने बेंगलुरु में अपने विरोध को आगे बढ़कर दर्ज किया था। इस देश की खुली लूट और कमजोर तबकों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ वे एक बुलंद आवाज थे। उनकी शारीरिक उपस्थिति अब किसी कार्यक्रम, किसी सभा, किसी बतकही में न होगी, लेकिन आप जानते हैं कि हर कार्यक्रम में याद किए जाएंगे, हर सभा में उनके नाटकों, उनके लेखन का जिक्र होगा, हर बतकही में उनके किस्से दोहराए जाएंगे।

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