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संस्कृति के पन्नों से: सूर्योपासना से राजा का इलाज
सार
जो श्रद्धा और संयम से सूर्योपासना की इस कथा का श्रवण करता है, उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यह भगवान सूर्य ने यमराज को उपदेश रूप में कहा था, किंतु पृथ्वी पर इसका प्रचार महर्षि वेदव्यास द्वारा हुआ है।
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- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्यदेश में भद्रेश्वर नाम के एक प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। वह अत्यंत धर्मात्मा और व्रतशील थे। उन्होंने तपस्या और व्रतों से अपने जीवन को पवित्र बनाया था। उनका आचरण सदा न्याय के अनुसार होता था। वे अत्यंत शांत और दयालु स्वभाव वाले थे।
एक समय की बात है, राजा भद्रेश्वर के बाएं हाथ में श्वेत कुष्ठ रोग हो गया, जो धीरे-धीरे बढ़ने लगा। अनेक वैद्यों ने उपचार किया, परंतु औषधियों से रोग मिटने के स्थान पर और अधिक स्पष्ट दिखने लगा। यह देखकर राजा को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने मंत्रियों को बुलाकर कहा, 'मेरे शरीर में पाप का ऐसा चिह्न प्रकट हो गया है, जिसकी लोक में निंदा होती है। यह मेरे लिए असह्य हो चुका है। इसलिए मैं अपने राज्य का परित्याग करना चाहता हूं।' यह सुनकर मंत्रियों ने कहा, 'महाराज! यदि आप ही राज्य का परित्याग कर देंगे, तो प्रजा का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। इसलिए आपको ऐसा विचार नहीं करना चाहिए। प्रभो! इस रोग को दूर करने का एक उपाय है।'
राजा के पूछने पर मंत्रियों ने कहा, 'राजन! आप भगवान सूर्य की आराधना कीजिए। वही इस भयंकर रोग से आपको मुक्त कर सकते हैं। आप अपने राज्य में ही रहकर श्रद्धा और नियमपूर्वक सूर्यदेव की उपासना करें। इससे आप पाप से मुक्त हो जाएंगे।'
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उसी दिन से राजा ने सूर्यदेव की भक्ति आरंभ कर दी। वह प्रतिदिन विधिपूर्वक सूर्य की पूजा करते थे। मंत्रपाठ, नैवेद्य, फल, अर्घ्य, अक्षत, जपापुष्प, मदार के पत्ते, लाल चंदन, कुमकुम, सिंदूर, केले के पत्ते और फलों से वह सूर्यदेव को प्रसन्न करते रहे। गूलर के पात्र में अर्घ्य भरकर वह प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक सूर्य को अर्पित करते थे। अर्घ्य देते समय राजा, स्वयं मंत्रियों और पुरोहितों के साथ सूर्य के सम्मुख खड़े रहते थे। उनके साथ आचार्य, रानियां, अन्तःपुर के रक्षक, उनकी पत्नियां, दास-दासियां और नगर के अन्य लोग भी उपस्थित रहते थे। सभी लोग एक साथ अर्घ्य अर्पण करते और सूर्यदेव का स्मरण करते। सूर्यदेव से संबद्ध जितने भी व्रत और नियम थे, राजा ने उन्हें पूरी एकाग्रता और श्रद्धा से संपन्न किया।
इस प्रकार निरंतर एक वर्ष तक उपासना करने पर राजा का कुष्ठ रोग पूर्ण रूप से नष्ट हो गया। उनका हाथ पहले की भांति सुंदर हो गया। रोग से मुक्त होने के बाद राजा ने निश्चय किया कि संपूर्ण राज्य में प्रभातकाल सूर्यदेव की पूजा और व्रत का प्रचार किया जाए। उन्होंने अपने राज्य के सभी लोगों को सूर्योपासना के लिए प्रेरित किया। लोग कभी हविष्यान्न खाकर और कभी निराहार रहकर सूर्यदेव की पूजा करने लगे। इस प्रकार जब संपूर्ण प्रजा द्वारा भगवान सूर्य की पूजा होने लगी, तो सूर्यदेव अत्यंत प्रसन्न हुए। वह राजा भद्रेश्वर के समक्ष प्रकट होकर बोले, 'राजन! तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, उसे वरदान के रूप में मांग लो। मैं तुम्हारे तथा तुम्हारी प्रजा के कल्याण के लिए उपस्थित हुआ हूं।'
राजा ने विनम्रता से कहा, 'प्रभु! आप सबको नेत्र प्रदान करने वाले हैं। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो ऐसी कृपा कीजिए कि हम सब लोग आपके समीप रहकर सदा सुखी रहें।'
सूर्यदेव बोले, 'राजन! तुम्हारे मंत्री, पुरोहित, रानियां, परिवार के अन्य लोग तथा नगरवासी सभी शुद्ध होकर कल्पपर्यंत मेरे रमणीय धाम में निवास करेंगे।' फिर भगवान सूर्य अंतर्धान हो गए। इसके बाद राजा भद्रेश्वर अपने समस्त पुरवासियों सहित दिव्यलोक में पहुंच गए। वहां के कीट-पतंग, पशु-पक्षी और अन्य जीव भी अपने-अपने परिवार सहित स्वर्ग को प्राप्त हुए। पद्म पुराण के अनुसार, जो मनुष्य पवित्र मन से इस कथा का पाठ करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और इस पृथ्वी पर रुद्र के समान उसकी पूजा होती है। जो श्रद्धा और संयम से इसका श्रवण करता है, उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यह अत्यंत गोपनीय रहस्य है, जो भगवान सूर्य ने यमराज को उपदेश रूप में कहा था, किंतु पृथ्वी पर इसका प्रचार महर्षि वेदव्यास द्वारा हुआ है।
