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धीमी धीमी चाल ये भूचाल न हो जाए...

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Sun, 06 Dec 2020 08:04 PM IST
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farmers protest narendra singh tomar nda congress bharat bandh 8 dec
किसान आंदोलन - फोटो : amar ujala

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के

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अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के

पूछती है झोपड़ी और पूछते हैं खेत सब

कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गांव के

बिन लड़े मिलता नहीं कुछ ये सचाई जानकर

अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गांव के

उत्तराखंड के मशहूर कवि गीतकार बल्ली सिंह चीमा की ये गजल इन दिनों दिल्ली की सीमाओं पर लगे किसानों के जमावड़े देखकर अनायास ही जुबान पर आ जाती हैं। कुछ इसी तरह जब आज से करीब 32 साल पहले मेरठ के सीडीए मैदान में भारतीय किसान यूनियन के नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में किसानों का सैलाब उमड़ा था तब जाने माने कवि हरिओम पंवार ने किसानों के मंच पर जाकर ये जोशीली पंक्तियां सुनाईं थीं...

धीमी धीमी चाल ये भूचाल न हो जाए

हाथ की कलम कहीं कुदाल न हो जाए

पंवार की ये कविता सुनकर न सिर्फ किसान आंदोलन जोश से भर गया था, बल्कि वास्तव में किसान आंदोलन की धीमी धीमी चाल सियासी भूचाल में बदल गई थी और 1984 में लोकसभा चुनावों में 415 सीटों के रिकार्ड बहुमत से बनी तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को 1989 के चुनावों में उस जनता दल के हाथों पराजित होना पड़ा था जिसका गठन एक साल पहले हुआ और जिसके नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस से ही बगावत करके निकले थे।
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इन दिनों जब नवंबर की ठंड में दिल्ली हरियाणा सीमा पर स्थित सिंघु बार्डर और टीकरी बार्डर पर पंजाब हरियाणा और कुछ अन्य राज्यों से आए किसान केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली कूच के एलान के साथ वहां आ डटे हैं, तो मेरे जैसे तमाम उन पत्रकारों, जिन्होंने 1980-90 के दौरान हुए उन किसान आंदोलनों की रिपोर्टिंग की थी जो उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, ओडिशा, मध्यप्रदेश आदि राज्यों से होते हुए दिल्ली तक पहुंचे थे, को वैसा ही मंजर दोहराता नजर आ रहा है।
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सरकार कुछ प्रावधानों को लेकर नरम रुख अपना सकती है

हालाकि लगातार कई दौर की सरकार के साथ बातचीत भी जारी है और कृषि मंत्री नरेंद्र सिहं तोमर के बयानों से संकेत मिलता है कि सरकार कुछ प्रावधानों को लेकर नरम रुख अपना सकती है। लेकिन बार बार यह दोहराने कि कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जारी रहेगा के बावजूद सरकार उसे कानूनी रूप देने का कोई संकेत नहीं दे रही है। उधर किसान कृषि सुधार के तीनों कानूनों को खत्म किए जाने से कम पर राजी नहीं हो रहे हैं। अपने आंदोलन को धार देते हुए किसानों ने पांच दिसंबर को देश में कई जगह पुतले फूंके और प्रदर्शन किए।

