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कोरोना संकट और समाज: परिवार और रिश्तों के बीच बने नये जीवन संबंध

Tue, 29 Sep 2020 07:55 AM IST
Vibha singh विभा सिंह
Updated Tue, 29 Sep 2020 07:55 AM IST
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coronavirus lockdown india impact on society and connection from indian culture
कोरोना के कारण हमारी जीवन शैली में बड़े बदलाव आए हैं। - फोटो : Pixabay

कोरोना संकट के बीच हमारे समाज ने लंबा लॉकडाउन देखा है। महामारी के इस चुनौती के बीच हम सब घरों में रहने को मजबूर हुए हैं, लेकिन इस मजबूरी ने जहां जीवन जीने के तरीके बदले हैं वहीं पुराने संबंधों के प्रति एक ऊर्जा को दोबारा पैदा किया है।

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याद कीजिए कोरोना से पहले की जिंदगी और बाद की जिंदगी, कितना अंतर आया है इसमें। पहले भागती-दौड़ती जिंदगी में किसी के पास हालचाल लेने तक की फुर्सत नहीं थी वहीं लॉकडाउन में घरों में रहने के कारण हमारे आपसी संबंधों में एक राग और प्रेम भी पैदा हुआ है। रिश्तों की कद्र हुई है और हम अपनों के प्रति संवेदनशील भी हुए हैं। कई पुरानी बातों को भुलाकर हमने आपसदारी को बढ़ाया है और स्नेह व अपनत्व की डोर मजबूत हुई है। 
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दरअसल, कोरोना के कारण मौत का अंतहीन मंजर और उससे बचने के लिए सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन की वजह हमारा परिवेश काफी तेजी से बदला है।  हम सभी घरों में बंद सोचने को मजबूर हो गए हैं कि आखिर जीवन के प्रति हमारा स्वस्थ नजरिया कैसा हो। भारतीय संस्कृति मूल रूप से, योगमयी रही है और वैसी ही संस्कृति फिर से देखने को मिल रही है।
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इस पूर्ण-बंदी के दौरान लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर जो असर पड़ा है, उससे बचने के लिए हम योगा, प्राणायाम, अच्छे खान-पान तथा संयमित जीवन जीने की तरफ मुड़ रहे हैं।  मौत का खौफ ही सही, पर समाज में आए इस नए बदलाव को शुभ संकेत के रूप में देखा जा सकता है। प्रकृति और स्वास्थ्य को नज़रअंदाज करके सुखी रह पाना कोरी कल्पना से कम नहीं।


इतने सालों से विलासितापूर्ण जीवन और आधुनिकता में डूबे जाने-अनजाने में प्रकृति से दूर हो गए थे। पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण, सुविधापूर्ण जीवनशैली जीते-जीते, भारतीय परपंरा, सच्ची खुशी, बच्चों का बचपन और सही मायने में खुशहाल जीवन से दूर होते चले गए। 


ऐसा नहीं है कि मनोरंजन करना सही नहीं है, लेकिन अपने मनोविनोद के लिए जिस तरह की  गतिविधियां हम कर रहे हैं वह व्यक्तिगत व सामाजिक पतन का कारण बन रही हैं। लेकिन एक अच्छी बात है कि हम पुन: दुष्प्रवृत्तियों से अच्छी प्रवृत्तियों की तरफ कदम बढ़ाने लगे हैं। भले ही, मौत का डर ही सही लोगों का जीवन के प्रति नजरिया बदला है।


अब तक हम प्रकृति का दोहन कर भौतिकतावादी जीवन को ईंधन दे रहे थे लेकिन उस पर थोड़ा अंकुश लग गया है। यह भविष्य के लिए शुभ संकेत की तरह है।  अब हम भारत के योगमयी जीवन, सादा जीवन उच्च विचार वाली परंपरा, दया, प्रेम की तरफ बढ़ रहे हैं। प्राकृतिक संतुलन किस तरह बना रह सकता है उसे अच्छी तरह समझ गए हैं।

इस लॉकडाउन ने हमें परिवार और सेहत की अहमियम सिखाई है। भले ही तालाबंदी से आर्थिक और सामाजिक नुकसान हुआ है पर भारतीय संस्कृति की पहचान- योगमयी जीवन की तरफ लौटना हमारे जीवन को आगे आने वाले दिनों में खुशहाल तथा संतुलित बना देगा। राम और कृष्ण की धरती पुन: गौरवान्वित होकर जयघोष करने लगेगी। 




डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

 

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