कोरोना के दुष्प्रभाव: क्या इस महामारी ने हमारी सामाजिकता छीन ली?
कोरोना महामारी ने हमारी सामाजिकता पर प्रहार किया है। हमारी आपसदारी को चोटिल किया है। तकरीबन डेढ़ साल से ज्यादा का समय हो रहा है जब ना त्योहारों में मिल पाए हैं ना किसी के गम में शरीक हो पाएं हैं।
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ऑक्सीजन के सहारे टिकी अनगिनत सांसें और कोरोना के शिकार हुए लोगों की लाशों के अम्बार के बीच हमें इस वैश्विक महामारी का विनाशकारी प्रभाव केवल मानव जीवन और उसके स्वास्थ्य के साथ ही अर्थव्यवस्था तथा नागरिक असुविधाओं और कष्टों पर ही नजर आ रहा है। जबकि इस महामारी ने हमारा सदियों के अनुभवों और आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित सामाजिक तानाबाना और व्यवहार भी उतना ही नुकसान पहुंचा दिया है।
महामारी से बचने के लिए बनाई गई सामाजिक दूरियों ने न केवल मित्रों और रिश्तेदारों को दूर कर दिया बल्कि माता-पिता और पुत्र-पुत्रियों के बीच तथा भाई-बहनों के बीच भी खौफ तथा अलगाव की दीवार खड़ी कर दी है। असीमित विश्व की सीमाएं सिमट कर हमारे दरवाजे तक आ गई हैं।
महामारी से सामाजिक रिश्तों को अपूर्णीय क्षति
सोशल डिस्टेंसिंग से बढ़ी रिश्तों में दूरियां धरती पर सबसे ताकतवर मानव शत्रु साबित हो रहे कोरोना पर भी मानव जल्दी ही विजय पा लेगा। लेकिन संकट से जूझ रही मानवता के जेहन में कोरोना के बाद की दुनिया और उसकी नयी व्यवस्थाओं के प्रति अभी से जिज्ञासा उत्पन्न होने के साथ ही एक सवाल यह भी उठ रहा है कि इस महामारी ने हमारे सामाजिक रिश्तों को जो अपूर्णीय क्षति पहुंचाई है, उसकी भरपाई कैसे होगी और संकट के बाद का समाज कैसा होगा? प्रकृति की इस मार के आगे फिलहाल विज्ञान भी लाचार है, इसलिए सोशल डिस्टेंसिंग के सिद्धांत को लागू किया जा रहा है।
इस अलगाव के कारण मानवता उस दिशा में बढ़ रही है जहां पर सीमाएं हमारे घरों के दरवाजों तक आ गई हैं। इंसानों की प्रकृति बीमारों के नजदीक जाने और उस पर दया प्रकट करने की रही है, लेकिन इस कोरोना वायरस ने इंसानों की इस सबसे अच्छी प्रवृति पर भी हमला कर दिया है।
खुशी और गम में भी लोग पास नहीं आ रहे लोग पहले खुशी और गम के मौकों पर इकट्ठे हो ही जाते थे। इन दोनों ही अवसरों पर देश विदेश में रहने वाले रिश्तेदार एकत्र हो कर खुशी और गम के भागीदार बनते थे। आज कोरोना मरीजों की कुशल क्षेम जानने के लिए मरीज के पास जाना तो रहा दूर उसकी मौत हो जाने पर भी करीबी लोग मृतक के शव के पास नहीं जा रहे हैं।
शव के पास जाना तो रहा दूर गमी के मौके पर निकट रिश्तेदार भी मृतक के परिवार को सान्त्वना देने नहीं जा रहे हैं। डर के मारे लोग मृतक के घर के पास तक नहीं फटक रहे हैं।
मृतक का दुखी परिवार स्वयं को अकेला, बेगाना महसूस कर रहा है। ऐसे परिवारों को ढांढस बंधाने वाला भी कोई नहीं है। मरीजों से जीते जी छुआछूत तो हो ही रही है, लेकिन मरने के बाद भी उसका पार्थिव शरीर उठाने के लिए चार कन्धे मिलना भी कठिन हो गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में हजारों शव बिना अंतिम संस्कार के गंगा नदी में बहा दिए गए। कुछ स्थानों पर हिन्दुओं के शव भी दफना दिए गए।
अंतिम संस्कार सेे भी वंंचित, खंडित व बिखरा समाज