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एक समय की बात है, राजा भद्रेश्वर के बाएं हाथ में श्वेत कुष्ठ रोग हो गया, जो धीरे-धीरे बढ़ने लगा। अनेक वैद्यों ने उपचार किया, परंतु औषधियों से रोग मिटने के स्थान पर और अधिक स्पष्ट दिखने लगा। यह देखकर राजा को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने मंत्रियों को बुलाकर कहा, 'मेरे शरीर में पाप का ऐसा चिह्न प्रकट हो गया है, जिसकी लोक में निंदा होती है। यह मेरे लिए असह्य हो चुका है। इसलिए मैं अपने राज्य का परित्याग करना चाहता हूं।' यह सुनकर मंत्रियों ने कहा, 'महाराज! यदि आप ही राज्य का परित्याग कर देंगे, तो प्रजा का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। इसलिए आपको ऐसा विचार नहीं करना चाहिए। प्रभो! इस रोग को दूर करने का एक उपाय है।'
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राजा के पूछने पर मंत्रियों ने कहा, 'राजन! आप भगवान सूर्य की आराधना कीजिए। वही इस भयंकर रोग से आपको मुक्त कर सकते हैं। आप अपने राज्य में ही रहकर श्रद्धा और नियमपूर्वक सूर्यदेव की उपासना करें। इससे आप पाप से मुक्त हो जाएंगे।'
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उसी दिन से राजा ने सूर्यदेव की भक्ति आरंभ कर दी। वह प्रतिदिन विधिपूर्वक सूर्य की पूजा करते थे। मंत्रपाठ, नैवेद्य, फल, अर्घ्य, अक्षत, जपापुष्प, मदार के पत्ते, लाल चंदन, कुमकुम, सिंदूर, केले के पत्ते और फलों से वह सूर्यदेव को प्रसन्न करते रहे। गूलर के पात्र में अर्घ्य भरकर वह प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक सूर्य को अर्पित करते थे। अर्घ्य देते समय राजा, स्वयं मंत्रियों और पुरोहितों के साथ सूर्य के सम्मुख खड़े रहते थे। उनके साथ आचार्य, रानियां, अन्तःपुर के रक्षक, उनकी पत्नियां, दास-दासियां और नगर के अन्य लोग भी उपस्थित रहते थे। सभी लोग एक साथ अर्घ्य अर्पण करते और सूर्यदेव का स्मरण करते। सूर्यदेव से संबद्ध जितने भी व्रत और नियम थे, राजा ने उन्हें पूरी एकाग्रता और श्रद्धा से संपन्न किया।
इस प्रकार निरंतर एक वर्ष तक उपासना करने पर राजा का कुष्ठ रोग पूर्ण रूप से नष्ट हो गया। उनका हाथ पहले की भांति सुंदर हो गया। रोग से मुक्त होने के बाद राजा ने निश्चय किया कि संपूर्ण राज्य में प्रभातकाल सूर्यदेव की पूजा और व्रत का प्रचार किया जाए। उन्होंने अपने राज्य के सभी लोगों को सूर्योपासना के लिए प्रेरित किया। लोग कभी हविष्यान्न खाकर और कभी निराहार रहकर सूर्यदेव की पूजा करने लगे। इस प्रकार जब संपूर्ण प्रजा द्वारा भगवान सूर्य की पूजा होने लगी, तो सूर्यदेव अत्यंत प्रसन्न हुए। वह राजा भद्रेश्वर के समक्ष प्रकट होकर बोले, 'राजन! तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, उसे वरदान के रूप में मांग लो। मैं तुम्हारे तथा तुम्हारी प्रजा के कल्याण के लिए उपस्थित हुआ हूं।'
राजा ने विनम्रता से कहा, 'प्रभु! आप सबको नेत्र प्रदान करने वाले हैं। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो ऐसी कृपा कीजिए कि हम सब लोग आपके समीप रहकर सदा सुखी रहें।'
सूर्यदेव बोले, 'राजन! तुम्हारे मंत्री, पुरोहित, रानियां, परिवार के अन्य लोग तथा नगरवासी सभी शुद्ध होकर कल्पपर्यंत मेरे रमणीय धाम में निवास करेंगे।' फिर भगवान सूर्य अंतर्धान हो गए। इसके बाद राजा भद्रेश्वर अपने समस्त पुरवासियों सहित दिव्यलोक में पहुंच गए। वहां के कीट-पतंग, पशु-पक्षी और अन्य जीव भी अपने-अपने परिवार सहित स्वर्ग को प्राप्त हुए। पद्म पुराण के अनुसार, जो मनुष्य पवित्र मन से इस कथा का पाठ करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और इस पृथ्वी पर रुद्र के समान उसकी पूजा होती है। जो श्रद्धा और संयम से इसका श्रवण करता है, उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यह अत्यंत गोपनीय रहस्य है, जो भगवान सूर्य ने यमराज को उपदेश रूप में कहा था, किंतु पृथ्वी पर इसका प्रचार महर्षि वेदव्यास द्वारा हुआ है।