कोरोना की दूसरी लहर: मजबूत इम्यून सिस्टम ही हराएगा वायरस को
- कोरोना इन्फेक्शन से होने वाली मौतों के मामलों में साइटोकाइन स्ट्रोम की बड़ी भूमिका सामने आई है।
- जिंक की कमी से इन्फ्लामेशन उत्पन्न करने वाले साइटोकाइन्स का उत्पादन बढ़ जाता है।
- जिंक की कमी को सप्लिमेंट दे कर पूरा किया जा सकता है।
- जिंक की सामान्य कमी भी प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करती है।
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देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर जानलेवा साबित हो रही है। रोजाना लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं और हजारों की जान जा रही है। हालांकि पूरे देश में इस जानलेवा वायरस के खिलाफ टीकाकरण अभियान चल रहे हैं, जिसने काफी हद तक लोगों की जान बचाई है। ऐसे में जाहिर है कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में हम अब तक जितना भी आगे आए हैं, उसमें हमारी इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता की भूमिका सबसे अहम साबित हुई है। यह हमेशा से कहा जाता रहा है कि जिनकी इम्यूनिटी अच्छी होगी, वह या तो कोरोना के संक्रमण से बच सकते हैं या फिर अगर संक्रमित हो भी गए तो उसकी गंभीरता से।
दरअसल मानव शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र रोगकारक सूक्ष्मजीवों से लड़ने के लिए दो प्रकार की रणनीति अपनाता है, जिन्हें हम इन्नेट इम्यून रेस्पॉन्स और अडॉप्टिव इम्यून रेस्पॉन्स कहते हैं। इन्नेट इम्यून रेस्पॉन्स रोगकारक सूक्ष्म जीवों का सामना करने के लिए हमेशा ही तैयार रहता है।
रोगकारक सूक्ष्म जीव के प्रति स्पेसिफिक नहीं होने के बावजूद भी यह बहुत प्रभावी रूप से काम करता है। इम्यून सिस्टम के विशेष अंग, साइटोकाइन प्रोटीन्स, इन्नेट इम्यून का हिस्सा माने जाते हैं। दूसरे प्रकार की प्रतिरक्षा, अडॉप्टिव इम्यून रेस्पॉन्स यानी संक्रमण के दौरान विकसित हुई विशिष्ट प्रतिरक्षा से हम सब ज्यादा वाकिफ हैं।
एन्टीबॉडी आधारित प्रतिरक्षा और टीकों से प्राप्त हुई प्रतिरक्षा इसी अडॉप्टिव इम्यून रिस्पांस का हिस्सा है। अडॉप्टिव इम्यून रेस्पॉन्स द्वारा शरीर में विशेष रोगकारक के प्रति लंबे समय की प्रतिरक्षा विकसित होती है।
अलग-अलग समय पर किए गए विभिन्न शोध अध्ययन दिखाते हैं कि जिंक इन दोनों ही प्रकार की प्रतिरक्षा प्रणाली में सम्मिलित कोशिकाओं जैसे नेचुरल किलर सेल, बी एवं टी लिम्फोसाईट और उनके बीच संकेतो के सुचारू संचालन तथा एंटीबॉडी निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।
जिंक सप्लिमेंटेशन देने पर वायरस के खिलाफ शरीर द्वारा बनाए गए इंटरफेरॉन की मात्रा बढती है। एक सामान्य और सुचारू प्रतिरक्षा तंत्र, संक्रमण और बीमारी को शुरुआती अवस्था में ही काबू करने में सक्षम होता है। कोरोना इन्फेक्शन से होने वाली मौतों के मामलों में साइटोकाइन स्ट्रोम की बड़ी भूमिका सामने आई है।
साइटोकाइन स्ट्रोम, हमारे ही प्रतिरक्षा तंत्र की अतिसक्रियता के कारण होते हैं, जिसमें इन्फ्लामेशन उत्पन्न करने वाले साइटोकाइन नामक प्रोटीन इतनी सक्रियता दिखाते हैं कि कई प्रतिरक्षा तंत्र शरीर के संक्रमित हिस्सों को स्वयं ही नष्ट करने लगता है जिससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। यह पाया गया है कि जिंक की कमी से इन्फ्लामेशन उत्पन्न करने वाले साइटोकाइन्स का उत्पादन बढ़ जाता है।
यूं तो जिंक कि हमारी दैनिक आवश्यकता बहुत कम है, परंतु...