सनातन धर्म के 16 संस्कारों में से दाह संस्कार को अंतिम संस्कार माना जाता है और कुछ अन्य संस्कारों को चाहे कोई माने या न माने मगर इस संस्कार के बिना शवदाह करने को अधोगति माना जाता है। कुछ मृतकों की सन्तानें अस्पताल में अपने माता पिता के शव लावारिस छोड़ कर भाग गईं।
कुछ स्थानों पर कोरोना से मरे लोगों के शव लेने उनके परिजनों के न आने पर मुस्लिम युवकों ने मानवता का परिचय देते हुये शवों का दाह संस्कार किया। त्योहारों में खुशियां बांटना गले मिलना भूल गए लोग युगों-युगों से सम्पूर्ण विश्व में विभन्न धर्मावलम्बियों और संस्कृतियों के लोग सालभर किसी न किसी बहाने त्यौहार मनाकर अपने जीवन में खुशियां भरने का प्रयास करते आए हैं।
त्योहार खुशियां बांटने के लिए ही होते हैं। ईद और होली जैसे गले मिलने वाले त्योहार तो खुशियां बांटने के साथ ही आपसी सौहार्द एवं भाईचारे की प्रतिबद्धता प्रकट करने के लिए होते हैं। जब से कोरोना का हव्वा खड़ा हुआ तब से होली बेरंग और ईद बंगानी हो गया। गले मिलना तो रहा दूर लोग एक दूसरे के निकट खड़े होने में भी डर रहे हैं।
भारत में विभिन्न धर्मों की भी हजारों की संख्या में जातियां और उपजातियां हैं। संविधान में वर्णित जनजातियों की संख्या भी 7 सौ से अधिक है, जिनकी सैकड़ों उपजातीय शाखाएं हैं और इन सभी के विभिन्न रस्मों रिवाजों के साथ ही भिन्न-भिन्न त्योहार होते हैं। अगर भारत सरकार की अवकाश की सूची पर गौर करें तो उसमें 36 प्रमुख त्योहारों का उल्लेख है। लेकिन कोरोना महामारी ने लोगों के प्रियजनों और मित्रजनों को छीनने के साथ ही त्योहारों का उल्लास और उनके पीछे छिपी मान्यताओं को भी छीन लिया है।
प्रीति भोज-ब्रह्म भोज भी संक्रमित हो गए विवाह समारोहों की मेहमान नवाजी में भी संक्रमण के खतरे के कारण बारातों के साथ ही प्रीति भोज भी गायब हो गए। अंतिम संस्कार में शव यात्री तो गायब हो ही गए, लेकिन तेरहवीं और श्राद्ध के भोज भी कंटेमनमेंट जोन में फंस गए। आपस में सुख-दुख बांटने के साथ ही सामुदायिकता और सहयोग की भावना भी कोरोना संक्रमित हो रही है।
एकांगी मनुष्य की दुनिया
महामारी ने मनुष्य को एकांगी होने को मजबूर कर दिया है। मनुष्य एक सामाजिक जीव अवश्य था ईसा पूर्व यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने सही कहा था कि ‘‘मनुष्य एक समाजिक जीव है’’, इसलिए जब भी यह संकट दूर होगा तब लोगों को सामाजिक जुड़ाव की जरूरत ज्यादा महसूस होगी।
मनुष्य के बिना समाज और समाज के बिना मनुष्य के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। जीव जन्तुओं का भी अपाना समाज होता है। अनादिकाल में जब मनुष्य भी एक जंगली जानवर की तरह था तो उसे भी उस समय अन्य जीवों से सुरक्षा और भोजन के लिए समूह की जरूरत पड़ी होगी।
उसके बाद विकास का क्रम आगे बढ़ा तो मानव झुण्ड कबीलों में बदले और सभ्यता के विकास के साथ एक शक्तिशाली और बुद्धिमान राजा की अधीनता स्वीकार कर मनुष्य ने स्वयं को हर मामले में सुरक्षित किया होगा। सुधरते-सुधरते वह क्रम आज लोकतंत्र तक पहुंच गया। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि इस संकट के बाद बचीखुची मानवता एक बार फिर पूरी ताकत से खड़ी होगी और पुनः अपने सामाजिक ताने बाने के ढांचे को समय की मांग के अनुरूप खड़ा कर अगली चुनौतियों का सामना करेगी।
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