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आपदा और मुसीबत: हमको भूकंप नहीं, हमारी हरकतें और मकान मारते हैं

Sun, 13 Nov 2022 02:07 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sun, 13 Nov 2022 02:07 PM IST
सार

भूकंप की संवेदनशीलता के अनुसार भारत को 5 जोनों में बांटा गया है। इनमें सर्वाधिक संवेदनशील जोन ’पांच’ माना जाता है जिसमें सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र का सम्पूर्ण भारतीय हिमालय क्षेत्र है। वैसे देखा जाए तो अफगानिस्तान से लेकर भूटान तक का संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र भारतीय उप महाद्वीप के उत्तर में यूरेशियन प्लेट के टकराने से भूगर्वीय हलचलों के कारण संवेदनशील है।

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उत्तराखंड के मकान - फोटो : JaySingh Rawat

विस्तार

भूकंप के झटकों ने उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक को दहला दिया है। लोगों को बड़े भूचालों का डर सताने लगा है, जबकि भूचाल कभी किसी को नहीं मारता है। हमको मारते वह भवन हैं जिसे हम अपने आश्रय के लिए या सुरक्षित रहने के लिए बनाते हैं। फिर भी जो मकान मारक साबित होते हैं हम उसके लिए विलाप करते हैं और सारा दोष भूकंप पर डाल देते हैं। अगर हम प्रकृति के साथ जीना सीख लें तो क्या भूचाल या क्या बाढ़? हमें कोई भी आपदा नहीं मार सकती।

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छोटे भूकंप अधिक खतरनाक साबित हुए

भूकंप, बाढ़, हिमस्खलन, भूस्खलन या आकाशीय बिजली गिरने जैसी घटनाएं प्राकृतिक होती हैं और प्रकृति के नियमों के अनुसार होती रहती हैं। इन प्राकृतिक घटनाओं को हम अपनी लापरवाही और अज्ञान के कारण आपदा बनाते हैं।

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30 सितंबर 1993 को महाराष्ट्र के लातूर क्षेत्र में 6.2 तीव्रता का भूकंप आया, इसमें लगभग 10 हजार लोग मारे जाते हैं। 30 हजार से अधिक लोगों के घायल होने के साथ ही 1.4 लाख लोग बेघर हो जाते हैं। जबकि 28 मार्च 1999 को चमोली में लातूर से भी तेज 6.8 मैग्नीट्यूट का भूकंप आता है तो उसमें केवल 103 लोगों की जानें जाती हैं और 50 हजार मकान क्षति ग्रस्त होते हैं। 20 अक्तूबर 1991 के उत्तरकाशी के 6.6 परिमाण के भूकंप में 786 लोग मारे जाते हैं और 42 हजार मकान क्षतिग्रस्त होते हैं। 
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इसी तरह जब 26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज में रिक्टर पैमान पर 7.7 परिमाण का भूकंप आता है तो उसमें कम से कम 20 हजार लोग मारे जाते हैं और 1.67 लाख लोग घायल होने के साथ ही 4 लाख लोग बेघर हो जाते हैं। 11 मार्च 2011 को जापान के टोहोकू क्षेत्र में रिक्टर पैमाने पर 9.00 अंक परिमाण का प्रलयकारी भूचाल आने के साथ ही विनाशकारी सुनामी भी आबादी क्षेत्र को ताबाह कर जाती है, फिर भी वहां केवल 15,891 लोग मारे जाते हैं। इस दुहरी विनाशलीला के साथ तीसरा संकट परमाणु संयंत्रों के क्षतिग्रस्त होने से विकीर्ण का भी था। अगर ऐसा तिहरा संकट भारत जैसे देश में आता तो करोड़ों लोग जान गंवा बैठते।

25 अप्रैल 2015 नेपाल में 7.8 परिमाण का भूकंप आता है जिसमें लगभग 9 हजार लोग मारे जाते हैं और 21 हजार से अधिक घायल हो जाते हैं। वहां सबसे अधिक तबाही काठमांडू में हुई, क्योंकि देश की राजधानी होने के नाते वहां आबादी ज्यादा घनी और इमारतें भी औसतन ज्यादा और विशलकाय हैं।


जापान के लोग सीख गए भूकंपों के साथ जीना

अगर आप जापान में भूकंपों का इतिहास टटोलें तो वहां बड़े से बड़े भूचाल भी मानवीय हौसले को डिगा नहीं पाए। जापान में 26 नवम्बर सन् 84 (जूलियन कैलेंडर) से लेकर अब तक रिक्टर पैमाने पर 7 अंक से लेकर 9 परिमाण तक के दर्जनों भूचाल आ चुके हैं। आपदा प्रबंधकों के अनुसार इस परिमाण के भूकंप काफी विनाशकारी होते हैं।
 