अब आठ दिसंबर को उन्होंने भारत बंद का एलान किया है, जिसे लगभग पूरे विपक्ष ने समर्थन दिया है।किसानों के समर्थन में न सिर्फ पंजाब हरियाणा के किसान बल्कि कई जानेमाने कलाकार, खिलाड़ी और पूर्व खिलाड़ी, पूर्व सैनिक और कई क्षेत्रों के जाने माने लोग आगे आ रहे हैं। कभी एनडीए के शिल्पकार रहे और भाजपा के सबसे पुराने सहयोगियों में एक शिरोमणि अकाली दल के शिखर पुरुष प्रकाश सिंह बादल और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा ने अपने पद्म विभूषण और पद्म भूषण सम्मान लौटा दिए हैं। कुछ इसी तरह ओलंपियन विजेंद्र सिंह समेत कई पूर्व खिलाड़ियों और पूर्व ओलंपियन्स ने अपने राष्ट्रीय सम्मान लौटाने का एलान किया है। कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया अमेरिका सहित कई देशों में किसानों के समर्थन में अनिवासी भारतीय भी खुलकर सामने आ गए हैं।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब देश के किसान आंदोलित हैं। भले ही सत्ताधारी दल और सरकार समर्थक लोग शुरुआत में इस आंदोलन को महज पंजाब और हरियाणा का आंदोलन बताते रहे, कुछ लोगों द्वारा और मीडिया व सोशल मीडिया पर इसके पीछे खालिस्तान का कोण भी तलाशा जाता रहा ।लेकिन हकीकत ये है कि भले ही दिल्ली सीमा पर आ डटे किसानों में नब्बे फीसदी पंजाब और हरियाणा के हों लेकिन ये किसान पूरे देश के किसान असंतोष का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसीलिए इनमें शामिल किसान संगठनों में कई एसे संगठनों के किसान नेता भी आए हैं जिनका ताल्लुक उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों से भी है।

किसानों के साथ केंद्र सरकार की वार्ता के कई दौर हो चुके हैं

किसानों के साथ केंद्र सरकार की वार्ता के कई दौर हो चुके हैं, लेकिन अभी तक उसका कोई नतीजा नहीं निकला है। किसान अपनी मांगों से टस से मस होने को तैयार नहीं हैं और उधर सरकार उन्हें समिति बनाने का झुनझुना देकर मामले को लटकाना चाहती है। किसान संगठनों का कहना है कि वह अपना आंदोलन तब तक खत्म नहीं करेंगे जब तक कि केंद्र सरकार किसानों के नाम पर बनाए गए तीन कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती।लेकिन सरकार का कहना है कि ये तीनों कानून लंबे समय से लंबित कृषि सुधारों को अमल में लाने के लिए हैं और इनका

विरोध करने वाले किसान भ्रम में हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में देव दीपावली के अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि सरकार किसानों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और उन्हें भ्रमित करके आंदोलन किया जा रहा है। यही बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर समेत लगभग सरकार के हर मंत्री ने कही है। यानी सरकार यह मान रही है कि उसके द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानून पूरी तरह किसानों के हित में हैं और उनमें कोई बदलाव मुमकिन नहीं है। लेकिन किसान अपनी मांगों से टस से मस होने को राजी नहीं हैं।

दिलचस्प है कि इस किसान आंदोलन की शुरुआत पंजाब से हुई जब कई दिनों तक आंदोलनकारी किसान रेल की पटरियों पर बैठकर अपना विरोध जताते रहे, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे अहमियत नहीं दी और सरकार ने किसानों से बातचीत करने की कोई सार्थकर पहल नहीं की।बातचीत की कुछ खानापूरी जरूर की गई लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। इसके बाद किसानों ने 26 नवंबर से दिल्ली में धरना देने का एलान कर दिया, जिसे भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया।

सरकार और उसके पूरे तंत्र को भरोसा था कि किसानों को पंजाब के बाहर निकलने ही नहीं दिया जाएगा क्योंकि पंजाब से दिल्ली का रास्ता हरियाणा होकर आता है और हरियाणा में भाजपा की सरकार है जिसके मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एलान किया कि किसानों को हरियाणा से नहीं गुजरने दिया जाएगा। व्यापक पुलिस बंदोबस्त किए गए। हाईवे पर बेरीकेडिंग के साथ साथ गड्ढ़े तक खोद दिए गए। लेकिन किसानों का जूनून एसा था कि वो सारे बंदोबस्त को तोड़ते हुए दिल्ली की सीमा सिंघू बार्डर पर जा पहुंचे और रोके जाने पर वहीं धरना देकर बैठ गए।
 

