प्रदूषण कथा-1: नेता महोदय! पर्यावरण को राजनीतिक एजेंडे में शामिल कर लें
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इस समय देश के प्रमुख राज्यों मप्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव हैं। भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा और यहां तक की आम आदमी के हितों की सबसे ज्यादा चिंता जताने वाली वामपंथी पार्टियां बिजली, सड़क और पानी जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच में हैं। हर दल का चुनावी मेनिफेस्टो तैयार है और सभी राजनीतिक दल अपने-अपने चुनावी वादों, एजेंडों और घोषणा-पत्रों के साथ जनता के बीच में हैं। इन चुनावी घोषणा-पत्रों में वही मुद्दे हैं जिन्हें वे हर साल में उठाते रहे हैं, लेकिन नहीं है तो बिगड़ते पर्यावरण और जानलेवा होते प्रदूषण का मुद्दा। नदियों के प्रदूषण की बात करते-करते गंगा की सफार्इ को लेकर मंत्रालय बन गया, एनजीओ आवाज बुलंद करते रहे लेकिन देश के सियासतदानों को अभी तक नहीं लगा कि प्रदूषण और पर्यावरण पॉलिटिकल एजेंडे में शामिल किया जाए और उससे मर रही जनता को बचाने के उपाय शामिल किए जाएं।
विकास है लेकिन पर्यावरण नहीं
देश में हर जगह हर तरफ हर पार्टी विकास की बातें करती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि अधिकांश राजनीतिक दलों के एजेंडे में पर्यावरण संबंधी मुद्दा है ही नहीं ना ही उनके चुनावी घोषणा-पत्र में पर्यावरण-प्रदूषण कोई मुद्दा रहता है। देश में हर जगह, हर तरफ, हर पार्टी विकास की बातें करती है लेकिन ऐसे विकास का क्या फायदा जो लगातार विनाश को आमंत्रित करता है। ऐसे विकास को क्या कहें जिसकी वजह से सम्पूर्ण मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया हो।
सच्चाई तो यह है कि अब समय आ गया है जब पर्यावरण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों के साथ आम आदमी की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए क्योंकि अब भी अगर हमने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया आगे आने वाला समय भयावह होगा। फिलहाल देश के सभी बड़े शहरों में वायु प्रदूषण अपने निर्धारित मानकों से बहुत ज्यादा है।
दिल्ली प्रदूषण साल भर बना रहता है
दिवाली के बाद हर साल की तरह वायु प्रदूषण बढ़ा रहा हुआ है। धुंध और धुंआ जानलेवा स्तर तक पहुंच गया है। हर आम और खास को सांस लेने में परेशानी,आंखों में जलन सहित कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी है। कुलमिलाकर कथित विकास के पीछे विनाश की आहत धीरे-धीरे दिखाई और सुनाई पड़ने लगी है। केंद्र और राज्य सरकारें उसी पुरानी कसरत में लगी हैं जिसमें बैठकें हैं मीटिंग्स हैं और ट्रकों की आवाजाही रोकना है और हिदायतें जाराी करनी हैं। लेकिन आम आदमी की भारी परेशानी से अब तक राजनीतिक दल वैसे संवेदनशील नहीं हुए हैं कि उसे अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल करें।
दरअसल, फौरी तौर पर बच्चों के स्कूल-कॉलेज बंद करने ,सबको घर में रहकर काम करने की सलाह देने वाले क्या बताएंगे कि आम नौकरी पेशा करने वाला,मजदूरी करने वाला आदमी अब कहां जाए। हो सकता है कुछ दिन में ये धुंध कम हो जाए, लेकिन इसका ख़तरा तो अब हमेशा बना ही रहेगा।
दिल्ली में खतरनाक हुआ प्रदूषण
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली का वातावरण बेहद जहरीला हो गया है। इसकी गिनती विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित शहर के रूप में होने लगी है। यदि वायु प्रदूषण रोकने के लिए शीघ्र कदम नहीं उठाए गए तो इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे।
डब्ल्यूएचओ ने वायु प्रदूषण को लेकर 91 देशों के 1600 शहरों पर डाटा आधारित अध्ययन रिपोर्ट जारी की थी। इसमें दिल्ली की हवा में पीएम 25 (2.5 माइक्रोन छोटे पार्टिकुलेट मैटर) में सबसे ज्यादा पाया गया है। पीएम 25 की सघनता 153 माइक्रोग्राम तथा पीएम 10 की सघनता 286 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया है, जो कि स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। वहीं बीजिंग में पीएम 25 की सघनता 56 तथा पीएम 10 की 121 माइक्रोग्राम है। जबकि कुछ वर्षो पहले तक बीजिंग की गिनती दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर के रूप में होती थी, लेकिन चीन की सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए कई प्रभावी कदम उठाए, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
पर्यावरण विज्ञान से जुड़ी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरन्मेंट ने पिछले दिनों राजधानी के विभिन्न स्थलों व सार्वजनिक परिवहन के अलग-अलग साधनों में वायु प्रदूषण का स्तर मापने के लिए किए अध्ययन के आधार पर कहा है कि बस, मेट्रो, ऑटो व पैदल चलने वाले दिल्ली में सबसे अधिक जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं। दिल्ली की हवा बद से बदतर होती जा रही है। बीती सर्दी में यह खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी।
