World Environment Day 2024: पर्यावरण की सुरक्षा हो सबकी प्राथमिकता
दुनिया भर में तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रहा है, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण यह और भी बढ़ रहा है। एक सदी पहले कैलिफोर्निया के डेथ वैली (Death Valley) में 56.7 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया तथा हाल ही में दिल्ली के मुंगेशपुर में 52.9 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान दर्ज़ किया गया।
विस्तार
पर्यावरण से तात्पर्य हमारे चारों ओर मौजूद आवरण है। जिसमें पेड़-पौधे, जीव-जंतु, जल, जंगल, जमीन शामिल हैं। इनको साथ लेकर विकास की रूपरेखा तैयार की जाए तो ही पर्यावरण संरक्षित विकास की आधारशिला रखी जा सकती है। पर्यावरण के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। आश्चर्य की बात है कि हजारों वर्ष प्रकृति मानव के बिना फली-फूली, आज भी कई ऐसे स्थान मौजूद हैं जहां मानव की घुसपैठ आसान नहीं है, वहां जीवन सामान्य रूप से जारी है लेकिन मानव जीवन प्रकृति के बिना कुछ ही पल में खत्म हो जायेगा। फिर भी हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को तेजी से काट रहे हैं, जिसका प्रभाव अब दिखाई देने लगा है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का तेजी से समाप्त होना, समुद्री जलस्तर का लगातार बढ़ना आदि तनाव उत्पन्न करने वाले हैं।
मौसम के बदलाव की तूफानी रेल को रोकना असम्भव
वर्तमान में दुनिया भर के पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है ’मौसम में होता बदलाव’। दुनिया ने विकास से विनाश का सफर तय करना आरम्भ कर दिया है। बचपन में किताबों में इस विनाश की इबारत को पढकर मन इन चेतावनियों को दूसरी दुनिया का बता अपना पल्ला झाड़ लेता था। पर्यावरण जागरूकता, पर्यावरण प्रदूषण, पर्यावरण संरक्षण जैसे तमाम मुद्दों पर लिखने वाले लेख डराते थे। तब ऐसा लगता था शायद पर्यावरण में होने वाले बदलाव अभी कोसों दूर हैं। शायद हम इन परिवर्तनों से बचे रह जाएंगे लेकिन पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन उन खतरों की दस्तक देने लगे हैं। ऐसा लगता है कि यदि दुनिया ने पर्यावरण संरक्षण के लिए युद्वस्तर पर काम न किया तो मौसम के बदलाव की इस तूफानी रेल को रोकना असम्भव होगा।
प्रकृति के इस परिवर्तन को दुनिया के इतिहास में जब-जब देखा गया तब-तब सभ्यता का अन्त नजदीक रहा। भारत में सिन्धु सभ्यता इसका बड़ा उदाहरण है। जहां के लोग अत्यधिक आधुनिक तकनीक से लबरेज होने के बावजूद दुनिया की तत्कालीन विकसित सभ्यता को बचा नहीं पाए। क्या वातावरण में होता बदलाव फिर सभ्यता के विनाश का संकेत है?
इस वर्ष गर्मी का मौसम बेहद डरावना है। गर्मी से लोग बेहाल हैं। जिनके पास गर्मी से बचने के साधन हैं वो भी और साधनहीन लोग भी गर्मी की मार झेल रहे हैं। मौसम में होते इस बदलाव ने सबसे ज्यादा जानवरों, पक्षियों और पेड़-पौधों को परेशान करके रखा है। बहुत सारे आवारा कुत्तों के पागल होने की भी खबरें आ रही हैं। पक्षियों के मारे जाने की तस्वीरें विचलित करने वाली हैं। पेड़-पौधे सूख रहे हैं। जहां आमतौर पर पेड़-पौधें होने के कारण गर्मी का प्रभाव कम रहता था वहां इस वर्ष सारे रिकार्ड टूटतें जा रहे हैं।
प्रकृति का कहर
पर्यावरण में होने वाले बदलावों का सीधा असर मानव जीवन पर दिखाई देता है। पिछले दशकों में तेजी से यह परिवर्तन देखा जा सकता है। प्रकृति का कहर 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2017 में अमेरिका में आए अति विनाशक चक्रवात 'इरमा' और 'हार्वे', 2019 में अटलांटिक महासागर में उठे बेहद शक्तिशाली समुद्री तूफान 'डोरियन' , 2022 में यूरोप की अविश्वसनीय हीट वेव (जिसने 6000 से अधिक जानें ले ली), दिसंबर 2023 में दक्षिण भारत में भीषण तबाही मचाने वाला चक्रवाती तूफान मिचौंग आदि अनेक विनाशकारी आपदाएं मानव जीवन पर गंभीर प्रभाव डालती देखी जा सकती हैं।
दुनिया भर में तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रहा है, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण यह और भी बढ़ रहा है। एक सदी पहले कैलिफोर्निया के डेथ वैली (Death Valley) में 56.7 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया तथा हाल ही में दिल्ली के मुंगेशपुर में 52.9 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान दर्ज़ किया गया। यदि इसकी पुष्टि हो जाती है तो यह भारत में अब तक का सबसे ज्यादा रिकॉर्ड तापमान होगा। हालाँकि राजस्थान के फलौदी में वर्ष 2016 में सबसे अधिक तापमान 51°C दर्ज़ किया जा चुका है ।
जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में लू पर छपे एक शोध में बताया गया है कि तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ लू का जोखिम लगभग तीन गुना बढ़ जाएगा। हालांकि यदि तापमान की वृद्धि को 1.5 डिग्री पर रोक लिया जाता है तो खतरे को आधा कम किया जा सकता है यद्यपि एक बड़ी आबादी इसके चपेट में तब भी होगी । भारत जहाँ आज भी खेती के लिए किसान, मजदूर दिन- रात खुले आसमान के नीचे मेहनत करते हैं खतरा और बढ़ जाता है। जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में छपे शोध के अनुसार दुनिया भर में गर्मी से होने वाली 37 फीसदी मौतों के लिए तापमान में होने वाली वृद्धि जिम्मेदार है।
पर्यावरण से छेड़छाड का खामयाजा भुगतना होगा
प्रकृति अपना हिसाब बराबर रखती है। प्रकृति यदि देने में समानता रखती है तो वापस लेने में भी समान व्यवहार रखेगी। बस फर्क इतना है जो सम्पन्न है वह थोड़ा समय बाद इस प्रकोप का सामना करेगा। लेकिन पर्यावरण से छेड़छाड का खामयाजा सबको भुगतना होगा।
पर्यावरण हमें चारों ओर से घेरे रहने वाला आवरण है। जो हमारी हर तरह से सुरक्षा करता है। मानव और प्रकृति का आपस में गहरा तालमेल है। यदि यह संतुलन बिगड़ता है तो यह मानव सहित अन्य जीवों को भी प्रभावित करेगा। पृथ्वी पर, उसके संसाधनों पर सबका बराबर का अधिकार है। शुद्ध जल, वायु और जंगलों पर, जानवरों और पक्षियों, कीट-पतंगों का भी उतना ही अधिकार है जितना की हमारा। लेकिन विडम्बना यह है कि हम न जंगल खाली छोड़ रहे हैं और न जमीन। शहरों में प्रदूषण की भरमार है। हम सब इससे रोज दो चार होते हैं लेकिन यदि यह सब ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब गांव भी प्रदूषण की फैक्ट्री के रूप में जाने जाएगें। उत्तराखंड, हिमाचल, लद्दाख जैसे पहाडी़, हरे भरे खूबसूरत इलाकों पर नजर डालें तो वहां भी विकास ने विनाश की बिसाद बिछानी शुरू कर दी है।
जितने पेड़ लगाए जाते हैं, क्या वे पूरी तरह से सुरक्षित रह पाते हैं?
खेत-खलिहान, खुले मैदान, चारागाह, सब बड़ी-बड़ी इमारतों में तबदील होते जा रहे हैं। नदियां नाले का रूप ले रही है। दुनिया तीसरे विश्व के खतरे से निपटने की तैयारियां कर रही है। लेकिन प्रकृति के गर्भ में होती हलचल हमारी नींद गायब नहीं कर रही है। दुनिया भर के देश पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। करोड़ों की तादाद में वृक्षारोपण करते है। बड़ी-बड़ी संगोंष्ठियां होती हैं, सम्मेलन होते हैं लेकिन फिर भी धरती से पेड़ नदारत होते जा रहे हैं । साल दर साल धरती सूनी होती जा रही है। जितने पेड़ लगाये जाते हैं। क्या वे पूरी तरह से सुरक्षित रह पाते हैं? क्या वे सभी पौधे बडे़ पेड़ों के रूप में तबदील हो पाते हैं? हममें से कोई यह जानने की चिंता नहीं करते।
हम पेड़ लगाने भर से अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर लेते हैं। दुनिया की सबसे मूल्यवान वस्तु ’आक्सीजन’ पेड़ों से हमें निःशुल्क मिलती है। फिर भी हममें से ज्यादातर लोग कटते हुए जानदार पेड़ पर सवाल नहीं उठाते। हम पेड़ों की कराह को अनसुना कर देते हैं। जिसका खामियाजा एक दिन हमें ही उठाना पड़ेगा ।
पर्यावरण जो की सबसे मूल्यवान वस्तु के रूप में कुदरत ने हमको दिया है, निःशुल्क सेवा करने के लिए तत्पर है । लेकिन हम प्रकृति के इस वरदान को संरक्षित करने के लिए कितना तत्पर हैं विचारणीय है। घर की छोटी-मोटी चीजों के रखरखाव जैसे रोज पानी बचाने के लिए कोशिश, गीला- सूखा कचरे को अलग करने की कवायत, पक्षियों को दाना-पानी रखने की जिम्मेदारी, सड़क पर कचरा न फेंकने की हिदायत कितना पूरी करते हैं सोचना होगा ।
पर्यावरण संरक्षण के कार्य को सर्वोपरि प्राथमिकता की जरूरत
यकीनन दुनिया के विकसित देशों को हथियारों और तकनीक की होड़ ने अंधा- बहरा बना दिया है अन्यथा पर्यावरण संरक्षण के कार्य को सर्वोपरि प्राथमिकता दी जाती, न केवल 5 जून को ही पर्यावरण मुद्दों पर चर्चाएं हों। विकास की आधारशिला पर्यावरण संरक्षण के विश्वास के साथ रखी जाने की आवश्यकता है। हालांकि अभी भी समय रहते युद्ध स्तर पर काम किये गए तो पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को सफल बनाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील जनसंख्या को सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील समुदायों की सहायता करने की आवश्यकता है। सरकार और समाज को सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है क्योंकि पर्यावरण की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है।
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