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26 जनवरी 2021: जिम्मेदार लोगों को माफ नहीं करेगी तारीख

Thu, 28 Jan 2021 11:28 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Thu, 28 Jan 2021 11:28 AM IST
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किसानों ने लाल किले पर फहराया अपना झंडा - फोटो : एएनआई

26 जनवरी के दिन जब एक तरफ देश की सेनाएं राजधानी के राजपथ पर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही थीं, तब देश के ज्यादातर टेलीविजन चैनलों का ध्यान राजपथ की इस गौरवमयी झांकी को अपने दर्शकों तक पहुंचाने में था। ठीक उसी वक्त मीडिया के कुछ अन्य माध्यम दिल्ली की सीमाओं पर जारी हंगामे को अपने-अपने तरीके से दिखाने में व्यस्त थे। दुनिया के सामने भारत को शर्मसार करने वाले इन कोलाहली दृश्यों से गुजरते वक्त करीब दो महीने पहले का वाकया लगातार याद आता रहा..

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29 नवंबर की रात करीब साढ़े दस बजे का समय था...एक दुखद पारिवारिक आयोजन से दिल्ली के छतरपुर इलाके से परिवार समेत एक टैक्सी के जरिए इन पंक्तियों का लेखक लौट रहा था..शायद पत्रकारिता के जरिए मिला दुर्गुण है या फिर गंवईं मन, जब भी टैक्सी या ऑटो की यात्रा होती है, ड्राइवर से बात करना शुरू हो जाता है।
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ड्राइवर सरदार जी थे और उनसे परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। ठीक उनके बगल में बैठकर घर-परिवार की बातें होने लगीं। सरदार जी महज आठ दिन पहले पंजाब के रोपड़ जिला स्थित अपने गांव से दिल्ली में टैक्सी स्टैंड की नौकरी पर लौटे थे। आठ महीने के लॉकडाउन के दौरान जो कठिन वक्त गुजरा और उसे गुजारते वक्त कितने पापड़ बेलने पड़े, उस दौरान सारी जमा-पूंजी खत्म हो जाने की दारूण कथा भी उन्होंने सुनाई...पंजाब के बारे में उसकी सीमाओं से बाहर एक ही धारणा है, वह कि पंजाब के लोग बहुत समृद्ध हैं...तकरीबन सबके पास सोना उगलने वाले खेत हैं।
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शायद अंतश्चेतना में यही धारणा बैठी हुई है, लिहाजा ड्राइवर से एक सवाल पूछ लिया, ‘कोई बात नहीं, घर में खेती तो होगी ही?’  

‘ना जी, हम तो दलित हैं..हमारे पास घर के अलावा एक इंच भी जमीन नहीं है। ’ ड्राइवर का जवाब था..इसके साथ ही अपने जीवन संघर्ष और अपनी आर्थिक बेबसी को भी उन्होंने उजागर कर दिया..
बहरहाल बात में से ही किसान आंदोलन की बात निकल पड़ी। इसके बाद चौंकने की बारी मेरी थी...

अब तक अपनी आर्थिक बदहाली, अपने संघर्ष की दारूण कथा सुनाते रहे सरदार जी का स्वर बदल गया..

पिछली सीट पर मेरा परिवार था, शायद इस वजह से केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को पंजाबी अंदाज में गालियां देने से रूक गए, लेकिन यह कहने से खुद को रोक नहीं पाए।
‘हम पंजाबी हैं, इंदिरा को सिखा दिया तो मोदी क्या है...उसे भी सिखा देंगे..’

इसके बाद तो वे केंद्र सरकार को भला-बुरा कहने लगे। उनसे जब पूछा कि जब आपके पास खेत नहीं है, गांव में पीछे रह रहे परिवार को मजदूरी ही करनी है और शहर में आपको दूसरों की टैक्सी ही चलानी है तो फिर आप मोदी के खिलाफ इतनी आग क्यों उगल रहे हैं?

इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था..