किसान आंदोलन का कारवां बढ़ता जा रहा है

किसान आंदोलन का कारवां बढ़ता जा रहा है जबकि सरकार को उम्मीद थी कि दो तीन दिन के बाद किसानों का धैर्य और हौसला टूटने लगेगा और वो धीरे धीरे खुद ब खुद तितर बितर होने लगेंगे। लेकिन सरकार और उसके नौकरशाह रणनीतिकार शायद यह भूल जाते हैं कि अन्य आर्थिक वर्गों की तुलना में किसानों में स्थायित्व का भाव ज्यादा होता है। वह जब तक घरों और खेतों से नहीं निकलते हैं नहीं निकलते हैं लेकिन एक बार जब निकल लिए तो आसानी से पीछे नहीं हटते। किसान आंदोलनों और विद्रोहों का इतिहास इस बात का गवाह है। चाहे अंग्रेजों के खिलाफ पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ कूका आंदोलन हो गदर पार्टी का आंदोलन हो उनकी जड़ें भी गावों और किसानों के बीच ही थीं। उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में बाबा रामचंद्र की अगुआई में किसानों का आंदोलन या बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा की किसानों की लड़ाई हो या फिर गांधी जी का चंपारण सत्याग्रह, हर बार किसानों ने आर पार की लंबी लड़ाई लड़ी है।

आजाद भारत में भी चौधरी चरण सिंह से लेकर महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी, विजय जावंधिया, नंजदुम्मा स्वामी, विपिन भाई देसाई, भूपेंद्र सिंह मान, घासीराम नैन, प्रेम सिंह दहिया और अजमेर सिंह लाखोंवाल जैसे पुराने किसान नेता रहे हों या फिर इन दिनों के आंदोलनकारी किसान नेता सबके मजबूत इरादे जगजाहिर हैं।कभी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने किसानों की अनदेखी की नतीजा सामने है कि कभी देश पर राज करने वाली कांग्रेस आज महज चंद राज्यों में हुकूमत वाली और सिर्फ 52 लोकसभा सांसदों वाली पार्टी रह गई है।भाजपा ने अपने हर चुनाव में किसानों के कल्याण की बात की और 2014 से लेकर 2019 तक के हर चुनाव में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों आमदनी बढ़ाने से लेकर उनकी हर बेहतरी का वादा और दावा करते रहे हैं।

फिर किसानों की मांगों को लेकर इतनी बेरुखी क्यों और किसानों को लेकर किए गए कथित सुधार कानून बनाने में इतनी जल्दबाजी और हड़बड़ी क्यों दिखाई गई। यह सवाल आंदोलनकारी किसानों के बीच आम है। किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं कि अगर वास्तव में मोदी जी और उनकी सरकार को किसानों की इतनी ही फिक्र है तो इन सुधार कानूनों को बनाने से पहले किसान संगठनों से बातचीत क्यों नहीं की गई। किसान नेता वी एम सिंह भी यही सवाल करते हैं।

किसानों को सबसे ज्यादा आशंका है कि एक बार ये सुधार लागू हो गए तो भले ही सरकार अभी न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद मंडियों की व्यवस्था जारी रहने की बात मौखिक रूप से कह रही है, लेकिन जिस तरह से निजी क्षेत्र को एमएसपी के दायरे से बाहर रखा गया है और मंडियों के बाहर होने वाली खरीद को मंडी शुल्क से मुक्त रखा गया है, उससे एमएसपी और मंडी व्यवस्था अप्रासंगिक हो जाएंगे और तब बड़ी कंपनियां किसानों की मजबूरा का फायदा उठाकर उनसे उनकी फसल औने पौने दामों पर खरीदेंगी। साथ ही आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म करके भंडारण की अधिकतम सीमा खत्म कर दी गई है, उससे बड़ी कंपनियां जब चाहेंगी तब बाजार में अनाज की कमी पैदा करके उपभोक्ताओं से मनमाने दाम वसूलेंगी।जबकि सरकार किसानों की आशंकाओं को गलत बताते हुए कहती है कि ये तीनों कानून किसानों को पुरानी सरकारी
 