खासकर रिक्टर पैमाने पर 8 या उससे बड़े परिमाण के भूकंपों को भयंकर और 9 तथा उससे अधिक के भूचालों को तो प्रलयंकारी माना ही जाता है, फिर भी जपान में जनहानि बहुत कम होती है। सन् 1952 से लेकर अब तक जापान में रिक्टर पैमाने पर 7 से लेकर 9 परिमाण तक के 31 बड़े भूचाल आ चुके हैं। इसके अलावा 4 या उससे कम परिमाण के भूकंप तो वहां लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। 


इन भूकंपों में से टोहोकू के भूकंप और सुनामी के अलावा वहां कोई बड़ी मानवीय त्रासदी नहीं हुई। वहां 25 दिसंबर 2003 को होक्कैडो में 8.3 परिमाण का भयंकर भूचाल आया फिर भी उसमें मरने वालों की संख्या केवल एक थी। इतने बड़े परिमाणों वाले 7 भूकंप ऐसे थे जिनमें एक भी जान नहीं गई।

जाहिर है कि जापान के लोग भूकंप ही नहीं बल्कि प्रकृति के कोपों के साथ जीना सीख गए हैं। वहां के लोगों ने प्रकृति को अपने हिसाब से ढालने का दुस्साहस करने के बजाय स्वयं को प्रकृति के अनुसार ढाल दिया है।

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देश में भूंकप के जोखिम वाले क्षेत्रों का वर्गीकरण - फोटो : JaySingh Rawat

भूकंप का सर्वाधिक खतरा घनी आबादी को

भूकंप की संवेदनशीलता के अनुसार भारत को 5 जोनों में बांटा गया है। इनमें सर्वाधिक संवेदनशील जोन ’पांच’ माना जाता है जिसमें सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र का सम्पूर्ण भारतीय हिमालय क्षेत्र है। वैसे देखा जाए तो अफगानिस्तान से लेकर भूटान तक का संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र भारतीय उप महाद्वीप के उत्तर में यूरेशियन प्लेट के टकराने से भूगर्वीय हलचलों के कारण संवेदनशील है।

इनके अलावा रन आफ कछ भी इसी जोन में शामिल है। लेकिन इतिहास बताता है कि भूचालों से जितना नुकसान कम संवेदनशील ’जोन चार’ में होता है, उतना जोन पांच में नहीं होता, क्योंकि जोन पांच वाले हिमालयी क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है, जबकि जोन चार और उससे कम संवेदनशील क्षेत्रों का जनसंख्या का घनत्व काफी अधिक है। 

त्रिपुरा को छोड़कर ज्यादातर हिमालयी राज्यों का जनसंख्या घनत्व बहुत कम है। अरुणाचल प्रदेश का जनसंख्या घनत्व तो 17 और मीजोरम का 52 प्रति वर्गकिमी है, जबकि दिल्ली का जनसंख्या घनत्व 11,297 है और दिल्ली को भी भूकंप के गंभीर खतरे की जद में माना जाता है।

उत्तराखंड में ही उच्च हिमालयी क्षेत्र जिला चमोली का जनसंख्या घनत्व 49 और उत्तरकाशी का 41 है, वहीं मैदानी हरिद्वार का 817 और उधमसिंहनगर का 648 व्यक्ति प्रति वर्गकिमी है। अगर कभी काठमांडो की जैसी भूकंप आपदा आती है तो भूकंपीय दृष्टि से अति संवेदनशील सीमांत जिलों से अधिक नुकसान मैदानी जिलों में हो सकता है।


मकानों की परम्परागत शैली त्यागने से बढ़ा खतरा

यही नहीं हिमालयी क्षेत्र में प्रायः लोगों के घर हजारों सालों के अनुभवों के आधार पर परंपरागत स्थापत्य कला के अनुसार बने होते थे, इसलिए यहां जनहानि भी काफी कम होती थी। लेकिन अब पहाड़ के लोग मैदानी क्षेत्र की तरह ही मकान बना कर खतरा बढ़ा रहे हैं। सन् 1991 के उत्तरकाशी भूकंप में हजारों मकान ध्वस्त हो गए मगर हजार साल से खड़ा कोटी बनाल का बहुमंजिला मकान ज्यों का त्यों आज भी खड़ा है। वहां आज भी ऐसे मकान हजारों की संख्या में हैं।

देखा जाए तो हमने अभी लातूर तथा भुज की भूकंपीय आपदा से सबक नहीं सीखा। सिन्धु से लेकर ब्रह्मपुत्र के बीच के सभी राज्यों में अब परंपरागत भवन निर्माण शिल्प के बजाय मैदानी इलाकों की नकल से सीमेंट कंकरीट के मकान बन रहे हैं, जो कि भूकंपीय दृष्टि से बेहद खतरनाक हैं। हिमालयी गावों में सीमेंट कंकरीट के जंगल उग गए हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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