दिल्ली के प्रदूषण पर चौंकाने वाली स्टडी
एक अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण भारत में मौत का पांचवां बड़ा कारण है। हवा में मौजूद पीएम25 और पीएम10 जैसे छोटे कण मनुष्य के फेफड़े में पहुंच जाते हैं, जिससे सांस व हृदय संबंधित बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे फेफड़े का कैंसर भी हो सकता है। दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण वाहनों की बढ़ती संख्या है। इसके साथ ही थर्मल पावर स्टेशन, पड़ोसी राज्यों में स्थित ईंट भट्ठा आदि से भी दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का हाल ही में किया नया अध्ययन यह बताता है कि हम वायु प्रदूषण की समस्या को दूर करने को लेकर कितने लापरवाह हैं और यह समस्या कितनी विकट होती जा रही है। खास बात यह है कि ये समस्या सिर्फ दिल्ली में ही नहीं है बल्कि देश के लगभग सभी शहरों की हो गई है और हालात नहीं सुधरे तो वो दिन दूर नहीं जब शहर रहने के लायक नहीं रहेंगे। यही नहीं जो लोग विकास ,तरक्की और रोजगार की वजह से गाँव से शहरों की तरफ आ गयें है उन्हें फिर से गांवों की तरफ रुख करना पड़ेगा ।
किस गैसों को ग्रहण करते हैं हम
स्वच्छ वायु सभी मनुष्यों, जीवों एवं वनस्पतियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके महत्त्व का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मनुष्य भोजन के बिना हफ्तों तक जल के बिना कुछ दिनों तक ही जीवित रह सकता है, किन्तु वायु के बिना उसका जीवित रहना असम्भव है। मनुष्य दिन भर में जो कुछ लेता है उसका 80 प्रतिशत भाग वायु है।
प्रतिदिन मनुष्य 22000 बार सांस लेता है। इस प्रकार प्रत्येक दिन में वह 16 किलोग्राम या 35 गैलन वायु ग्रहण करता है। वायु विभिन्नगैसों का मिश्रण है जिसमें नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक 78 प्रतिशत होती है जबकि 21 प्रतिशत ऑक्सीजन तथा 0.03 प्रतिशत कार्बन डाइ ऑक्साइड पाया जाता है तथा शेष 0.97 प्रतिशत में हाइड्रोजन, हीलियम, आर्गन, निऑन, क्रिप्टन, जेनान, ओजोन तथा जल वाष्प होती है। वायु में विभिन्न गैसों की उपरोक्त मात्रा उसे संतुलित बनाए रखती है। इसमें जरा-सा भी अन्तर आने पर वह असंतुलित हो जाती है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होती है।
पर्यावरण के नजरिये से भारत क्यों हो रहा खतरनाक
श्वसन के लिए ऑक्सीजन जरूरी है। जब कभी वायु में कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों की वृद्धि हो जाती है, तो यह खतरनाक हो जाती है । भारत को विश्व में सातवें सबसे अधिक पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक देश के रूप में स्थान दिया गया है। वायु शुद्धता का स्तर ,भारत के मेट्रो शहरों में पिछले 20 वर्षों में बहुत ही खराब रहा है और ढाई गुना और औद्योगिक प्रदूषण चार गुना और बढ़ा है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर साल लाखों लोग खतरनाक प्रदूषण के कारण मर जाते हैं। वास्तविकता तो यह है कि पिछले 18 वर्ष में जैविक ईधन के जलने की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है और पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सैल्शियस तक बढ़ा है। अगर यही स्थिति रही तो सन् 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।
राजनीतिक दलों को सोचना होगा
दरअसल, सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के कई शहरों का वातावरण बेहद प्रदूषित हो गया है। इस प्रदूषण को रोकने के लिए कभी सरकार ने गंभीर प्रयास नहीं किये ,जो प्रयास किये गये वो नाकाफी साबित हुए और वायु प्रदूषण बढ़ता ही गया। इसे रोकने के लिए सरकार को अब जवाबदेही के साथ एक निश्चित समयसीमा के भीतर ठोस प्रयास करना पड़ेगा नहीं तो प्राकृतिक आपदाओं के लिए हमें तैयार रहना होगा, जिस तरह से आज राजधानी दिल्ली के लोग शुद्ध हवा में सांस लेने को तरस रहें है, ऐसे में वो दिन दूर नहीं जब देश के अधिकांश शहरों का यही हाल होगा इसलिए हमें कल से नहीं बल्कि आज से या कहे अभी से इस रोकने के लिए तत्काल कदम उठाना होगा। सरकार के साथ साथ समाज और व्यक्तिगत स्तर पर भी काम करना होगा तभी इन सब से छुटकारा मिल पायेगा।
(लेखक शशांक द्विवेदी राजस्थान की मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर हैं और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। वे 15 सालों से विज्ञान विषयों पर लिख रहे हैं। वे विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम वेबसाइट के संचालक भी हैं। एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)
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