किसानों के सामने ज्यादा विकल्प होंगे

पाबंदी वाली व्यवस्था से मुक्त करके मुक्त बाजार के साथ जोड़ेंगे। जिससे किसान अपनी उपज जहां और जिससे उसे अच्छा दाम मिलेगा बेच सकेगा। इससे किसानों के सामने ज्यादा विकल्प होंगे। लेकिन किसान चाहते हैं कि एमएसपी को कानूनी दर्जा देकर उसे निजी क्षेत्र पर भी लागू किया जाए और यह प्रावधान किया जाए कि एमएसपी से कम मूल्य पर खरीद दंडनीय अपराध होगा। इसके साथ ही कानूनों के अन्य प्रावधानों को लेकर भी किसानों की आपत्तियां हैं।

कोरोना काल में 20 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की आड़ में केंद्र सरकार ने किसानों को राहत देने के नाम पर कृषि क्षेत्र में आमूल चूल सुधार का दावा करते हुए तीन अध्यादेशों के जरिए नई व्यवस्थाएं की औऱ फिर संसद के दोनों सदनों से इन्हें पारित कराकर कानून का रूप दे दिया।सरकार ने अपनी पीठ ठोंकी उधर पंजाब और हरियाणा में किसानों ने विरोध में रेल की पटरियों पर धरना शुरु कर दिया।

शुरू के दो तीन महीने सरकार इस विरोध को इसलिए नजरंदाज करती रही कि उसने इसे यही माना कि यह पंजाब के खाते पीते किसानों के एक वर्ग का विरोध मात्र है जिसे अपरोक्ष रूप से राज्य की कांग्रेस सरकार का समर्थन है। लेकिन भाजपा के सहयोगी अकाली दल को किसानों के विरोध की जमीनी आंच का अंदाजा जल्दी ही हो गया और उसने एनडीए से अपने को अलग करते हुए मोदी सरकार में अपनी एक मात्र मंत्री हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा करा दिया। लेकिन केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा ने इसे भी अपने लिए आपदा में अवसर माना क्योंकि भाजपा का एक बड़ा तबका अकाली दल के साथ गठबंधन को पंजाब में अपने लिए बोझ मानता था और इससे मुक्ति पाने की वकालत करता रहा है।

अकाली दल के खुद ब खुद अलग हो जाने से भाजपा के नेता खुश हो गए कि अब वह पंजाब में पार्टी का अकेले विस्तार कर सकेंगे।लेकिन शायद अब जब पंजाब से शुरु हुआ किसान आंदोलन राजधानी दिल्ली की दहलीज पर आ पहुंचा है और धीरे धीरे अखिल भारतीय स्वरूप लेता जा रहा है, तब सरकार और उसके राजनीतिक प्रबंधकों को अपनी भूल का अहसास जरूर हो रहा होगा कि अगर समय रहते सरकार इस विरोध की गंभीरता को भांप लेती तो शायद बात को पहले ही संभाला जा सकता था।
 

सरकार पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर तीनों कानूनों को रद्द करे

सरकार और किसानों के बीच गतिरोध का मुख्य बिंदु है कि किसान संगठन चाहते हैं कि सरकार पहले संसद का विशेष सत्र बुलाकर तीनों कानूनों को रद्द करे। उसके बाद किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श के बाद सहमति से कृषि सुधार करे जिससे वास्तव में किसानों का भला हो सके। लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। अभी तो सरकार एमएसपी को कानूनी दर्जा देने या उस पर लिखित आश्वासन देने का भी कोई संकेत नहीं दे रही है, लेकिन अगर सरकार बीच का रास्ता निकालते हुए इसके लिए तैयार भी हो जाए तो क्या किसान संगठन तीनों कानून रद्द करने की अपनी मांग से पीछे हटेंगे यह कहना मुश्किल है।

