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प्रशांत किशोर की जीत: बिहार में एक नए विपक्ष का संकेत और बदलती राजनीति
सार
प्रशांत किशोर का उभरना केवल एक नए राजनीतिक दल का गठन नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए विकल्प की संभावनाओं का संकेत भी माना जा सकता है।
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प्रशांत किशोर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बिहार की राजनीति पिछले तीन दशकों से मुख्यतः दो व्यक्तित्वों के आसपास घूमती रही है पहला लालू प्रसाद यादव और दूसरा नीतीश कुमार। इन दोनों नेताओं ने न केवल सत्ता पर लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखा, बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा और विमर्श भी तय किए। एक ओर लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय की राजनीति के नाम पर सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हो वो बात दूसरी है कि उन्होंने सामाजिक न्याय के नाम जातिय विद्वेष को हवा दी उनके दौर में भूरा बाल साफ करो के नारे खूब सुनाई पड़े और सामाजिक न्याय के नाम केवल स्वयं का और अपने परिवार का विकास करते हुए दिखाई पड़े, तो दूसरी ओर नीतीश कुमार ने सुशासन, सड़क, बिजली, शिक्षा और आधारभूत विकास को अपनी पहचान बनाया।
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बहरहाल, समय के साथ दोनों नेताओं की राजनीतिक स्वीकार्यता और सीमाएं भी सामने आईं। अब जब लालू यादव राजनीतिक जीवन खत्म लगभग खत्म हो चुका है और नीतीश कुमार भी अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ते हुए दिखाई पड़ रहे है, तब बिहार की राजनीति एक नए नेतृत्व की खोज करती हुई प्रतीत हो रही है।
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प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में एक नया विकल्प
ऐसे समय में प्रशांत किशोर का उभरना केवल एक नए राजनीतिक दल का गठन नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए विकल्प की संभावनाओं का संकेत भी माना जा सकता है। हालिया बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में उनकी पार्टी की जीत ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है कि क्या बिहार की जनता अब पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर किसी नए नेतृत्व को अवसर देने के लिए तैयार हो रही है।
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जेडीयू की चुनौती
जनता दल (यूनाइटेड) की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नीतीश कुमार के बाद ऐसा कोई सर्वमान्य नेता दिखाई नहीं देता, जो पूरे बिहार में उनकी तरह जन स्वीकार्यता रखता हो। यही स्थिति राष्ट्रीय जनता दल के सामने भी है। तेजस्वी यादव निश्चित रूप लालू यादव के बेटे होने के कारण बिहार में एक बड़े नेता के रूप में पहचान रखते हैं लेकिन अभी भी समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा मौजूद है कि वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत की छाया से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये काफी हद तक ठीक भी है कि तेजस्वी यादव के पास अपने पिता की बनाई गई पार्टी और मुस्लिम यादव गठजोड़ के अलावा कोई विशेष राजनीतिक समझ नहीं दिखाई पड़ती है।
चुनावी रणनीतिकार से सक्रिय राजनीति का मार्ग
इसी राजनीतिक रिक्तता के बीच प्रशांत किशोर का नाम तेजी से उभर रहा है। लंबे समय तक देश के विभिन्न राज्यों में चुनावी रणनीतिकार के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने स्वयं सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। बिहार में उनकी पदयात्रा, गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद और शिक्षा, रोजगार, पलायन तथा प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दों पर लगातार अभियान चलाने से उन्हें एक गंभीर राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान मिली।
