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फ्लाइंग शेम अभियान स्वीडन में आम जनता को खींच रहा अपनी ओर

Mon, 30 Sep 2019 07:43 AM IST
Priyamvada Sahay प्रियंवदा सहाय
Updated Mon, 30 Sep 2019 07:43 AM IST
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Flying Shame campaign Sweden Climate change environment Greta Thunberg
इस अभियान से जुड़ने वाले हवाई यात्रा में कटौती करते जा रहे हैं। - फोटो : Instagram

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को लेकर हाल के दिनों में स्वीडन में एक नई तरह की मुहिम शुरू हुई जो अब दुनिया भर में ज़ोर पकड़ती जा रही है। यह मुहिम है दुनिया भर में हो रहे जलवायु परिवर्तन को लेकर लोगों को सचेत करने और कार्बन उत्सर्जन में कम से कम योगदान देने को लेकर। दुनिया की सबसे युवा क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग (जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर में मुहिम छेड़ने वाली कार्यकर्ता ) के स्वदेश स्वीडन में फ्लाइंग शेम नाम से एक नए तरह का अभियान शुरू हो चुका है।

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इस अभियान का हिस्सा आम आदमी के साथ-साथ कॉरपोरेट जगत भी बनते जा रहे हैं। इस अभियान से जुड़ने वाले हवाई यात्रा में कटौती करते जा रहे हैं। ताकि हवाई यात्राओं की वजह से हो रहे कार्बन उत्सर्जन में कटौती हो सके। यहां कम दूरी वाली छोटी यात्राओं के लिए हवाई जहाज़ की जगह रेल यात्रा पर अब ज्यादा बल दिया जाने लगा है। जहां तक संभव हो, रेल यात्रा के जरिए गंतव्य तक पहुंचने के लिए कंपनियां अपने कर्मचारियों को प्रोत्साहित कर रही हैं।
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जबकि नेता, अभिनेता और मंत्री भी रेल यात्रा को पहली वरीयता देने की कोशिश कर रहे हैं। हाल मे हीं ग्रेटा थनबर्ग ने स्वीडन से अमेरिका तक अपनी यात्रा के लिए जल मार्ग को चुना और वे दुनिया भर में मिसाल बन गई। उन्होंने अपनी इस लंबी यात्रा के लिए उस सवारी को चुना जो पर्यावरण के लिए ख़तरा नहीं है। जबकि इससे पहले स्वीडन की कई नामीगिरामी हस्तियाँ भी पर्यावरण के प्रति अपनी संवेदनशीलता ज़ाहिर करते हुए हवाई सफ़र पर लगाम लगा चुकी हैं।

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ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में हवाई उड़ानों का योगदान दो फ़ीसदी से ज्यादा का है। - फोटो : Youtube Grab

चूंकि स्वीडिश हवाई सफ़र करने में ऊपरी पायदान पर हैं, उन्होंने पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी को समझते हुए अब इस ओर गंभीरता से ध्यान देना शुरू कर दिया है। इसलिए बदलते ट्रेंड के साथ यहां की कंपनियां अपनी देश-विदेश की शाखाओं से बैठक करने और ज़रूरी काम निपटाने के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग का सहारा ले रही हैं।

यहां की कई बड़ी कंपनियों ने यह साफ कर दिया है कि जबतक ज़रूरत बहुत ज्यादा नहीं हो कर्मचारियों को आधिकारिक कामों के लिए हवाई सफ़र करने की ज़रूरत नहीं है। कम दूरी वाले शहरों में जाने के लिए रेल को पहली प्राथमिकता दी जाए। हाईस्पीड ट्रेन से सफ़र कर देश के अंदर यात्रा को प्रोत्साहित किया जाए। हवाई यात्रा की ज़रूरत केवल दूर के सफ़र के लिए होना चाहिए। ताकि उड्डयन क्षेत्र से निकलने वाले हानिकारक गैस की मात्रा को नियंत्रित किया ज़ा सके।

आख़िर क्या संबंध है हवाई उड़ान और कार्बन डाई ऑक्साईड के बीच
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र से होने वाला कार्बन उत्सर्जन पर्यावरण के लिए बड़ा ख़तरा बन चुकी है। इसलिए हवाई यात्राओं को नियंत्रित करना ज़रूरी है। कई अध्ययनों में यह दावा किया गया है कि ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में हवाई उड़ानों का योगदान दो फ़ीसदी से ज्यादा का है। यानी हवाई इंधन की वजह से दुनिया भर में सलाना 860 मिलियन मिट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो रहा है।

जबकि हवाई उड़ानों की संख्या बढ़ने के कारण दिनोंदिन इसमें इज़ाफ़ा होता ही जा रहा है। पिछले दस सालों में हवाई जहाज़ से सफ़र करने वालों की संख्या भी दोगुनी हो चुकी है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का अनुमान है कि 2037 तक हवाई सफ़र करने वाले यात्रियों की संख्या क़रीब सवा आठ अरब हो जाएगी। अब इतनी बड़ी आबादी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कार्बन उत्सर्जन भी बड़े पैमाने पर होगा। इसलिए यह ज़रूरी है कि हवाई सफ़र को नियंत्रित कर वैकल्पिक माध्यमों पर ध्यान दिया जाए।

आपको बता दूं कि यूरोप में स्वीडिश लोग सबसे ज्यादा सफ़र करते हैं। इसके पीछे कारण उनके दफ़्तर के कामकाज के अलावा घूमने का शौक़ीन होना भी है। अब जबसे हवाई सफ़र को हतोत्साहित करने की मुहिम शुरू हुई है, स्वीडन के अंदर हवाई यात्रा (डोमेस्टिक फ़्लाइट) करने वालों की संख्या में गिरावट आई है। वे इसकी जगह रेल यात्रा को अपना रहे हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
  

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