जैसे जैसे किसानों का आंदोलन लंबा खिंच रहा है वैसे वैसे यह मुद्दा पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आगे निकलकर देश के अन्य राज्यों के किसानों के बीच गरमाने लगा है।अन्य राज्यों के वो किसान जिन्हें एमएसपी का फायदा अभी तक नहीं मिला है, वो भी एमएसपी के फायदे को लेकर चर्चा करने लगे हैं। भले ही दिल्ली में डेरा डाले अधिकसंख्य किसान पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, ओडिशा और पूर्वोत्तर के राज्यों में किसान असंतोष की कोई हलचल फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है, लेकिन जिस तरह इन राज्यों के किसान संगठनों के प्रतिनिधि दिल्ली पहुंच कर आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं, उससे आंदोलन लंबा खिंचने पर इसके अन्य राज्यों में भी फैलन की आशंका बढ़ गई है। भले ही खेतों में काम के दबाव की वजह से अन्य राज्यों में किसान सड़क पर न उतरें लेकिन एमएसपी, मंडी व्यवस्था और खेती के कार्पोरेटीकरण का मुद्दा उनके बीच चर्चा में आता जा रहा है और सरकार के फैसलों को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।सरकार को इसकी चिंता भी करनी पड़ेगी।

किसानों के साथ लगातार कई दौर की हो चुकी बातचीत का कोई नतीजा न निकलने से जहां एक तरफ आंदोलन लंबा होता जा रहा है वहीं देश के अन्य इलाकों में ही नहीं बल्कि कनाडा, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों में भी अनिवासी भारतीय जिनकी जड़ें गावों में किसान परिवारों से जुड़ी हैं, समर्थन में आ रहे हैं।कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो के बयान ने तो भारत सरकार को बेहद असहज किया और भारत ने इसे देश के आंतरिक मामलों में दखल बताते हुए कनाडा के उच्चायुक्त को तलब करके चेतावनी भी दे डाली।इससे दोनों देशों के रिश्तों में भी खटास आने की आशंका है। किसान लगातार डटे हुए हैं और सरकार बातचीत को लंबा खींच रही है।अगर सरकार के रणनीतिकार किसानों को थकाने की योजना पर काम कर रहे हैं तो वो गलतफहमी में हैं। क्योंकि किसान लंबी तैयारी के साथ आए हैं और महीनों यहां बने रहने पर आमादा हैं।किसानों की मांग है कि कृषि संबंधी तीनों कानून रद्द करे और इसके बाद किसान संगठनों से विचार विमर्श करके नए कानून बनाए जिनमें किसान हितों की सुरक्षा की पूरी गारंटी हो। अब बात सिर्फ एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य तक ही नहीं रह गई है।

कृषि कानूनों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा

अब तीनों कृषि सुधार कानूनों के तमाम प्रावधानों जिनको किसान अपने हितों के खिलाफ मान रहे हैं, उन्हें किसान खत्म करना चाहते हैं। लेकिन सरकार ने अगर वो प्रावधान हटा दिए जिन पर किसानों को एतराज है तो इन कृषि कानूनों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।

आठ दिसंबर को किसानों के प्रस्तावित भारत बंद को कमोबेश सभी विपक्षी दलों ने समर्थन दे दिया है। लेकिन बिहार की चुनावी जीत और हैदराबाद नगर निगम की चुनावी सफलता को अगर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और सरकार अपने फैसलों पर जनता की मुहर मानती है तो यह उसकी गलतफहमी होगी। क्योंकि बिहार में जिस तरह अकेले तेजस्वी यादव के नेतृत्व में नरेंद्र मोदी नीतीश कुमार की जोड़ी वाले एनडीए को कांटे की टक्कर मिली और हैदराबाद में भाजपा वोटों के ध्रुवीकरण के रथ पर चढ़कर अपनी सीटें अप्रत्याशित रूप से बढाने में कामयाब हुई है, इन्हें किसान कानूनों और अन्य फैसलों पर जनादेश मानने की बजाय केंद्र सरकार को किसानों से बातचीत करके कोई सर्वस्वीकार्य रास्ता जल्दी से जल्दी निकालना होगा, वरना यह आंदोलन राजनीतिक रूप से सरकार और सत्ताधारी दल को भविष्य में उसी तरह भारी पड़ सकता है जैसे कि अस्सी के दशक के किसान आंदोलन तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और अन्ना व रामदेव आंदोलन यूपीए दो की सरकार के लिए भारी पड़े थे। उम्मीद है कि देश और जनता की सियासी नब्ज की पहचान रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेता किसान आंदोलन की आंच को भी समय रहते महसूस करके कोई रास्ता निकालेंगे।

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