मजा लेना हमारी जन्मजात प्रवृत्ति है, कोरोना काल में भी लोगों ने मजे लेने के मौके नहीं छोड़े
मजा लेने वालों के पास मुद्दों की कमी नहीं होती। उन्हें मजा लेने के भरपूर अवसर मिलते रहते हैं। कुछ लोगों का यह भाव रहता है कि कोई बीमारी या कोरोना हमें शिकंजे में ले ही नहीं सकता। हमारे पड़ोसी किसलिए हैं। हमें प्रताड़ित करने के लिए पुलिस और प्रशासन द्वारा सख्ती की जा रही है।
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कुछ लोगों में किसी भी परिस्थिति का मजा लेने की जन्मजात प्रवृत्ति होती है। खुशी का अवसर हो या गम का, लड़ाई का मसला हो या दोस्ती का, गप्प हो या गंभीर मसला, लोग मजा लेने का अवसर निकाल ही लेते हैं। वर्तमान दौर में सीमा पर सुरक्षा के सवाल पर बयानबाजी का सर्कस चल रहा है।
वैसे कोई भी मुद्दा हो, विषय हो, सुरक्षा का सवाल हो, बाढ़ हो या राहत कार्य, बयानबाजी का दौर चलता रहता है। जैसे बाढ़ आने की आशंका थी तो पहले से तैयारी क्यों नहीं की। यदि तैयारी की तो आधी -अधूरी क्यों की। हेलिकॉप्टर से भोजन के पैकेट क्यों नहीं गिराए, गिराए तो उसमें पूड़ी सब्जी क्यों रखी, राजमा-चावल क्यों नहीं रखे आदि बयानबाजी अनंत कथा की तरह चलती रहती है।
कुछ लोग बाढ़ देखने जाते हैं और विनाश का मजा लेते हैं। सूखा देखने जाने वाले और उसका मजा लेने वाले लोग भी हैं। लोग अवर्षा या कम वर्षा होने की स्थिति में सूखा तालाब, सूखा कुआं और खेत की दरकी जमीन देखने जाते हैं और मजा लेते हैं।
झगड़ा होते देख कुछ लोगों की बांछें खिल जाती हैं। उन्हें सूचना भर मिलनी चाहिए कि फलाने मोहल्ले या गली में झगड़ा हो गया है, वे उल्टा जूता रख कर मजा लेने के लिए दौड़ पड़ते हैं और वहां भीड़ लगा देते हैं। पूरे आनंद और भावविभोर होकर मजा लेने लगते हैं। झगड़े की आंच सुलगाने के लिए बीच-बीच में उकसाने वाली टिप्पणियां भी करते चलते हैं।
इससे कभी-कभी झगड़ा करने वाले यह कहते हुए कि हम तो बाद में निपट लेंगे, पहले इनसे निपट लें, कह कर टिप्पणियां करने और मजा लेने वालों पर हमला भी कर देते हैं। वहां से जैसे-तैसे निकल भागने के बाद भी वे अगले ऐसे ही किसी विवाद का इंतजार करने लगते हैं।
इसका उनकी मूलभूत प्रवृत्ति पर कोई असर नहीं पड़ता है। भले ही जान जोखिम में पड़ जाए लेकिन ऐसे लोग बाज नहीं आते। सांडों की लड़ाई देखने जाना भी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है। कस्बों-गांवों में आज भी जब सड़कों और गलियों में सांड लड़ते हैं तो यह दृश्य देखने के लिए मजमा लग जाता है। इसमें भी खतरा तो रहता है लेकिन मजा लेने वाले लोग खतरों से खेलने वाले खिलाड़ी होते हैं।
कुछ लोग तो मजा लेने के लिए दूसरे कस्बो-शहरों की यात्रा पर निकल पड़े...
कोरोना की वजह से देश में लॉकडाउन हुआ और कुछ इलाकों में कर्फ्यू भी लगा। लोग इस स्थिति का भी मजा लेने के लिए बैचेन रहे। वे निर्देश का पालन करने की बजाए कर्फ्यू देखने निकल पड़े। जब पुलिस की गाड़ी उनके इलाके में सड़कों पर आती तो वे अपने घरों में दुबक जाते और फिर उनके जाते ही अपनी शर्ट की कॉलर ऊंची करके निकल आते।
ऐसे लोगों के लिए हिदायतें और आदेशों को न मानने की भी जन्मजात प्रवृत्ति होती है। वे भीड़ लगा कर कोरोना के बारे में चर्चा करते रहे और ज्ञान बघारते रहे। विभिन्न टीवी चैनलों की तरह रहस्योदघाटन करते रहे और ब्रेकिंग न्यूज देते रहे। चूंकि कोरोना ने अभी मैदान नहीं छोड़ा है , इसलिए यह सिलसिला जारी है।
मजा लेने वालों के पास मुद्दों की कमी नहीं होती। उन्हें मजा लेने के भरपूर अवसर मिलते रहते हैं। कुछ लोगों का यह भाव रहता है कि कोई बीमारी या कोरोना हमें शिकंजे में ले ही नहीं सकता। हमारे पड़ोसी किसलिए हैं। हमें प्रताड़ित करने के लिए पुलिस और प्रशासन द्वारा सख्ती की जा रही है।
ऐसे लोगों ने लॉकडाउन की अवधि में घर से बिना वजह निकल कर पुलिस के डंडे खाए और इसके संस्मरण भी मजे लेकर सुनाए। फर्जी पास भी जुगाड़े और घूमने का मजा लेते रहे। इसका जुगाड़ नहीं हुआ तो दवाइयों की पुरानी पर्ची ही जेब में रख ली और सड़क पर उतर आए।
कुछ लोग तो मजा लेने के लिए दूसरे कस्बो-शहरों की यात्रा पर निकल पड़े। इस भाव के साथ कि हम तो मरेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे। इसी तरह ऐसे लोग लॉकडाउन के दौरान खाद्य वस्तुएं एकत्रित करने के लिए सक्रिय हो गए।
जिन लोगों ने कभी आलू, प्याज, आटा, नमक ,तेल, मसाले आदि का संग्रह नहीं किया, वे भी इनका बहुमूल्य वस्तुओं की तरह संग्रह करते रहे। इसके लिए जुगाड़ लगा कर न जाने कहां-कहां से सामान जुटाया और इसके लिए सिफारिशें तक लगवाईं।
जुटाया गया सामान भले ही खराब हो गया हो लेकिन दूसरों को खाद्य वस्तुओं के लिए परेशान होते देख कर मजा लेते रहे। ये लोग हर तरह की परिस्थिति में मजे लेते आए हैं, मजे लेते हैं और मजे लेते रहेंगे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।