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श्रीलंका का घटनाक्रम भारत के लिए झटका
राजेश बादल
Updated Sun, 28 Oct 2018 10:58 AM IST
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श्रीलंका में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की बर्खास्तगी चौंकाने वाली तो थी, लेकिन इसका तिलिस्म देर तक नहीं बना रह पाया। पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही यह साफ हो गया कि श्रीलंका पर चीन की पकड़ और मजबूत हो गई है। भारत के लिए यह एक बड़ा कूटनीतिक झटका है। महिंद्रा राजपक्षे की पहचान चीन के दोस्त और भारत से दूरी बनाकर रखने की रही है। मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना और रानिल विक्रमसंघे दोनों ही भारत समर्थक माने जाते रहे हैं।जब महिंद्रा राजपक्षे राष्ट्रपति थे और लिट्टे से आरपार की लड़ाई के मूड में थे तो उन्हें लगता था कि इस मामले में वे भारत पर भरोसा नहीं कर सकते।
तमिलनाडु से लिट्टे को अरसे तक मदद मिलती रही है इसलिए उनका सोचना आंशिक रूप से सच भी था।इससे पहले 2004 में सुनामी आई थी।उसमें राजपक्षे का अपने गृह राज्य हंबनटोटा बर्बाद हो गया। श्रीलंका ने सारी दुनिया से मदद मांगी। चूंकि भारत खुद इस बड़ी आपदा का शिकार हुआ था इसलिए चीन ने अवसर का लाभ उठाया। उसने श्रीलंका को 2007 में 307 मिलियन डॉलर का कर्ज दिया। इससे पहले श्रीलंका अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे भी गया था, लेकिन उसे सहायता नहीं मिली। मुद्राकोष को लगता था कि श्रीलंका इतनी बड़ी राशि चुका नहीं पाएगा। लिहाजा चीन ने कर्ज दिया और हंबनटोटा को शानदार बंदरगाह के तौर पर विकसित किया। इसके बाद 2015 के चुनाव में चीन ने राजपक्षे पर फिर दांव लगाया। उसने राजपक्षे को चुनाव के लिए भरपूर फंड दिया लेकिन राजपक्षे सिरिसेना से हार गए।
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दरअसल महिंद्रा राजपक्षे और मैत्रीपाला सिरिसेना ने बीते दिनों अनेक मुलाकातें कीं।प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को या तो इनकी भनक नहीं लगी या फिर वे असहाय थे।उनकी विदेश यात्राएं होती रहीं और कोलंबो में दोनों शिखर नेताओं की गुपचुप खिचड़ी पकती रही। सूत्रों के मुताबिक इन बैठकों के सूत्रधार लंका में चीनी राजदूत थे। राजनीतिक हलकों में इन बैठकों की चर्चा भी हो रही थी, लेकिन इन चर्चाओं का नतीजा भी शीघ्र सामने आ गया। सिरिसेना के राजनीतिक मोर्चे यूपीएफए याने यूनाइटिड पीपल्स फ्रीडम एलाइंस ने एलान किया कि वह अब रानिल विक्रमसिंघे के साथ गठबंधन से बाहर हो चुका है और संसद में उन्हें समर्थन नहीं देगा। यह गठबंधन विक्रमसिंघे की यूनाइटिड नेशनल पार्टी के साथ था।इसके बाद सिरिसेना ने प्रधानमंत्री और अपने दोस्त विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महेंद्र राजपक्षे को शपथ दिला दी।
चीन का दूतावास तो यही चाहता था। अब सरकार और देश पर एक तरह से महिंद्रा राजपक्षे का नियंत्रण हो गया है। राजनयिक जानकार इसे सिरिसेना की भूल मान रहे हैं क्योंकि राजपक्षे उन्हें धोखा दे देंगे ,कोई नहीं जानता। चूंकि मौजूदा मंत्रिमंडल में सिरिसेना और विक्रमसिंघे की पार्टियों के मंत्री हैं इसलिए अब वहां सत्ता की उठापटक शुरू हो गई है।
दूसरी ओर अपनी बर्खास्तगी को विक्रमसिंघे चुनौती देने जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 में संशोधन के बाद राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने का हक नहीं रह गया है। या तो प्रधानमंत्री स्वयं इस्तीफा दे या फिर उसे संसद के अयोग्य घोषित कर दिया जाए तभी उसे हटाया जा सकता है। अब रानिल विक्रमसिंघे ने दावा किया है कि वे संसद में बहुमत साबित करेंगे।
भारतीय विदेश नीति के नियंताओं को श्रीलंका का वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम तनिक चिंता में डालता है।चीन पिछले चुनाव के बाद से ही महिंद्रा राजपक्षे को मुख्य धारा में लाने का प्रयास कर रहा था।खबरें तो यहां तक हैं कि हंबनटोटा बंदरगाह पर अपने दबदबे के एवज में चीन ने ही महिंद्रा राजपक्षे का चुनावी खर्च उठाया था।लेकिन उनकी हार ने समीकरण बदल दिए।अब भारत को एक बार फिर अपने पड़ोसियों के बारे में परंपरागत किन्तु आक्रामक विदेश नीति पर लौटना होगा। अन्यथा पाकिस्तान ,म्यांमार,नेपाल और मालदीव के बाद श्रीलंका भी चीन की शरण में जाने को बाध्य हो जाएंगे। इसके दूरगामी परिणाम भारत के लिए अच्छे नहीं होंगे।
