किसान आंदोलन और सरकार: क्या इस रात की सुबह नहीं?
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यह कहना गलत हो जाएगा कि राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर मेरी अनदेखी है, या फिर ऐसे मुद्दे रुचिकर नहीं होते। पिछले करीब एक महीने से दिल्ली की सीमाओं पर उहापोह की स्थिति बनी हुई है, यह इसलिए नहीं कि, कोई बाजीगर अपनी कला का प्रदर्शन करने उतरा है।
सच कहें तो यह स्थिति हम सभी को प्रभावित करने वाली है और कहीं न कहीं हम सब भीतर से ग्लानि भाव में भी भीगे हुए हैं।
सरकार भी कहती है कि अन्नदाताओं के मान-मर्यादा की रक्षा हो, हमारे परिवार के बुजुर्ग अन्नदाता भी यही भाव रखते हैं कि राष्ट्रहित की रक्षा हो पर साथ मेंं अन्नदाताओं के हितों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इस विषय को अगर ऊपरी स्तर से विवेचित किया जाए तो दोनों पक्षों में न तो कोई विभेद दिखता है और न ही कोई वैमनस्य भाव की प्रमुखता, फिर आखिर देश की राजधानी ठप्प सी क्यों पड़ी हुई है?
सरकारें कोई भी हो देश को चलाने के लिए अपनी सुविधानुसार नए नियम-कानूनों को बनाती भी है, और उसे लागू करवाने में सभी हथकंडों का प्रयोग भी करती रही है, चाहे यह पार्टी हो, या वह पार्टी.!
वर्तमान में विवाद में आए नए कृषि कानून को लेकर आमने-सामने की स्थिति बनी है। विभिन्न स्रोतों से जानकारी के अनुसार न तो यह कानून पहली बार देश मे अवतरित हुए है और ऐसा भी नहीं कि इस कानून के बारे में देश के किसानों को पहली बार जानकारी मिली है। राज्यों की सरकारों ने अपने-अपने सुविधानुसार इसे स्वीकारा भी है और अपने चुनावी घोषणा-पत्रों में इसे दमखम से लागू करवाने को कहा भी है।
स्थिति यही है कि चुनाव हार गए तो जिस दूसरी सरकार ने इसे लागू करवाने की मंशा की उसका विरोध स्वाभाविक है।
इस हाड़ कंपाती ठंड में हमारे अभिभावक किसान सड़कों पर बैठे हैं, साथ मे बच्चों को भी देखा गया है। नवयुवक तो इस ठंड को तनिक झेलने की स्थिति में है भी, पर इन बुजुर्गों की स्थिति के बारे में सोचना आवश्यक है, शायद यह इसलिए कि इन बुजुर्गों के मन मे यह बैठ गया है कि अगर यह कानून आ गया, तो उनकी जिंदगी खात्मे की ओर होगी इसलिए वे भी इसे अंतिम लड़ाई मान कर उतर चुके हैं।
जिस गति और मति से हर रोज सरकार और किसान संगठन की ओर से पत्रों का आना-जाना लगा है, यह दुःखद है। सरकार को भी इन किसानों को अपना अभिभावक तुल्य अन्नदाता मानकर कानून से अलग समझने और उन्हें समझाने की आवश्यकता है और साथ ही किसानों को भी यह समझना होगा कि ये सरकारें किसी दूसरे देश की नहीं बल्कि हमारी खुद की ही चुनी हुई सरकार है और इनके ऊपर करीब एक सौ पैतीस करोड़ भाई-बहनों की भी जिम्मेदारी है।
किसानों के तथाकथित रहनुमाओं को इस बात को समझने और समझाने की आवश्यकता है...
हमारे घर में भी परिवार के मुखिया कई बार ऐसे निर्णय लेने को बाध्य होते हैं, जिस पर सभी सदस्यों की सहमति नहीं होती पर परिवार की सुरक्षा और संप्रभुता के भाव से ये निर्णय लिए जाते हैं और बाद में सभी सदस्यों की सहमति हो ही जाती है बस समझने में तनिक विलंब हो जाए तो भी कोई बात नहीं।
कल कहीं देख रहा था कि किसानों की ओर से एकमात्र शर्त यह है कि कृषि कानूनों की वापसी के बिना कोई बातचीत नहींं। सरकार की ओर से यह कहा जा रहा कि नए कानून में संशोधन और थोड़े बहुत बदलाव के लिए वे सहमत है।
इसी उहापोह में बात बनती नहीं दिख रही.!
मेरे विचार से किसानों को भी एक कदम आगे बढ़कर कुछ संशोधनों के साथ ही इस कानून को आगे बढ़ने देना चाहिए क्योंकि सरकार तो पीछे हटने से रही, ऊपर से तुर्रा यह कि,किसानों के एक नए संगठन ने सरकार की नीतियों के समर्थन में भी सड़कोंं पर उतरने का फैसला कर लिया है इससे किसानों का संगठन ही कमजोर होगा और आपस मे टूट-फूट भी संभावित.!
किसानों के तथाकथित रहनुमाओं को इस बात को समझने और समझाने की आवश्यकता है क्योंकि अब शायद यह आंदोलन अपने निश्चित लक्ष्य से तनिक भटक कर कुछ राजनीतिक लोलुपों के हत्थे चढ़ रहा यह इसलिए कि, आंदोलन के कुछ तस्वीरों में किसानों के मुद्दे से अलग की विचारधारा भी दृष्टित होती सी है.!
यह राजनीतिक लोलुपता किसी का न तो भला होने देगी, और न ही किसी मुद्दे को सुलह की ओर बढ़ने ही देगी.!
किसानों को यह समझना होगा कि, यह कानून अगर विवादित है, किसानों के हित में नहीं है, तो कोई बात नहीं, कुछ साल इंतजार ही कर लीजिए, अगले चुनाव में सरकार बदलने की ताकत तो हाथ मे हैं ही अगर इस बीच मे कानून की अच्छाई समझ आ जाए तो बीच के राजनीतिक दलालों को उखाड़ फेंकने की भी आवश्यकता हो जाएगी।
नुकसान किसी का हो, अपने देश और परिवार का ही है.!
आरंभिक दिनों में यह कहा गया था कि इस मंच पर कोई भी राजनीतिक रोटी नहीं सेंकी जाएगी, पर आज स्थिति यह कि बयानबाजी करने वाले सभी तथाकथित किसान नेता किसी न किसी दलविशेष से सम्बद्धता रखते हैं।
सरकार भी इन किसानों को अपना मानते हुए कुछ कदम पीछे की ओर आए और किसानों को भी अपनी जिद छोड़कर एकाध कदम आगे आना चाहिए, तभी इस ठहराव में गति और मति दोनों का समावेश सकल होगा, क्योंकि अगर यह ठहराव गतिमान नहीं हुआ, तो देश की धड़कन राजधानी की गति तो रुक ही चुकी है, मति रुक गई तो,अनर्थ भी संभावित.!
अभी हमारा देश अपनी सीमाओं पर उलझा हुआ है, इस समय मे राष्ट्र की शक्ति और संसाधनों का उपयोग राजनीतिक हल में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों को साधने में लगना चाहिए.!
ठंड है, सरकारी गर्मी भी इन किसानों तक पहुंचे, और किसानों की उष्णता भी सरकारी महकमे को पिघलाए, यह दोनों पक्षों के लिए आवश्यक है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।