2021 के चुनावों की स्मृति: यह आपकी जीत भी होती तो बहुत सस्ती होती, लेकिन इस हार की कीमत इतिहास कभी नहीं भूलेगा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इस लेख में प्रवेश से पहले देश की माननीय अदालतों की टिप्पणी देश के जनमानस में अंकित है. ताकि सनद् रहे कि देश अपने लंबे चुनावी इतिहास में 2021 को कभी नहीं भूलेगा।
"जब चुनावी रैलियां हो रही थीं, तब आप दूसरे ग्रह पर थे क्या? बिना सोशल डिस्टेंसिंग के चुनावी रैलियां होती रहीं. चुनाव आयोग के अफसरों पर तो संभवत: हत्या का मुकदमा चलना चाहिए."
विज्ञापन
मद्रास हाईकोर्ट
"सुनवाई के दौरान जज कुछ कहते हैं तो वह लोगों के बड़े हित के लिए होता है. इसे सही भावना से देखना चाहिए. उन्हें भी तनाव होता है. हम अपने हाईकोर्ट्स का मनोबल गिराना नहीं चाहते हैं. ये हमारे लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है."
विज्ञापन विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
हाईकोर्ट की टिप्पणी पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को
भारत में चल रही शोक लहर के बीच, अकाल और अपघाती मृत्यु का शिकार हुए लोगों को श्रद्धांजलि। सूने और उदासी में डूबे घरों में बदहवास, शोकाकुल परिजनों को सांत्वना। आइए इस दुख की घड़ी में, एक मलाल के साथ इस टीप को आगे बढ़ाते हैं-
देश की स्मृति में 2021 के चुनाव हमेशा ही याद किए जाएंगे, अफसोस के साथ। यह चुनाव जनता का दम घोंट गए। इस चुनाव की जीत बहुत सस्ती और हार की कीमत तो इतिहास से कभी विस्मृत नहीं होगी। यह चुनाव मौत बांटती महामारी की छाया में संपन्न हुए। लोकतंत्र में चुनावी उत्सवों की ऐसी संपन्नता, तंत्र के लोक को बेहद विपन्न कर गई।
इन चुनावों से चुनाव आयोग जैसी गौरवशाली संस्था के हिस्से बदनामी और तल्खियां हाथ लगीं। इन चुनावों ने मृत्यु फैलाती संक्रामक रैलियां दीं, निर्ल्लज प्रचार अभियान दिए और पंचायत चुनाव के जरिए 100 से ज्यादा कर्मचारी की बलि ले ली। यह चुनाव इस रूप में कुख्यात रहेंगे कि इस देश में चुनाव महामारी से अस्पतालों में बिछती लाशों के बीच हो सकते हैं और उनके परिणाम सड़कों पर जलती चिताओं के बीच आ सकते हैं।
कौन भूलेगा भला ऐसे चुनाव और उसके परिणाम, जब महामारी से ग्रसित लोगों की संख्या 4 लाख से पार जा रही हो और मौत का सरकारी आंकड़ा 3000 प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ रहा हो। यह जनता एक शोक लहर में, निराशा और मायूसी के अंधड़ के बीच, चुनावी रैलियों, कुंभ की भीड़ का शिकार हो गई। चुनाव परिणाम के दौरान मतदान केंद्रों पर उमड़ी भीड़, जीत के जश्न की शर्मसार करती तस्वीरें, दुख में डूबी जनता के अंतर्मन पर विद्रूप छाप छोड़ गई।
अफसोस है कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। 2021 के चुनाव लंबे समय तक चुनाव आयोग और सरकार की गलतियों, भूलों का पीछा करते रहेंगे।
एक ऐसे समय में जब देश घातक महामारी से जूझ रहा था और बहुत कुछ थामा जा सकता था, जिम्मेदारों की महत्वाकांक्षा एक राज्य की सत्ता के लिए बेचैन और छटपटाती रही। चुनावों को रोके जाने या स्थगित किए जाने की एक आवाजें नक्कारखाने की तूती बन कर रह गईं। नेता रैलियों में डूबे रहे और देश की जनता राजधानी दिल्ली सहित, ऑक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर, अस्पतालों में बिस्तरों की खोज में भटकती मरती रही जबकि यह शर्मनाक सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
