क्या हुआ जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पहुंचे कश्मीर?
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आज राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय पटल पर जम्मू-कश्मीर का मुद्दा गरमाया हुआ है। कश्मीर भारत और भारत से बाहर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा का विषय है। घरेलू राजनीति में कश्मीर को लेकर तमाम आरोप प्रत्यारोप चल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मध्यस्थता की पेशकश की जा रही है। घरेलू राजनीति में कहीं पंडित जवाहर लाल नेहरू की आलोचना हो रही है, कही सरदार वल्लभ भाई पटेल की तारीफ हो रही है। लेकिन कश्मीर को लेकर भारत के राष्ट्रपिता की क्या राय थी, उन्होंने कश्मीर के भारत विलय में क्या योगदान दिया इसपर चर्चा नहीं हो रही थी।
दरअसल, जिन कश्मीर मुद्दे पर जिन दो नेताओं पटेल और नेहरू की तारीफ और आलोचना कर कांग्रेस और भाजपा आपस में उलझे हुए, वे दोनों गांधी के सच्चे भक्त, सच्चे सिपाही थे।
दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर के भारत में विलय को लेकर महात्मा गांधी की भूमिका को लेकर चर्चा नहीं हो रही है। जबकि भारत में कश्मीर को लाने में अहम भूमिका महात्मा गांधी की थी, क्योंकि महात्मा गांधी के लिए दिल में सम्मान सिर्फ कश्मीर के राजा हरि सिंह में ही नहीं था, बल्कि घाटी के मुसलमानों में महात्मा बेहद लोकप्रिय थे। खुद शेख अब्दुल्ला महात्मा गांधी के जबरजस्त प्रशंसक थे, जो उस समय कश्मीर घाटी और रियासत के एकमात्र जननेता थे।
शेख अब्दुल्ला के अनुसार महात्मा गांधी उच्च आदर्श वाले लीडर थे और उनके उदेश्य स्पष्ट थे। अब्दुल्ला के अनुसार महात्मा गांधी की ईमानदारी और सच के प्रति उनके प्रेम को खुद के जीवन में उन्होंने ढाला। दरअसल, शेख अब्दुल्ला विचारों से वामपंथी थे। वे जम्मू-कश्मीर रियासत में जमींदारी सिस्टम खिलाफ लड़ रहे थे। जबकि कश्मीरी मुसलमान गांधी को गरीब समर्थक और मोहम्मद अली जिन्ना को जमींदार समर्थक मानते थे।
पाकिस्तान समर्थक अखबारों ने गांधी पर ब्रेनवॉश करने का लगाया था आरोप
पाकिस्तान समर्थक अखबारों का तर्क था कि भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय के लिए महाराजा हरि सिंह को खुद महात्मा गांधी ने राजी किया था। उन्होंने महात्मा गांधी की आलोचना करते हुए कहा था कि महात्मा गांधी के समझाने के बाद महाराजा हरि सिंह ने स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर देश की घोषणा की योजना ठप्प कर दी और भारत में विलय का फैसला लिया।
गांधी ने जैसे ही श्रीनगर छोड़ा उसके बाद ही महाराजा ने गांधी के प्रभाव में अपने प्रधानमंत्री रामचंद्र काक को हटा दिया, फिर उनक जगह जनक सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। इसके कुछ समय बाद ही भारत समर्थक मेहरचंद महाजन को रियासत का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया।
ब्रिटिश अधिकारियों को कश्मीर सेना से हटा दिया गया और जम्मू को सीधे श्रीनगर से जोड़ने का काम शुरू कर दिया गया। रावी पर एक अस्थायी पुल बनाए जाने का काम शुरू कर दिया और भारत से जम्मू कश्मीर के बीच परिवहन सुविधा करने की कोशिश शुरू हो गई। जम्मू कठुआ रोड पर भी काम शुरू हो गया।
गांधी की कश्मीरी मुसलमानों में लोकप्रियता को देख हैरान थे पाकिस्तान समर्थक
जब देश का विभाजन हो रहा था, उसी समय महात्मा गांधी को कश्मीर जाना पड़ा। यह गांधी की पहली और अंतिम कश्मीर यात्रा थी। हालांकि इससे पहले दो बार महात्मा गांधी का कश्मीर जाने की योजना बनी थी। लेकिन वो जा नहीं पाए थे। 1915 में महात्मा गांधी महाराजा हरि सिंह के आमंत्रण के बाद भी नहीं जा पाए थे।
इसके बाद एक बार 1938 में भी कश्मीर जाने की योजना बनाई गई थी। उस समय भी कश्मीर के राजा के प्रधानमंत्री का आमंत्रण महात्मा गांधी के पास आया था। लेकिन उसके बाद भी गांधी कश्मीर नहीं जा पाए। लेकिन आखिरकार उन्हें कश्मीर जाना पड़ा।
