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एग्जिट पोल 2019ः कमजोर और बिखरा विपक्ष फंस गया भाजपा के दांव में? मोदी के सामने होंगी ये चुनौतियां

Dr. Praveen Tiwari डॉ.प्रवीण तिवारी
Updated Mon, 20 May 2019 01:18 PM IST
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exit poll 2019 nda bjp congress upa pm modi set to become prime minister again
क्या पूरे चुनाव में विपक्ष बिखरा हुआ था? क्या मुद्दों को उठा नहीं पाया? - फोटो : Social Media

एक बार फिर ईवीएम की खराबी का रोना शुरू हो गया है। एक बार फिर इलेक्शन कमीशन को गालियां दिए जाने का दौर शुरू हो गया है। एक बार फिर केदारनाथ जैसी धार्मिक यात्राओं पर सवालिया निशान लगाने का समय आ गया है। एक बार फिर विपक्ष के निकम्मे होने की झुंझलाहट मोदी विरोधी खेमे में देखने को मिल रही है। एक बार फिर प्रियंका थोड़ा पहले आती राहुल थोड़ा पहले जाते की मगजमारी शुरू हो गई है। क्या यह एग्जिट पोल के नतीजों भर से बौखलाया विपक्ष है।

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जमीन पर थी मोदी लहर 
23 तारीख तक का इंतजार तो कर लीजिए अभी से हार की हताशा आपके चुनाव लड़ने को ही झूठा करार देती है। मैं एग्जिट पोल के नतीजों में विश्वास करने वाला व्यक्ति नहीं। एग्जिट पोल के इन नतीजों को अंतिम भी नहीं मानता, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान की निजी चुनावी यात्राओं के बाद मेरा आकलन स्पष्ट तौर पर एक बार फिर मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना जता चुका है।
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दरअसल, नतीजे तो जो आएंगे हो आएंगे, लेकिन एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद कथित तौर पर एंटी मोदी मीडिया कहे जाने वाले चैनल के भी नतीजे मोदी पक्ष में ही दिखाई दे रहे हैं। दिनभर इन चैनल की पोस्ट को शेयर करने वाले कथित बुद्धिजीवी अब सभी चैनलों के साथ इन चैनलों को भी बिकाऊ कह रहे हैं और एग्जिट पोल को बेडरूम में बैठकर बनाया हुआ कह रहे हैं। 
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एग्जिट पोल का गणित और विज्ञान 
एग्जिट पोल का अपना विज्ञान है और अपने तौर-तरीके उसकी बहस में मैं नहीं पडूंगा, लेकिन निश्चित तौर पर जब सभी एग्जिट पोल एक ही ओर इशारा करें तो सैंपल साइज काफी बड़ा हो जाता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यदि आप एग्जिट पोल के नतीजों पर बहस नहीं करना चाहें तो विपक्ष ने ऐसा कोई कद्दू में तीर नहीं मारा है जिससे वह मोदी के खिलाफ खुद को मजबूत पाएं और चुनाव के दौरान उनके उठाए मुद्दों पर बहस की जाए।

दरअसल, मोदी या बीजेपी के द्वारा फेंके गए पांसों में ही राहुल और उनके सहयोगी अटके रहे। फिर चाहे वह चौकीदार का नारा हो या फिर गाहे-बगाहे लिए जाने वाले राजनीतिक निर्णय हो। जिनमें साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी और अंतिम चरण में केदारनाथ की यात्रा जैसे निर्णय शामिल है। विपक्ष को हमेशा बीजेपी के निर्णय लेने के बाद ही यह समझ में आता था कि इन चीजों का राजनैतिक लाभ भी हो सकता है। 

 

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दोबारा पीएम बनें तो मोदी के सामने होंगी कई चुनौतियां  - फोटो : अमर उजाला

कमजोर और बिखरा विपक्ष क्यो पिछड़ गया? 
दरअसल, नतीजे जो भी आए लेकिन 2019 का यह चुनाव कई बातों के लिए जाना जाएगा। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बात होगी बिखरा कमजोर और अपरिपक्व विपक्ष जिसका नेतृत्व अघोषित तौर पर राहुल गांधी करते रहे। सपा-बसपा बेमेल गठजोड़, ममता बनर्जी की झुंझलाहट, अरविंद केजरीवाल और उनकी तरह अलग किस्म की राजनीति करने वालों का बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाना, कन्हैया, प्रकाश राज जैसे इक्का-दुक्का चेहरों के समर्थन में एंटी मोदी लोगों का इकट्ठा होना।

देखा जाए तो राजनीति में विपक्ष की अपनी अहमियत है और विपक्ष को ही लोकतंत्र की आवाज कहा गया है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष अपनी ही आवाज को तलाशने में नाकाम रहा है। आने वाले 5 साल विपक्ष के लिए तो कठिन होंगे ही भारतीय राजनीति को भी नए सिरे से परिभाषित करेंगे। 

दोबारा पीएम बनें तो मोदी के सामने होंगी ये चुनौतियां 
यह समय, खास तौर पर मोदी के लिए विशेष महत्व का होगा यदि वे दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं तो। अब बात विदेश यात्राओं, फोटो सेशन और योजनाओं के नाम भर तक से नहीं चलेगी। बीते 5 साल के प्रयासों और आने वाले 5 सालों में नए बीजारोपण से ही उनका आकलन होगा।

2014 में उनसे उम्मीदें बहुत पाल ली गई थीं। समय कम था और ऐसे में काम करने के साथ-साथ उसे दिखाना भी जरूरी था, जो मोदी सरकार ने किया भी। अब जरूरत है जमीनी स्तर पर इन योजनाओं के ठीक-ठीक क्रियान्वयन की भी। 

इस बीच उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति भी नए परिदृश्य में सामने आएगी। पूरी तरह हाशिए पर जा चुके वामपंथी, क्षेत्रीय राजनीति में बीजेपी का बैक सपोर्ट करते दिखे तो आश्चर्य नहीं होगा और सपा बसपा गठबंधन कुछ सीटें लोकसभा में लेकर आए तो विधानसभा चुनाव में भी इनके साथ लड़ने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का मन कब डोल जाए पर भी टिप्पणी नहीं की जा सकती।

खैर 2019 का महायज्ञ पूर्ण हुआ और इसमें किसे क्या फल मिला यह भी 23 को तय हो जाएगा, लेकिन 2019 से 2025 का समय भारतीय राजनीति और भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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