आज भी शहर के शहर दहशत में डूबे हैं, नेता, विधायक, सांसद जनता के बीच से गायब हैं। गांव और कस्बे डर से मर रहे हैं, कई बदलहाली में मौत का इंतजार कर रहे हैं, किसी को व्यवस्था मार रही है तो रहे-सहे आग के हवाले हो हो रहे हैं, सिस्टम निरर्थक साबित हो रहा है
दरअसल, साल 2020 में जब भारत में कोरोना ने प्रवेश लिया तब से देश में स्वास्थ्य ढांचे, अस्पतालों, डॉक्टरों, चिकित्सा उपकरणों के हालात को लेकर मीडिया से लेकर विशेषज्ञ चिंता जताते रहे, लेकिन सरकार योजना नहीं बना सकी। बिना योजना, और प्रबंधन के औचक रूप से लगे लॉकडाउन ने देश में लाखों मजदूरों के लिए प्रतिपलायन की समस्या पैदा कर दी।
लॉकडाउन भी महामारी से निपटने की तैयारी का बहाना ही बना रहा। अनगिनत मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल, साइकिल से घर गए, कई बीच में ही भूख प्यास से मर गए। कई ट्रेन हादसे में पटरियों पर ही खामोशी की नींद सो गए, कइयों का ट्रकों, ट्रालों और टैम्पों में जिंदगी का आखिरी सफर रहा। ऊपर से भीषण रोजगार का संकट जरूर खड़ा हुआ।
20 लाख करोड़ का पैकेज कहां और किसको बंटा कोई नहीं जानता। फंड से कितने हॉस्पिटल बने? कितने वेंटिलेटर्स, बेड, दवाइयां, इंजेक्शन, ऑक्सीजन सिलेंडर और बुनियादी सुविधाएं हासिल की गई उसका कोई हिसाब कहीं नहीं मिला। ट्रेनों के डिब्बों में बनाए गए हॉस्पिटल कहां खड़े हैं और क्यों खड़े हैं यह भी अज्ञात ही है? यदि कुछ ज्ञात होता तो आज श्मशानों में रोजानों की हजारों चिताएं नहीं जलतीं, सोशल मीडिया से लेकर तमाम दूसरी जगहें लोग हॉस्पिटल, बिस्तरों और ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए बदहाल भटकते नहीं दिखाई देते।
जब विशेषज्ञ महामारी की दूसरी लहर के लिए चेताते चिल्लाते रहे, सरकार ना अस्पतालों को तैयार कर पाई, ना वेंटिलेटर्स का इंतजाम कर पाई, ना वैक्सीन के वितरण को लेकर कोई योजना बना पाई, ना मजदूरों के रोजगार की चिंता रही, रही-सही कसर बिहार चुनाव, कुंभ के आयोजन की खुली छूट और बंगाल चुनावों ने पूरी कर दी।
अफसोस है कि इस दौर में एक संबोधन ऐसा नहीं मिला जो संबल देता हो, एक आश्वासन ऐसा नहीं रहा, जो मृत्यु की माला जप रही सांसों को थाम ले? ऐसा संबोधन जो उम्मीद की रोशनी दिखा सके। ऐसा संबोधन जो भरोसा दे। ऐसा संबोधन जो आश्वस्त करे कि जितना बिगड़ना था बिगड़ गया, पर अब सब ठीक होगा। जनता के हिस्से संवादहीनता है और मीडिया के हिस्से संक्रमण और मृत्यु के आंकड़े।
कुंभ बीत चुका और चुनाव हो चुके 5 राज्यों में सरकारें भी बन जाएंगी, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का ये तांडव कब थमेगा कोई नहीं जानता। हमारे पास भूलने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन ऑक्सीजन, दवाइयों व अस्पताल में एक अदद बिस्तर के लिए भटकती शोकाकुल जनता के मन में केवल दहशत है और बीते दिनों की दुखद स्मृतियां जो महामारी के जाने के बाद भी उनका पीछा करती रहेंगी।
इतिहास भी इन चुनावों को याद करता रहेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।