कश्मीर रियासत स्वतंत्र हो, या इसका विलय भारत और पाकिस्तान में हो इसकी विकट स्थिति पैदा हो गई थी। इन परिस्थितियों में महात्मा गांधी से आग्रह किया गया कि वे कश्मीर एक बार जाए। कश्मीरी जनता के बीच खासकर कश्मीरी मुसलमानों के बीच गांधी खासे लोकप्रिय थे। अंत में अगस्त 1947 में महात्मा गांधी कश्मीर पहुंचे।
मुजाहिद मंजिल में बीस हजार से ज्यादा कश्मीरी पहुंचे गांधी को सुनने
महात्मा गांधी 1 अगस्त को श्रीनगर पहुंचे। 4 अगस्त को श्रीनगर से जम्मू के लिए रवाना हो गए। इस बीच तीन दिनों में गांधी की कश्मीरी मुसलमानों के बीच लोकप्रियता देख मोहम्मद अली जिन्ना परेशान हो गए थे, क्योंकि जिन्ना को जमींदार समर्थक मान कश्मीरी मुसलमानों ने खासी लानत-मलानत की थी।
गांधी रावलपिंडी के रास्ते कश्मीर पहुंचे थे। डॉन जैसे अखबारों ने गांधी की यात्रा पर नजर रखी हुई थी। साथ ही यह कहना शुरू कर दिया था कि गांधी की यात्रा कश्मीर में हो रही है, अब कश्मीर का भारत में विलय से कोई रोक नहीं सकता है। पाकिस्तान समर्थक अखबार लगातार यह देख रहे थे कि गांधी की यात्रा को लेकर पूरा श्रीनगर उत्साह और आनंद में है।
नेशनल कांफ्रेंस ने गांधी का शानदार स्वागत किया था। गांधी जब नेशनल कांफ्रेंस के वर्करों को संबोधित करने मुजाहिद मंजिल पहुंचे तो वहां हजारों की संख्या में खड़ी भारी भीड़ ने ‘गांधी बाबा की जय’ नारा लगाना शुरू कर दिया। गांधी के आने की खुशी में नेशनल कांफ्रेंस के वर्कर पटाखे छोड़ रहे थे। लगभग बीस हजार की भीड़ वहां गांधी को सुनने के लिए मौजूद थी। यह स्थित पाकिस्तान के जन्म लेने (14 अगस्त 1947) से सिर्फ दो सप्ताह पहले की थी।
गांधी ने कश्मीर विवाद को दिपक्षीय वार्ता से हल करने को कहा था
आज भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर जोरदार तनाव है। बार-बार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की बात हो रही है। सच्चाई तो यह है कि कई बार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता हो चुकी है। इस मध्यस्थता की सहमति भारत और पाकिस्तान दोनों की रही।
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कारगिल युद्ध के समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने मध्यस्थता की, जिसे वाजपेयी और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ दोनों ने स्वीकार किया।
महात्मा गांधी के जीते-जीते कश्मीर पर पाकिस्तान सरकार के समर्थन से जनजातियों ने हमला कर दिया था। महात्मा गांधी सारी स्थिति को देख रहे थे, अपनी राय भी रख रहे थे। उनके सामने संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता की बात सामने आ गई। लेकिन महात्मा गांधी ने कश्मीर मामले पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का विरोध किया।
गांधी की साफ राय थी कि अंतराष्ट्रीय राजनीति के अपने स्वार्थ होते हैं और वे भारत और पाकिस्तान दोनों को नुकसान देंगे। गांधी लॉड माउंटबेटेन के उस सलाह से राजी नहीं थे जिसमें संयुक्त राष्ट्र में जाने की बात की गई थी।
25 दिसंबर 1947 को अपने भाषण में गांधी ने कहा कि उन्होंने कुछ अखबारों में पढ़ा है कि कश्मीर पर आर्बिटेशन की बात हो रही है। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत और पाकिस्तान अपने विवादों के हल के लिए तीसरी पार्टी पर निर्भर करेंगे?
हालांकि जब उनपर बाद में दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा कि अगर उनसे यह पूछा जाएगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र में भारत के जाने के फैसले को वे मंजूर करते है तो उनका जवाब होगा कि वे इस फैसले को मंजूर भी करते है और नहीं मंजूर करते है।
लुईस फिशर की किताब द लाइफ ऑफ महात्मा गांधी के अनुसार नेहरू द्वारा कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने पर महात्मा गांधी ने खेद व्यक्त किया था।
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