बहरहाल यह बात आई-गई हो गई..लेकिन जब लालकिले की चारदीवारी उत्पाती किसानों ने पार कर ली, उसकी परछत्ती को फांद गए, किसी ने उस जगह अपना झंडा फहरा दिया, जिस जगह झंडा फहराने की पारंपरिक अनुमति भारत का वह लोकतंत्र अपने सर्वोच्च नेता को देता है, जिसकी महानता की बलैया लेते हम नहीं थकते। तब दो महीने पुरानी यह घटना याद आ गई।

सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के पास खेती के लिए एक इंच जमीन नहीं है, जिसका परिवार मजदूरी पर ही गुजर-बसर करने को मजबूर है। वह भी केंद्र सरकार और उसके अगुआ के खिलाफ इस तरह आग उगल सकता है तो समझा जा सकता है कि किसान आंदोलन को लेकर पंजाब में कैसा माहौल बनाया गया और उसके लिए लोगों को किस तरह भड़काया गया। साल 2002 में पहली बार प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘जैसा जीवन जिया’ में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने लिखा है,

‘”कैसे लोगों के दिलों के जज्बातों को उभार कर उनका समर्थन पाया जाए, यही राजनीति होकर रह गई है। इसके लिए कोई मजहब का नारा लगा रहा है तो कोई जाति का।...खुल्लमखुल्ला ये बातें की जा रही हैं। इसी को लोग अपनी बड़ी भारी उपलब्धि मानते हैं।”

कहना न होगा कि इसे लिखे जाने के करीब दो दशक बाद यह प्रवृत्ति और आगे बढ़ गई है। अब तो सोशल मीडिया है, जहां किसी संपादन की जरूरत नहीं है। इसके जरिए बिना सिरपैर की बातों को और फैलाया जा रहा है और इस तरह जज्बात को खूब उभारा जा रहा है।

इसी प्रवृत्ति के तहत किसान आंदोलन को पंजाबी और सिख स्वाभिमान से जोड़ दिया गया। क्योंकि इसके बिना बात बननी नहीं थी। आंकड़ों को जानने वाले जानते हैं कि आनुपातिक रूप से पंजाब सबसे ज्यादा दलित जनसंख्या की हिस्सेदारी वाला राज्य है। यहां करीब 32 फीसद दलित हैं और पंजाब की खेती में उनकी हिस्सेदारी महज तीन-चार फीसद है।

सीमा पार के रणनीतिकर्ताओं ने जानबूझकर किसानों की ट्रैक्टर रैली के लिए उस 26 जनवरी को चुना...

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लाल किले पर प्रदर्शनकारियों ने फहराया अपना ध्वज - फोटो : पीटीआई

पंजाब की करीब 80 फीसद खेती सिर्फ चार-पांच प्रतिशत आबादी के पास है। अव्वल तो नए कानूनों से उन्हें प्रभावित होना था। उसके खिलाफ केंद्र सरकार की लानत-मलामत उन्हें करनी थी। ऐसे में इस आंदोलन का सफल होना शुरूआत के पहले ही नामुमकिन हो जाता। इसलिए बड़ी चतुराई से इसके साथ पंजाबी स्वाभिमान को जोड़ा गया। भारतीय इतिहास की सबसे बहादुर कौम सिख के स्वाभिमान को जोड़ा गया। पंजाब को ऐसे जगाया गया, जैसे उसका कौमी अस्तित्व खतरे में है। फिर जो हुआ, उसे 26 जनवरी को पूरी दुनिया ने देखा।

खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक इस आग को बढ़ाने में सीमा पार पाकिस्तान का बड़ा हाथ है। इस आग को भड़काने में परोक्ष रूप से चीन का हाथ भी माना जा रहा है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान से चल रहे 300 से ज्यादा ऐसे ट्वीटर हैंडलों की पहचान की गई है, जो इस आग को भड़काने और किसानों के भारत सरकार विरोधी जज्बात को उभारने की कोशिश में अहर्निश जुड़े रहे।

सीमा पार के रणनीतिकर्ताओं ने जानबूझकर किसानों की ट्रैक्टर रैली के लिए उस 26 जनवरी को चुना, जिस दिन देश अपनी आन-बान और शान का राजधानी के राजपथ पर प्रदर्शन करता है। इस आग को भड़काने में कतिपय भारतीय कथित किसान नेताओं का भी हाथ रहा। जिनमें से कुछ तो ऐसे हैं, जिनके हालिया अतीत में हर आंदोलन नाकाम हुए हैं। इन किसानों की अगुआई वे लोग भी करते रहे, जो विदेशों से तमाम तरह की मोटी कमाई करते रहे हैं।