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तमिलनाडु से लिट्टे को अरसे तक मदद मिलती रही है इसलिए उनका सोचना आंशिक रूप से सच भी था।इससे पहले 2004 में सुनामी आई थी।उसमें राजपक्षे का अपने गृह राज्य हंबनटोटा बर्बाद हो गया। श्रीलंका ने सारी दुनिया से मदद मांगी। चूंकि भारत खुद इस बड़ी आपदा का शिकार हुआ था इसलिए चीन ने अवसर का लाभ उठाया। उसने श्रीलंका को 2007 में 307 मिलियन डॉलर का कर्ज दिया। इससे पहले श्रीलंका अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे भी गया था, लेकिन उसे सहायता नहीं मिली। मुद्राकोष को लगता था कि श्रीलंका इतनी बड़ी राशि चुका नहीं पाएगा। लिहाजा चीन ने कर्ज दिया और हंबनटोटा को शानदार बंदरगाह के तौर पर विकसित किया। इसके बाद 2015 के चुनाव में चीन ने राजपक्षे पर फिर दांव लगाया। उसने राजपक्षे को चुनाव के लिए भरपूर फंड दिया लेकिन राजपक्षे सिरिसेना से हार गए।
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सिरिसेना भारत समर्थक माने जाते हैं। चुनाव जीतते ही चीन ने कर्ज चुकाने का दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। श्रीलंका परेशान हो गया। हार कर उसने हंबनटोटा बंदरगाह चीन के सुपुर्द कर दिया। अब श्रीलंका चीन की गिरफ्त से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा है। भारत इन दिनों वहां गरीबों के लिए घर तथा सड़कें बना रहा है। श्रीलंका में चीनी दूतावास प्रमुख लुओ शौंग ने श्रीलंका को ललचाया हाल ही में लालच दिया था कि वह भी भारत की तरह घर तथा सड़कें बनाना चाहता है। श्रीलंका दबाव और दुविधा में था। इतना ही नहीं हंबनटोटा में माताला राजपक्षे एयरपोर्ट भी चीन ने बड़ी मंहगी ब्याज दरों पर श्रीलंका को कर्ज देकर विकसित किया था। इसका पैसा भी श्रीलंका को चुकाना कठिन था। इसलिए भारत ने पहल की है। अब भारत - श्रीलंका मिलकर विमानतल का संचालन करेंगे।वहां कैबिनेट ने यह फैसला किया और बाद में संसद में इसका ऐलान कर दिया गया। इससे चीन की कूटनीतिक मुश्किलें बढ़ गई। इसके बाद से ही चीन भारत को झटका देने का अवसर खोज रहा था।
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दरअसल महिंद्रा राजपक्षे और मैत्रीपाला सिरिसेना ने बीते दिनों अनेक मुलाकातें कीं।प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को या तो इनकी भनक नहीं लगी या फिर वे असहाय थे।उनकी विदेश यात्राएं होती रहीं और कोलंबो में दोनों शिखर नेताओं की गुपचुप खिचड़ी पकती रही। सूत्रों के मुताबिक इन बैठकों के सूत्रधार लंका में चीनी राजदूत थे। राजनीतिक हलकों में इन बैठकों की चर्चा भी हो रही थी, लेकिन इन चर्चाओं का नतीजा भी शीघ्र सामने आ गया। सिरिसेना के राजनीतिक मोर्चे यूपीएफए याने यूनाइटिड पीपल्स फ्रीडम एलाइंस ने एलान किया कि वह अब रानिल विक्रमसिंघे के साथ गठबंधन से बाहर हो चुका है और संसद में उन्हें समर्थन नहीं देगा। यह गठबंधन विक्रमसिंघे की यूनाइटिड नेशनल पार्टी के साथ था।इसके बाद सिरिसेना ने प्रधानमंत्री और अपने दोस्त विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महेंद्र राजपक्षे को शपथ दिला दी।
चीन का दूतावास तो यही चाहता था। अब सरकार और देश पर एक तरह से महिंद्रा राजपक्षे का नियंत्रण हो गया है। राजनयिक जानकार इसे सिरिसेना की भूल मान रहे हैं क्योंकि राजपक्षे उन्हें धोखा दे देंगे ,कोई नहीं जानता। चूंकि मौजूदा मंत्रिमंडल में सिरिसेना और विक्रमसिंघे की पार्टियों के मंत्री हैं इसलिए अब वहां सत्ता की उठापटक शुरू हो गई है।
दूसरी ओर अपनी बर्खास्तगी को विक्रमसिंघे चुनौती देने जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 में संशोधन के बाद राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने का हक नहीं रह गया है। या तो प्रधानमंत्री स्वयं इस्तीफा दे या फिर उसे संसद के अयोग्य घोषित कर दिया जाए तभी उसे हटाया जा सकता है। अब रानिल विक्रमसिंघे ने दावा किया है कि वे संसद में बहुमत साबित करेंगे।
भारतीय विदेश नीति के नियंताओं को श्रीलंका का वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम तनिक चिंता में डालता है।चीन पिछले चुनाव के बाद से ही महिंद्रा राजपक्षे को मुख्य धारा में लाने का प्रयास कर रहा था।खबरें तो यहां तक हैं कि हंबनटोटा बंदरगाह पर अपने दबदबे के एवज में चीन ने ही महिंद्रा राजपक्षे का चुनावी खर्च उठाया था।लेकिन उनकी हार ने समीकरण बदल दिए।अब भारत को एक बार फिर अपने पड़ोसियों के बारे में परंपरागत किन्तु आक्रामक विदेश नीति पर लौटना होगा। अन्यथा पाकिस्तान ,म्यांमार,नेपाल और मालदीव के बाद श्रीलंका भी चीन की शरण में जाने को बाध्य हो जाएंगे। इसके दूरगामी परिणाम भारत के लिए अच्छे नहीं होंगे।