दुष्कर्म और न्यायालय: महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में देरी से न्याय और राष्ट्रपति की संवेदनशीलता
राष्ट्रपति ने आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है। उनके इस भाषण को अजमेर के चर्चित छात्राओं के ब्लैकमेल कर रेप करने की घटना से जोड़ दें तो स्थिति उससे भी भयावह दिखती है, जिस ओर राष्ट्रपति जी का इशारा है।
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जब रेप जैसे मामलों में तत्काल न्याय नहीं मिलता तो लोगों का भरोसा उठ जाता है। अदालतों में तारीख पर तारीख की संस्कृति को बदलने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना जरूरी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ये बातें न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह में कहीं। सुप्रीम कोर्ट की 75 वीं वर्षगांठ पर नई दिल्ली में इसका आयोजन किया गया था। उन्होंने कहा कि जब रेप जैसे मामलों में कोर्ट का फैसला एक पीढ़ी गुजर जाने के बाद आता है, तो आम आदमी को लगता है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई संवेदनशीलता नहीं बची है।
राष्ट्रपति ने आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है। उनके इस भाषण को अजमेर के चर्चित छात्राओं के ब्लैकमेल कर रेप करने की घटना से जोड़ दें तो स्थिति उससे भी भयावह दिखती है, जिस ओर राष्ट्रपति जी का इशारा है। अजमेर में करीब 34 वर्ष पूर्व 100 से अधिक स्कूली छात्राओं से ब्लैकमेल कर दुष्कर्म किया जाता था। कहते हैं इसमें अजमेर शरीफ दरगाह कमेटी से जुड़े कई लोगों के नाम भी आए थे। इसलिए पुलिस ने पहले रुचि नहीं ली। आंदोलन के बाद केस दर्ज हुए। 32 वर्ष बाद, अभी एक माह पूर्व उसका फैसला वहां की अदालत ने सुनाया।
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यह स्वाभाविक सवाल सबके मन में उठेगा की 32 वर्षों तक आखिर कोर्ट क्या करता रहा? कोर्ट के फैसले को क्या न्याय कह सकते हैं? यह तो न्याय का उपहास है। उन पीड़ित बच्चियों का उपहास है। यह क्यों न माना जाए की फैसला देने में विलंब करके प्रभावशाली दुष्कर्मियों को संरक्षण दिया गया? रेप समेत सभी केसों में यही स्थिति है। अदालतें सिर्फ तारीख पर तारीख देती हैं। उन्हें इसमें जरा भी लज्जा महसूस नहीं होती। मुख्य न्यायाधीश से लेकर निचली अदालतों के जज तक पेंडिंग केसों का रोना रोते रहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि केसों के पेंडिंग होने के लिए जजों की कार्यप्रणाली ही जिम्मेवार है। मामूली केसों में भी लंबे लंबे डेट दिए जाते हैं। जानबूझ कर केसों को लटकाए रखा जाता है।
देश की विभिन्न अदालतों में अभी 5 करोड़ से अधिक मुकदमें पेंडिंग हैं। खेद के साथ कहना पड़ता है कि इसके लिए सिर्फ अदालतों में बैठे हाकिम जिम्मेवार हैं। रेप और हत्या जैसे गंभीर अपराधों पर भी अदालतें गंभीर नहीं होती। यही वजह है कि अजमेर रेप कांड में 32 साल बाद सजा सुनाई गई। चर्चित निर्भय केस में अपराधी को 12 वर्ष बाद फांसी दी जा सकी।
देश में रेप की बढ़ती घटनाओं के पीछे देरी से सजा मिलना भी एक बड़ी वजह है। दुष्कर्मी जानता है की वह मुकदमें को जितने साल चाहे लंबा खिंच सकता है। इस बीच पीड़ित को डरा धमकाकर केस को कमजोर कर दिया जाता है और अन्ततः दुष्कर्मी बरी हो जाता है। कोर्ट की सुस्ती से अपराधियों का हौसला बढ़ता है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। साथ ही कानून का डर भी खत्म हो जाता है। NCRB के मुताबिक देश में प्रति 16 मिनट पर एक रेप और हर घंटे महिलाओं के विरुद्ध 50 अपराधिक घटनाएं हो रही हैं।
- हर दिन देश में 86 रेप रिपोर्ट होते हैं।
- 63 प्रतिशत रेप दर्ज नहीं होते।
- 10 फीसदी रेप अवयस्क से होते हैं।
- 89 फीसदी मामलों में रेपिस्ट पहचान का होता है।
रेप केस में 2 माह के अंदर जांच पूरी कर लेनी है। लेकिन पुलिस ऐसा नहीं करती। निर्भया केस फास्ट ट्रैक कोर्ट में चला तब भी दोषियों को फांसी देने में 12 साल लगे।इस आलोक में यह क्यों न माना जाए की आज अदालतें गुनहगारों के साथ खड़ी हैं, पीड़ितों के साथ नहीं? किसी भी सभ्य समाज के लिए यह शर्मनाक स्थिति है।
क्या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बातें न्यायाधीशों की अंतरात्मा को जगा पाएंगी? क्या यह उम्मीद की जाए की अदालतों की तारीख पर तारीख वाली कार्यशैली में सुधार होगा? रेप और हत्या के मुकदमों में एक साल के अंदर फैसला आएगा? या फिर इस कान से सुना उस कान से निकल जाएगा? महामहिम राष्ट्रपति जी की तरह देश के लाखो पीड़ित-शोषित आपकी ओर बहुत उम्मीद से देख रहे हैं मीलॉर्ड, कुछ तो कीजिए! सिर्फ नया झंडा और नया प्रतीक चिन्ह धारण कर लेने से कुछ नहीं होगा जबतक कार्य प्रणाली नई नहीं होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।