प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी छवि पारंपरिक जातीय राजनीति से अलग दिखाई देती है। वे स्वयं को विकास, शिक्षा, रोजगार और सुशासन की राजनीति का पक्षधर बताते हैं। यही कारण है कि शिक्षित युवाओं, शहरी मध्यम वर्ग और ऐसे मतदाताओं में उनकी चर्चा बढ़ी है जो बिहार में नई राजनीति की अपेक्षा रखते हैं।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव
हाल ही में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में मिली सफलता को केवल एक सीट की जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह जीत इस बात का संकेत भी है कि यदि कोई नया दल संगठित ढंग से चुनाव लड़े, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता दे और विश्वसनीय उम्मीदवार प्रस्तुत करे, तो बिहार की राजनीति में उसके लिए स्थान बन सकता है। यद्यपि केवल एक चुनाव के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकालना अतिशीघ्र होगा, फिर भी इस परिणाम ने यह अवश्य दिखाया है कि प्रशांत किशोर की राजनीति को अब बिहारी की जनता का काफी बड़ा वर्ग गंभीरता से ले रहा है।
यदि भविष्य में जनता दल (यूनाइटेड) का प्रभाव कम होता है और राष्ट्रीय जनता दल अपनी स्वीकार्यता का दायरा पर्याप्त रूप से नहीं बढ़ा पाती, तो विपक्ष के लिए एक नया राजनीतिक स्थान बन सकता है। इस स्थिति में प्रशांत किशोर उस रिक्त स्थान को भरने का प्रयास कर सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी आज बिहार में सबसे संगठित राजनीतिक दलों में से एक है। उसके पास मजबूत संगठन, संसाधन और कार्यकर्ताओं का व्यापक नेटवर्क है। ऐसे में भाजपा को चुनौती देना किसी भी विपक्षी दल के लिए आसान नहीं होगा। इसके लिए केवल भाषण या चुनावी रणनीति पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि पूरे राज्य में संगठन निर्माण, विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व और निरंतर जनसंपर्क की आवश्यकता होगी।
प्रशांत किशोर की चुनौती
प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। अब तक उनकी पहचान एक रणनीतिकार की रही है, लेकिन सफल राजनेता बनने के लिए उन्हें बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना होगा, विभिन्न सामाजिक वर्गों में संतुलन बनाना होगा और लगातार चुनावी सफलता हासिल करनी होगी। बिहार की राजनीति केवल विचारों से नहीं, बल्कि मजबूत संगठन और सामाजिक समीकरणों से भी संचालित होती है।
युवाओं की भूमिका इस पूरे परिवर्तन में निर्णायक हो सकती है। बिहार आज भी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, पलायन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यदि कोई नेता इन मुद्दों पर विश्वसनीय समाधान प्रस्तुत करता है और लगातार जनता के बीच सक्रिय रहता है, तो उसे व्यापक समर्थन मिल सकता है। प्रशांत किशोर की राजनीति का केंद्र भी यही मुद्दे रहे हैं, जिससे उन्हें नई पीढ़ी के बीच पहचान मिली है।
बिहार की राजनीति में संक्रमण काल
अंततः बिहार की राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने अपने-अपने समय में राज्य की राजनीति को नई दिशा दी। अब जनता की अपेक्षाएं बदल रही हैं। वह जातीय पहचान के साथ-साथ विकास, रोजगार, शिक्षा और सुशासन को भी प्राथमिकता देना चाहती है। इसी बदलते राजनीतिक वातावरण में प्रशांत किशोर एक संभावित विकल्प के रूप में उभरते दिखाई देते हैं।
अभी बिहार में भाजपा और जदयू के गठबंधन की सरकार चल रही भविष्य में इनका गठबंधन कब तक चलता है और जदयू की राजनीति को कौन आगे बढ़ाएगा ये भविष्य के गर्भ में है। यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि बिहार को अपना नया निर्विवाद विपक्षी नेता मिल गया है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि प्रशांत किशोर ने स्वयं को उस दौड़ में मजबूती से शामिल कर लिया है।
यदि वे अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता बनाए रखते हैं, संगठन का विस्तार करते हैं और जनता के मुद्दों पर निरंतर संघर्ष करते हैं, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में वे बिहार की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण विपक्षी चेहरों में से एक बन सकते हैं। बिहार की आगामी राजनीति संभवतः भाजपा बनाम एक नए विपक्ष की होगी, और उस नए विपक्ष का सबसे चर्चित चेहरा फिलहाल प्रशांत किशोर बनते दिखाई दे रहे हैं।