लेकिन नए कानूनों के मुताबिक अब बाहर से उनके पास भारत की गरीबी खत्म करने, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि जैसे शिगूफेबाजियों के लिए पैसे आने बंद हो गए हैं। इसके बाद वे सतत आंदोलनकारी बने हुए हैं। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ खासकर पंजाब के किसानों के उठ खड़े होने के बाद उन्हें नेतृत्व देने का मौका मिल गया और इस बहती गंगा में उन्होंने हाथ धोने की कोशिश की।

लाल किले के पास दिल्ली पुलिस के जवानों को जिस तरह आंदोलनकारियों ने निशाना बनाया, उसे विजुअल सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। देश के इतिहास की गर्वीली तारीख को पुलिस वालों ने गोलियों की बौछार करने की बजाय बीस फीट की खाई में कूद कर खुद की टांग तुड़ाना ज्यादा उचित समझा, बनिस्बत लोकतंत्र के गर्वीले दिन को रक्तरंजित करना। इसलिए उनके धैर्य की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। ऐसा नहीं कि पुलिस बल में बदमिजाज लोग नहीं होंगे।

भारतीय पुलिस सिस्टम जैसा है, उसमें ऐसे लोगों की कमी नहीं है। लेकिन वर्दी का प्रताप कहें या उनकी कर्तव्यनिष्ठा, देश के आन-बान-शान की अहमियत वे कम से कम उत्पाती किसानों की तुलना में ज्यादा समझते हैं। इसलिए खुद घायल होना स्वीकार किया। हालांकि उसके नेतृत्व की इससे जवाबदेही कम नहीं हो जाती।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी की व्यवस्था संभालने वाली पुलिस के अगुआ इसका अनुमान नहीं लगा सके कि भीड़ कैसी होगी, उसके हिसाब से माकूल इंतजाम कर सकते थे। उन्होंने एहतियातन कार्रवाई भी नहीं की। दुखद यह भी रहा कि दिल्ली की दोनों सरकारों ने भी इस उपद्रव का अनुमान नहीं लगाया। वैसे भी एक सरकार तो इस रैली का खुलेआम समर्थन ही कर रही थी।  
किसानों के उत्पाती होने के लिए किसान संगठनों के नेता भी जिम्मेदार हैं।

वे चाहते तो देश के गर्वीले दिन प्रतीकात्मक रैली निकाल सकते थे। दुर्योगवश इस मामले की सुनवाई करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस उत्पात की आशंका पर ध्यान नहीं दिया, जबकि सरकार अपने हलफनामे में कहती रही कि इस आंदोलन में भारत को तोड़ने वाले तत्व भी शामिल हो चुके हैं। इसके लिए जिम्मेदार वे विपक्षी दल भी हैं, जिनके नेताओं ने ट्रैक्टर रैली को गणतंत्र का वास्तविक रैली करार दिया था। उनमें से ज्यादातर सत्ता में रह चुके हैं और क्या उन्हें अनुभव नहीं है कि ऐसी भीड़ आती है तो उसका चरित्र कैसा होता है और वह क्या करती है? हिंसा की भर्त्सनाभर करने से वे भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।

आखिर इतना उत्पात क्यों हुआ, इसका जवाब उस ड्राइवर की जानकारी में ही छुपा है। उस ड्राइवर ने कहा था, ‘लोकतंत्र है और मोदी की सरकार उन्हें गोली नहीं मार सकती।’

यानी अरसे से कथित आंदोलनकारियों को पता था कि लोकतांत्रिक सत्ता उन पर गोली नहीं बरसा सकती। इस सोच ने भी मनमानी को बढ़ावा दिया। लेकिन इस शर्मसार करने वाली घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को इतिहास माफ नहीं करेगा। चाहे वे किसी भी दल में हों, समूह में हों, राजनीति में हों, अधिकारी हों। जब भी इस आंदोलन की भविष्य में चर्चा होगी, असल किसान खुद को ठगा हुआ ही महसूस करेगा।   

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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