खेती: कीटनाशकों का नया विकल्प है सौर ऊर्जा, तकनीक भी साबित हो रही है पर्यावरण अनुकूल
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कीटनाशकों के बदले सोलर लाइट ट्रैप तकनीक का इस्तेमाल कम लागत वाला और नुकसान रहित है। यह पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल भी है।
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विस्तार
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में धान की पैदावार काफी अच्छी होती है। यहां का किसान धान में लगने वाले कीड़ों से परेशान था। जिले के कटंगझरी ग्राम के वीरेंद्र धांद्रे एवं अन्य किसान कृषि विभाग से मिले सौर ऊर्जा आधारित सोलर लाइट ट्रैप लगाया और अब बगैर किसी रसायन के उनकी फसल निरापद है।
घटती जोत और बढ़ती आबादी ने अधिक फसल उत्पादन का दबाव बढ़ा दिया है। खेतों में नैसर्गिक रूप से कीट-पतंगे होते हैं, जिनमें से कई खेती और धरती के लिए जरूरी होते हैं। फसल को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए छिड़की जाने वाली रासायनिक दवाएं न केवल फसलों के पोषक तत्वों की दुश्मन हैं, बल्कि प्रकृति-मित्र कीट-पतंगों को भी नष्ट कर देती हैं। लेकिन अब खेतों में सूरज की चमक से चलने वाले प्रकाश-उत्पादक बल्ब बगैर किसी नुकसान के मामूली व्यय में हानिकारक कीटों का नाश कर देते हैं।
तेजी से हो रहे मौसमी बदलाव और बढ़ते तापमान ने हर फसल चक्र के दौरान फसलों पर अलग-अलग कीटों के प्रकोप में भी बढ़ोतरी कर दी है। हर साल सैकड़ों किसान जहरीली दवाओं के बेतहाशा इस्तेमाल के चलते मौत या दमे-कैंसर जैसी बीमारियों के शिकार होते हैं। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रुपये के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं। इस बर्बादी को रोकने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा। वर्ष 1950 में इसकी खपत 2,000 टन थी, लेकिन आज कोई 90 हजार टन जहरीली दवाएं देश के पर्यावरण में घुल-मिल रही हैं। इसका कोई एक तिहाई हिस्सा विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गत छिड़का जा रहा है। वर्ष 1960-61 में केवल 6.4 लाख हेक्टेयर खेत में कीटनाशकों का छिड़काव होता था, लेकिन आज अनुमानतः करीब डेढ़ करोड़ हेक्टेयर में इनका छिड़काव होता है।
ये कीटनाशक जाने-अनजाने में पानी, मिट्टी, हवा, जन-स्वास्थ्य और जैव विविधता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। कई कीटनाशकों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई है। इस्तेमाल की जा रही दवाओं का महज 10 से 15 फीसदी ही असरकारक होता है, शेष जहर मिट्टी, भूगर्भ जल, नदी-नालों का हिस्सा बन जाता है। कीट नियंत्रण के लिए सोलर लाइट ट्रैप तकनीक का इस्तेमाल कम लागत वाला और नुकसान रहित है। सौर ऊर्जा संचालित कीट जाल पूरी तरह से स्वचालित, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल है, जिसमें अल्ट्रावायलेट लाइट लगी है। दिन में सूर्य के प्रकाश में सोलर पैनल द्वारा ऊर्जा एकत्रित होती है और अंधेरा होने पर सेंसर के कारण यंत्र में लाइट चालू हो जाती है, जो कीटों को आकर्षित करती है। ट्रैप में कीटों के आने के बाद कीट नीचे लगी जाली में फंस जाते हैं। इस प्रकार खेत में किसानों को तना छेदक तितली और अन्य कीटों से फसलों को बचाने में मदद मिलती है। यह अत्याधुनिक उपकरण कीट और कीड़ों के पैटर्न की पहचान करता है और उसके अनुसार कीट प्रबंधन और नियंत्रण योजना विकसित करता है। इसकी पकड़ में सभी उड़ने वाले निम्फ और वयस्क कीड़े आदि आते हैं।
इसकी तकनीक बेहद सामान्य-सी है, जिसका कोई खास रखरखाव भी नहीं होता। इसमें स्वचालित सौर लाइट ट्रैप में 10 वाट का सोलर लाइट पैनल है, जो बैटरी को चार्ज करता है। इसकी खासियत है कि यह मशीन केवल शत्रु कीटों को निशाना बनाती है। ऐसे कीट शाम 6 बजे से रात 10 बजे के बीच अधिक सक्रिय होते हैं। सौर ऊर्जा से संचालित यंत्र की लाइट अंधेरा होते ही शुरू हो जाती है और सुबह उजाला होते ही बंद। खेत में हर पौधे की लंबाई अलग-अलग होती है, इसलिए इस उपकरण को इस तरह ऊंचाई पर लगाया जाता है कि औसत ऊंचाई पर बैठे कीट इसकी तरफ आकर्षित हो जाएं। इस साधारण-सी तकनीक के गांव तक पहुंचने में एक ही व्यवधान है-ताकतवर अंतरराष्ट्रीय कीटनाशक लॉबी, जिसका अरबों का उत्पाद इसके चलते बिकना बंद हो सकता है। इसे ब्लॉक या जिले के कृषि विभाग कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र से लिया जा सकता है। इस पर सरकार कुछ सब्सिडी भी देती है, लेकिन अभी इसका व्यापक स्तर पर प्रचार बहुत कम है।