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Delhi Election Results 2020: जनता समझ रही है और भाजपा की हार बहुत कुछ कह रही है

Tue, 11 Feb 2020 01:35 PM IST
Satish Alia सतीश एलिया
Updated Tue, 11 Feb 2020 01:35 PM IST
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delhi election results 2020 why bjp lost delhi elections
भाजपा ने दिल्ली में अपने पारंपरिक वोटर्स को दोबारा हासिल किया है। - फोटो : अमर उजाला

जैसा कि एग्जिट पोल्स बता रहे थे, करीब-करीब वही नतीजे ईवीएम ने भी बाहर ला दिए हैं। आम आदमी पार्टी ईवीएम को सर्वाधिक लांछित करती रही है और उसी ईवीएम ने एक बार फिर उसे दिल्ली की सत्ता का प्रमाण-पत्र दे दिया है। लगातार दो लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सभी सातों सीट जीतने वाली भाजपा को राज्य का चुनाव देश के चुनाव की तरह लड़ने का खामियाजा एक दफा फिर भुगताना पड़ा है।

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हालांकि पांच साल पहले महज तीन सीट जीतने वाली भाजपा ने करीब छह गुना सीट जीतने और करीब आठ से दस फीसद वोट वापस हासिल करके अपना पारंपरिक या लोकसभा चुनावों में जीत दिलाने वाला वोट बैंक आम आदमी पार्टी से वापस ले लिया है, वह चाहे तो इससे संतोष करे या अपनी गलतियों से सबक लेकर देश के बाकी राज्यों में विधानसभा चुनावों में न दोहराए।  
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हार की वजहें जिस पर भाजपा को सोचना होगा 
इसमें एक प्रमुख सबक यह भी है कि चेहरा विहीनता भाजपा को नुकसान पहुंचाती है और यह भी कि प्रदेश स्तर पर नेतृत्व विकसित नहीं करना या नहीं उभरने देना या बार-बार बदलकर चेहरा विहीनता तक पहूुंचना उसके लिए नुकसानदेह है।
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कांग्रेस के लिए यह चुनाव पांच साल में शून्य से चलकर शून्य पर ही बने रहने का है। देश के दिल दिल्ली में जहां 2015 तक उसकी लगातार पंद्रह साल तक सरकार थी, यह हालात गहरे आत्मचिंतन की मांग करती है और देश की राजनीति में भाजपा के बरअक्स बराबर खड़ी होने या भाजपा विरोधी किसी राष्ट्रीय गठबंधन का नेतृत्व की मंशा को खारिज करते हैं।

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आम आदमी पार्टी ने काम पर वोट मांगे - फोटो : फाइल फोटो

आम आदमी पार्टी की वास्तविक स्थापना का सर्टिफिकेट
दिल्ली चुनाव के नतीजे जो आए हैं, उन्हें लेकर न केवल दिल्ली वाले बल्कि देश के अन्य राज्यों के लोग भी यह मानकर चल रहे थे कि केजरीवाल सरकार फिर आ सकती है, सिवाय भाजपा के राष्ट्रवाद को अचूक मानने वाले उसके नेताओं के।

इसकी वजह केजरीवाल सरकार के कामकाज और उसके आधार पर चुनाव लड़ने की मंशा को माना जा रहा था। भाजपा ने इस चुनाव को गंभीरता से लेने में खासी देर की और इसके बाद उसने शाहीनबाग के बहाने इसे राष्ट्रवाद की शान पर चढ़ाने का प्रयास किया। हालांकि वह यह न करती तो शायद भाजपा दिल्ली के इस चुनाव में भी 2015 के हालात में पहुंच सकती थी।

मुफ्त बनाम शाहीन बाग
केजरीवाल सरकार की इस जीत में उसकी पांच साल की सरकार के आखिरी साल में मुफ्त योजनाओं का सर्वाधिक प्रभाव नजर आता है, क्योंकि इस देश में राज्यों के विधानसभा चुनाव में मुफ्त वाली और कर्ज माफी वाली घोषणाएं दलों को सीधा लाभ पहुंचाती रही हैं। इसमें दक्षिण में तमिलनाडु से लेकर तेलंगाना तक के चुनावों को देख लीजिए या फिर 2018 में मप्र, छग और राजस्थान के किसानों के कर्ज माफी के एलान से कांग्रेस के पक्ष में आए नतीजे को देख लीजिए।

देखना यह होगा कि कर्ज माफी लागू करने और मुफ्त योजनाओं से उन राज्य सरकारों के बजट और अर्थशास्त्र को किस तरह प्रभावित किया है। केजरीवाल सरकार की मुफ्त योजनाएं कितने दिन तक और कैसे चलेंगी, उससे राज्य की माली हालत पर क्या असर होगा और केंद्र राज्य के बीच क्या टकराव होंगे? 

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अरविंद केजरीवाल का मोदी पर कुछ ना बोलना एक रणनीति थी। - फोटो : Social Media

भाजपा का वोट बैंक लौटता दिख रहा 
इसे शाहीन बाग का असर कहिए या भाजपा के राष्ट्रवाद के प्रचार का कि दिल्ली में भाजपा का वोट बैंक इस चुनाव में 2015 के मुकाबले करीब आठ फीसदी बढ़ा है यानी भाजपा के कोर वोट बैंक की घर वापसी हुई है। दूसरी तरफ कांग्रेस का वोट बैंक आम आदमी पार्टी में जाकर पांच साल बाद भी तनिक भी नहीं लौटा यानी दिल्ली में एक तरह से एक बार फिर दो दलीय राजनीति की स्थापना हो गई है।                                                                   
जीत के बावजूद केजरीवाल ने सेक्युलर का नैरेटिव बदलने का मौका गवां दिया 
आम आदमी की भारी जीत और केजरीवाल के फिर मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ होने के बावजूद यह चुनाव सेक्युलर की सियासी परिभाषा को पटरी पर लाने का चुनाव नहीं बन सका, अलबत्ता बन सकता था।

भाजपा केजरीवाल को लगातार शाहीन बाग पर दो टूक बोलने के लिए खींचती रही, लेकिन वे नहीं गए। अलबत्ता उनके डिप्टी मनीष सिसौदिया ने शाहीन बाग आंदोलन का समर्थन करने की बात कही थी। इस देश में सेक्युलर होने का सियासी रूप से मतलब यही होता रहा है कि सेक्युलर मतलब प्रो- मुस्लिम। केजरीवाल इससे बचते रहे लेकिन आखिर में वे हनुमान चालीसा पढ़कर भाजपा के आरोप को नकारने उतर आए।

असल में भाजपा ने इसी लाइन पर कांग्रेस को और उनके नेताओं को मंदिर-मंदिर भटकने और जनेऊ दिखाने पर मजबूर कर दिया था। केजरीवाल औरउनकी पार्टी भी न केवल हनुमान चालीसा पाठ पर आ गई बल्कि वह नतीजे को भी मंगलवार और लंका आदि से जोड़कर खुशी जता रहे हैं।

केजरीवाल केवल काम के आधार पर ही जीतने के लिए अड़े रहते तब भी जीत ही जाते, लेकिन वे इसे भटक गए, यह भाजपा के लिए संतोष का विषय हो सकता है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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