शरीर के भीतर जिंक विभिन्न प्रोटीन्स से जुडा हुआ रहता है और रक्त के बजाय कोशिका के भीतर खास कोशिकांगों जैसे एन्डोप्लास्मिक रेटीकुलम के भीतर कुछ मात्रा में स्टोर होता है। आवश्यकता होने पर यहीं से इसकी आपूर्ति की जाती है।
कोरोना विषाणु कोशिका के भीतर प्रवेश करके सबसे पहले अपने जेनेटिक मटेरियल यानी RNA का द्विगुणन शुरू करता है। 2010 में प्रकाशित अध्ययन दर्शाता है कि SARS-COV वायरस, जिंक के प्रभाव में अपने जेनेटिक मटेरियल (RNA) के द्विगुनन में अक्षम हो जाता है।
RNA वायरस जैसे कोरोना वायरस का गुणन एक प्रमुख एंजाइम, RNA डिपेंडेंट RNA पोलीमरेज (RdRp) पर निर्भर होता है। विभिन्न कोरोना वायरस में लगभग एकसमान संरचना वाले RdRp पाए जाते हैं, अर्थात इसकी संरचना संरक्षित होती है।
जिंक इसी RdRp एंजाइम की क्रियाशीलता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। जिंक, एक अन्य तरीके से संक्रमित होस्ट कोशिका में वायरस के जरुरी प्रोटीन्स की प्रोसेसिंग को रोककर भी वायरस का मल्टीप्लिकेशन रोकता है।
यूं तो जिंक कि हमारी दैनिक आवश्यकता बहुत कम है, परंतु उसकी भी पूर्ती शाकाहारी भोजन से नहीं हो पाती। जिंक की सामान्य कमी भी प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करती है जिससे कई बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है।
अच्छी बात यह है कि जिंक की कमी को सप्लिमेंट दे कर पूरा किया जा सकता है। एक अध्ययन के दौरान वृद्ध लोगों में जिंक सप्लिमेंट देने पर इम्यूनिटी में उल्लेखनीय सुधार और इन्फ्लामेटरी रेस्पोंस में कमी पाई गई।
स्वस्थ वयस्क व्यक्ति के लिए जिंक की दैनिक अनुशंषित मात्रा 11 मिलीग्राम (पुरुष) और 8 मिलीग्राम (महिला) का मानक तय किया गया है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए 12 मिलीग्राम जिंक प्रतिदिन अनुशंषित किया जाता है। अनाज और दलहन में उपस्थित फाइटेट नामक फॉस्फोरस यौगिक जिंक का अवशोषण रोक देता है। इस कारण शाकाहारियों में मांसाहारियों की तुलना में जिंक की रिक्वायरमेंट 50% तक ज्यादा होती है।
2009 में WHO द्वारा प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि जिंक सप्लीमेंट के रूप में देने पर बच्चों की न्यूमोनिया से सम्बद्ध मृत्युदर में उल्लेखनीय कमी आती है। बच्चों को हिपेटाइटिस के टीके से साथ ओरल जिंक देने पर, टीकाकरण से उत्पन्न हुई एंटीबॉडी में उल्लेखनीय वृद्धि पाई गई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ 2004 से ही बच्चों के डायरिया के क्लीनिकल मैनेजमेंट और मृत्युदर रोकने हेतु प्रतिदिन 10-20 मिलीग्राम जिंक सप्लिमेंटेशन की अनुशंषा करता है।
जिंक का स्थापित इम्युनोलॉजिकल रोल, वृद्धावस्था में होने वाली इसकी कमी, आर्थिक स्थिति और शाकाहारी भोजन से इसकी कमी का अन्तर्सम्बंध और कोरोना वायरस के अन्य स्ट्रेन (SARS-COV) पर किए गए शोध कार्य के परिणाम कोविड-19 पर जिंक सप्लिमेंटेशन के क्लिनिकल ट्रायल के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं।
कोरोना विषाणु से लड़ रहे विश्व स्वास्थ्य संगठन और मेडिकल नियामक संस्थाओं को इस सस्ते और सर्वसुलभ तत्व पर जरूर ध्यान देना चाहिए।
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