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कोरोना संकट और महिलाएं: जिम्मेदारियां बढ़ी और चुनौतियां भी

Sun, 29 Nov 2020 11:27 AM IST
Sunita Mini सुनीता मिनी
Updated Sun, 29 Nov 2020 11:27 AM IST
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Coronavirus lockown period effects Indian Women, not only housewife but Working woman too
लॉक डाउन में महिलाओं ने घर और बाहर दोनों ही जगहों पर मोर्चा संभाला है। - फोटो : रवि बत्रा

लाॅकडाउन के चार महीने बीत गए। इन चार महीनों में कोरोना वायरस के कारण हम सभी की जिंदगी किसी न किसी तरह प्रभावित जरूर हुई है और जबतक कारगर वैक्सीन नहीं आ जाती, इससे निजात मिलने के आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं। शुरुआत से लेकर अबतक, जब सब कुछ बंद पड़ गया तब एकमात्र ऐसा तबका था, जिसका काम रुका नहीं, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ता गया। जिन महिलाओं को अबला, कमजोर और दोयम दर्जे का समझा जाता रहा है, उन्होंने दिखा दिया कि उन्हीं की बदौलत यह दुनिया खड़ी है। 

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पिछले चार महीनों में औरतों ने न जाने कितनी भूमिकाएं निभाई हैं। बिना किसी सहयोगी के घर का सारा काम करना हो या स्वादिष्ट पकवानों की डिमांड पूरी करना, हर कदम पर महिलाओं ने ही मोर्चा संभाला है। इन चार महीनों में कई तीज-त्योहार और उत्सव बीत गए, लेकिन न तो पकवानों की कमी कभी महसूस हुई और न ही बर्थडे केक की। 
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इस दौरान पुरुषों ने भी मदद का बीड़ा जरूर उठाया, लेकिन यह कभी उनकी प्राथमिकता में शामिल नहीं रहा। अपने ही घर के काम में मदद करना और जिम्मेवारी निभाना दो अलग-अलग चीजें हैं, जिसे समझने में पुरुषों को अभी वक्त लगेगा। इस कोरोना और लाॅकडाउन ने साधारण से लेकर हर वर्ग की महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित किया और उनके जीवन में सबसे ज्यादा बदलाव लाया।
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कोई भी मैनेजमेंट का बड़ा ज्ञाता हो या फिर आर्थिक विषेषज्ञ कम से कम खर्च और संसाधनों घर को जितनी अच्छी तरह महिलाएं चला रही हैं, इनमें से किसी के भी बूते से बाहर है। इस लाॅकडाउन में मेरा अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा। परिवार के हर सदस्य का साथ होने से निस्संदेह घर का माहौल बदला है और हम एक दूसरे की करीब आए हैं। क्वालिटी टाइम का मतलब समझ में आने लगा है। लेकिन इसके साथ ही सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ आ खड़ा हुआ है। 

सुबह से काम निपटाते-निपटाते कब रात हो जाती है, पता ही नहीं चलता। मेड से लेकर बच्चों की टीचर और दोस्त भी बनना पड़ता है। इस बीच सबसे ज्यादा परेशानी का कारण बन रही है, बच्चों की ऑनलाइन क्लास। अपने आसपास और रिश्तेदारों में भी यही परेशानी सबसे अधिक दिख रही है। यह सही है कि ऐसे समय में इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता लेकिन ज्यादातर स्कूलों में यह मात्र एक औपचारिकता बन कर रह गई है। 

कुछ स्कूलों को छोड़ दें तो ज्यादातर स्कूल के ऑनलाइन क्लास का एक ही ध्येय है कि वे कैसे अभिभावकों से फीस वसूल सकें। छोटे से बड़े हर उम्र के बच्चों अभिभावकों की यही परेशानी है कि बच्चे पढ़ना नहीं चाहते और मोबाइल में पढ़ाई के बहाने सारा दिन गेम खेलना चाहते हैं। 

Coronavirus lockown period effects Indian Women, not only housewife but Working woman too
घर के काम के अलावा महिलाएं बाहर का भी काम संभाल रही हैं। - फोटो : अमर उजाला

चूंकि बच्चों और उनके पढ़ाई की सारी जिम्मेदारी माताओं पर थोप दी गई है इसलिए बच्चों की पढ़ाई इनके लिए सिर का दर्द बन चुकी है। घर का सारा काम निबटाकर बच्चों के साथ ऑनलाइन क्लास के समय बैठना, उनका होम वर्क करवाना, जो चीजें समझ में न आएं उसे समझाना बहुत ही चुनौती भरा काम है। 

कई बार बच्चे पढ़ाई की जगह अन्य साइट देखने लगते हैं जिसपर ध्यान रखना होता है। इसके बाद भी एक्टिविटी और प्रोजेक्ट वर्क में काफी वक्त निकल जाता है। इसके साइड इफेक्ट भी सामने आने लगे हैं जैसे बच्चों में आंखों की समस्या का बढ़ना और उनका चिड़चिड़ा होना। 

महिलाएं इन समस्याओं से परेशान हो रही हैं। कई महिलाओं की यह भी शिकायत रही है कि स्कूल प्रशासन अभिवावकों की बात नहीं सुन रहे और पैरेंट-टीचर मीटिंग से कतरा रहे हैं। कोचिंग और ट्यूशन का भी कोई विकल्प नहीं रह गया है ऐसे में लाख कोशिशों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। 

आजकल ज्यादातर लोग घर से ही काम कर रहे हैं, जिससे हम महिलाओं का काम कई गुना बढ़ गया है। हर वक्त अलर्ट रहना होता कि पति, बच्चे या घर के बुजुर्ग जो भी काम कर रहे हैं, उनकी जरूरतें पूरी होती रहें। उनके काम में किसी तरह की बाधा न पहुंचे। 

इसके अलावा जो महिलाएं वर्क फ्राॅम होम कर रही हैं उनकी परेशानी और चुनौतियां कई गुना ज्यादा बढ़ चुकी हैं। घर और बच्चों की सारी गतिविधियों को संभालते हुए काम करना एक अलग तरह की चुनौती है। इतनी व्यस्तता और तनाव में होने के बावजूद एक चीज जो महिलाओं को शायद जन्म से मिली है, वह है सकारात्मक और रचनात्मक सोच। 

थोड़ा प्यार और अपनों का साथ हमें हर मुश्किल से लड़ने को तैयार कर देता है। इस महामारी ने एक मौका दिया है देश-दुनिया के पुरुषों को महिलाओं का खुले दिल से साथ दें। जिस तरह बाहर की दुनिया में महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। आज पुरुषों को भी महिलाओं के साथ खड़ा होने की जरूरत है। घर के अंदर की जिम्मेदारियों को मिलकर संभाल सकें, ऐसी सोच की जरूरत है, तभी यह साथ पूरा हो पाएगा।

लेखिका, भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद (ICSSR) से संबद्ध हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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